लेखक का पन्ना

द्वारा लिखित आलेख:

    “तू निर्बंध सारी धरती पर घूम सके, अपने दिवाने को चूम सके”

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    मैं अपनी बात को सामान्यीकृत नहीं करूंगा। मैं विशेष संदर्भ में बात करूंगा। जिससे बात का दायरा साफ दिखे। मैं आगे जो कुछ लिखूंगा वह सब एक मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि के अनुभव हैं। मूलतः बड़े किसानों, व्यावसायियों, उद्यमियों और सरकारी अफसरों के समाजिक लोक वृत्त के अनुभव हैं।

    हम छोटे थे तो हमारी कालोनी में एक बैंक मैनेजर सार्वजनिक चर्चा का विषय बनते रहते थे। क्योंकि उन्होंने एक बाद एक आठ लड़कियां पैदा कीं। एक बेटे की आस में। उनकी आस नौवें प्रयास में पूरी भी हो गयी। यह मामला बनारस शहर का है। देहात में ऐसा नहीं होता। कोई सात/आठ लड़कियों तक इंतज़ार नहीं करता। जहां भी वर पक्ष को शक हुआ कि वधु से लड़के की संभावना अभी दूर है, वह तुरंत बेटे की दूसरी शादी की चर्चा छेड़ देता है। या फिर यदि बच्चा न हुआ हो तो पुरुष की दूसरी शादी लगभग अवश्यंभावी ही मानी जाती है। ऐसा नहीं है कि यह सारा मामला पुरुषों का रचा हुआ है। या फिर उन महिलाओं का जो सास, ननद, भाभी की भूमिका में होती है। मनुष्य की विश्वदृष्टि उसके भौतिक जीवन के निर्णय का आधार बनती है। मैंने बहुधा देखा है कि जिन स्त्रियों को सिर्फ़ बेटियां हों या जिनके बच्चा न हो वो पति की दूसरी शादी के पक्ष में होती हैं। ज्यादातर विकल्पहीनता की लाचारी के तहत लेकिन कई बार इसे अपनी नियति मानकर प्रसन्नतापूर्वक इसे स्वीकार करती हैं। Read more

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    जिसकी जितनी जातीय औकात, उतना उसका प्राप्य

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    “……..अपने यहां मुसलमान कौन हुए? मुसलमान वो हुए, जो हाथ से काम करने वाले लोग थे. जुलाहे, लोहार, कुम्हार जो-जो भी हाथ से काम करने वाले लोग थे और जिनको आप के समाज में इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता था, वो लोग मुसलमान हुए. वे स्वाभाविक रूप से हाथ को, उंगलियों को हैंडल करने वाले लोग थे. उनकी स्किल हमसे और आप से बेहतर है क्योंकि वो हाथ से ही काम करने वाले लोग थे. हम दिमाग से काम करने वाले लोग है….” - प्रभाष जोशी Read more

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    ब्राह्मणवाद पर बहस कीजिए, बहस की हत्या नहीं

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    संजय जी आपने बहस को ज्यादा ठोस जमीन पर खड़ा किया है। लेकिन इसके बाद भी चार्वाक का कथन हमारे माथे पर लकीरें ले ही आता है। क्योंकि उसमें सच्चाई है। इन नए आंकड़ों के आने के बाद ब्राह्मणवाद किन चीजों से समझौता करके अपनी सत्ता बचाए रखने में सफल रहा है इसकी भी पड़ताल की जा सकती है। जैसे कोई ठाकुर किसी बड़े प्रसिद्ध व्यक्ति का बेटा हो। या कोई दलित किसी दलित नेता का बेटा हो या कोई महिला किसी की रिश्तेदार हो। ऐसे तमाम कारणों पर विचार करना जरूरी है। जिस तरह से मायावती का पैर छूने से कोई ब्राह्मण अपने गांव के दलितों को सम्मान देने वाला नहीं बन जाता उसी रह किसी खास कारण से नाम गिनानेभर की भर्तियों से कोई पाक-साफ नहीं हो जाता। इन कारणों को ध्यान में रखते हुए इस सूची का विश्लेषण करना होगा।

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