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द्वारा लिखित आलेख:
क्रीमी लेयर को क्यों चाहिए महिला आरक्षण
,लेखक: दिलीप मंडल | March 11, 2010 | ब्लॉग | 9 Comments
आरक्षण की पिछले 20 साल में हुई कोई चर्चा क्रीमी लेयर के बगैर पूरी नहीं हुई है। सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण संबंधी मंडल कमीशन लागू होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के दायरे से क्रीमी लेयर को बाहर करने का फैसला सुनाया। इसी आधार पर 2006 में भी केंद्र की यूपीए सरकार के उच्च शिक्षा संस्थानों में ओबीसी आरक्षण लागू करते समय क्रीमी लेयर को कोटे से बाहर रखा गया। यहां तक कि हाल ही में जब पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य सरकार की नौकरियों में मुसलमानों के लिए 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया तो उसमें भी क्रीमी लेयर को आरक्षण नहीं देने की व्यवस्था की गई। यहां तक कि दलितों और आदिवासियों के आरक्षण में, संविधान और कानून में कहीं प्रावधान न होने के बावजूद, बीच बीच में ये शिगूफा छेड़ा जाता है कि यहां भी क्रीमी लेयर को कोटे से बाहर किया जाए। Read more
अनिल चमड़िया मामले में निष्पक्ष जज नहीं थीं मृणाल पांडे
,लेखक: दिलीप मंडल | February 14, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | Leave a Comment
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति वी एन राय बार-बार ये कह रहे हैं कि मैंने तो अनिल चमड़िया को रखा था, ईसी यानी एक्जिक्यूटिव कौंसिल ने हटा दिया तो मैं क्या कर सकता हूं। जिस ईसी ने अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का फैसला किया, उसकी एक सदस्य थीं पत्रकार मृणाल पांडे। मृणाल पांडे कुछ समय पहले तक दैनिक हिंदुस्तान की संपादक थीं।
यहां एक बात गौर करने की है कि न्यायपालिका में ये परंपरा है कि अगर किसी जज का किसी केस में हितों का टकराव यानी कॉन्फ्लिक्ट ऑफ होता है, तो जज ऐसे मामलों से खुद को अलग कर लेता है। हाल के दिनों में ऐसे कई मामले हुए हैं, जब जजों ने खुद ही मामलों की सुनवाई से अलग होने का फैसला किया। Read more
सारे नोटिस दलित शिक्षकों को, जवाब दो विभूति
,लेखक: दिलीप मंडल | February 6, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 3 Comments
अब तक आपने पढ़ा कि किस तरह विभूति नारायण राय ने जब प्रोफेसर डॉक्टर एल करुण्यकारा को डॉ. अंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस कार्यक्रम में शामिल होने और नारे लगाने के आरोप में सामंती अंदाज में धमकी दी तो उन्होंने इसका करारा जवाब दिया। उन्होंने विभूति राय को सिखाया कि 6 दिसंबर का क्या मतलब है और साथ ही ये भी बताया कि सेकुलर होकर भी जातिवादी, सामंती और अलोकतात्रिक हुआ जा सकता है बल्कि सेकुलर होकर ये सब होना ज्यादा आसान होता है और ऐसे लोगों के छल को तोड़ना मुश्किल। उन्होंने ग्राम्शी को उद्धृत करते हुए बताया कि दलितों को आंदोलन के लिए क्यों बाध्य होना पड़ता है। अब आगे पढ़िए, जब वो बताते हैं कि जिन नारों को विभूति जातिवादी मानते हैं, वो नारे दरअसल हैं क्या? (अनुवाद: दिलीप मंडल)…
सुनो विभूति, तुम सेकुलर जातिवादी हो…
,लेखक: दिलीप मंडल | February 5, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment
ऐसे समय में जब कई बार छवियों का महत्व वास्तविकता से ज्यादा हो जाता हो, तब ऐसे बच्चे की जरूरत होती है जो कहे कि अरे राजा तू तो नंगा है। ऐसे समय में जब सच कहना सबसे साहसिक कामों में गिना जाता हो, जब हम सलाम करते हैं वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर (डॉ) एल करुण्यकारा को। प्रोफेसर को 11 दिसंबर को विभूति नारायण राय का साइन किया हुआ एक नोटिस मिलता है, जिसमें उन पर आरोप लगाया जाता है कि 6 दिसंबर की शाम उन्होंने भड़काऊ जातिवादी नारेबाजी की थी और वो जुलूस में शामिल हुए थे। उन पर ये आरोप भी लगाया गया कि उनके ऐसा करने से कैंपस की शांति और समरसता को खतरा पैदा हुआ। विभूति ने नोटिस में ये धमकी दी कि 7 दिनों में नोटिस का जवाब मुझे नहीं मिला तो एकतरफा कार्रवाई की जाएगी। मवालियों की भाषा में जारी इस नोटिस का जो जवाब प्रोफेसर करुण्यकारा ने दिया है वो प्रतिरोध का शानदार दस्तावेज है। वीसी को भेजी गई चिट्ठी का अनुवाद दिलीप मंडल ने किया है।
सब प्रो. कृष्ण कुमार वगैरह ने किया, वीएन राय पाक साफ!
,लेखक: दिलीप मंडल | January 30, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 2 Comments
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर विभूति नारायण राय की मानें तो प्रोफेसर अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का फैसला प्रोफेसर कृष्ण कुमार, मृणाल पांडे, गंगा प्रसाद विमल और एक्जिक्यूटिव कौंसिल के बाकी सदस्यों का था। उनका इस फैसले से कोई लेना देना नहीं है और वो तो दरअसल अनिल चमड़िया को लेकर आए थे और उनके हाथ में होता तो वो अनिल चमड़िया को कतई न हटाते। Read more
क्या अनिल चमड़िया का टर्मिनेशन अवैध है?
,लेखक: दिलीप मंडल | January 29, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment

जवाब दो!
सवाल 1 : क्या दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 13 जनवरी को हुई एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक के मीनिट्स (मीटिंग में हुई बातचीत का ब्यौरा) लिए गए थे?
सवाल 2: क्या मीटिंग का ये ब्यौरा एक्जिक्यूटिव कौंसिल के सदस्यों को मंजूरी के लिए भेजा गया? नियमों के तहत ये जरूरी है ताकि बैठक में शामिल सदस्यों को इस बात की विधिवत जानकारी मिल सके कि बैठक में क्या फैसले किए गए? Read more
इस तरह का अलगाववाद बहुत ख़तरनाक है
,लेखक: दिलीप मंडल | January 14, 2010 | ब्लॉग | 3 Comments
उन्हें इस देश की सड़कें नापसंद हैं। वो ज्यादातर सफर हवाई जहाज से करते हैं और हो सके तो हवाई जहाज से सिटी सेंटर तक आने के लिए हेलिकॉप्टर का इस्तमाल करते हैं। भारत में दुनिया के लगभग सारे लक्जरी ब्रांड मिलने लगे हैं लेकिन वो शॉपिंग के लिए लंदन, पेरिस और न्यूयॉर्क से लेकर सिंगापुर, दुबई तक का सफर करते हैं। दुनिया के काफी लोग सैरसपाटे के लिए भारत आते हैं पर वो अपनी हर छुट्टी ससेल्स, दक्षिण अफ्रीका, बहामास, मोनैको, बाली या अलास्का में बिताना चाहते हैं। भारत बेशक यूरोप और अमेरिका के गरीब और मध्यवर्गीय लोगों के लिए इलाज कराने का बड़ा ठिकाना बन गया है लेकिन वो इलाज के लिए यूरोप या अमेरिका ही जाते हैं। उनके बच्चे या तो विदेश में पढ़ते हैं या भारत में रहकर ही स्कूली सर्टिफिकेट किसी विदेशी स्कूल बोर्ड का ही लेते हैं ताकि हायर एजुकेशन के लिए विदेश जाने में दिक्कत न हो। उनकी सुविधा के लिए अब देश में ही कई इंटरनेशनल स्कूल खुल गए हैं जो विदेशी स्कूल बोर्ड का एक्जाम लेकर वहीं का सर्टिफिकेट देते हैँ। वो सिर्फ अपने नौकर चाकर से भारतीय भाषाओं में बात करते हैं। उनके घर विदेशों में भी हैं, जहां वो अक्सर छुट्टियां बिताने के दौरान जाते हैं। वो विदेशी पहनते हैं, विदेशी शराब पीते हैं, विदेशी ख्वाब जीते हैं। Read more
राठौर आदरणीय क्यों? मीडिया के भाषाई संस्कार पर सवाल
,लेखक: दिलीप मंडल | December 24, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 18 Comments
रुचिका के साथ छेड़खानी और उसकी आत्महत्या के मामले में भारतीय न्यायव्यवस्था ने कुछ नया या अजूबा नहीं किया है। न्यायप्रक्रिया में धन और रुतबे के महत्व के बारे में ये केस कोई नई बात नहीं कहता। देश के राष्ट्रपति रहे के आर नारायणन ने जब ये कहा था कि आजादी के बाद जिन लोगों को फांसी की सजा हुई है उनमें से कोई भी अमीर नहीं था, तो वो इसी सच को उद्धाटित कर रहे थे। हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी.एस. राठौर के साथ जो होने वाला है उसका अंदाजा हम इस मुकदमे की सुस्त रफ्तार से लगा सकते हैं। 19 साल में ये केस स्थानीय न्यायालय की सीमा को ही पार कर पाया है। इस रफ्तार से केस चला तो राठौर को जीवन का एक भी दिन शायद ही जेल में काटना होगा। Read more
मंदिरों में नहीं, स्कूलों में मिलेगी मुक्ति
,लेखक: दिलीप मंडल | December 18, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment
क्या इस बात पर देश को खुश होना चाहिए कि उड़ीसा में केंद्रपाड़ा जिले के एक मंदिर में दलितों को 900 साल बाद घुसने का मौका मिला? या फिर क्या दलितों को इस बात का जश्न मनाना चाहिए कि तमिलनाडु के नागापट्टनम जिले में एक मंदिर में 100 साल में पहली बार दलितों को अंदर पांव रखने का मौका मिला? देश के सैकड़ों मंदिरों में दलितों का प्रवेश अब भी वर्जित है। तो क्या 21वीं सदी में मंदिर प्रवेश दलित मुक्ति का एजेंडा साबित हो सकता है? जिस तरह केंद्रपाड़ा और नागापट्टनम में दलितों ने मंदिर में प्रवेश करने में कामयाबी हासिल की है, क्या वैसी ही कामयाबी के लिए देश भर के दलितों को और उनके विकास के लिए काम करने वालों को प्रयास करना चाहिए? Read more
मुझे नश्तर से छील दो, सुंदर बना दो!
,लेखक: दिलीप मंडल | December 10, 2009 | देश-दुनिया, ब्लॉग | 2 Comments
वो अपने देश की सबसे खूबसूरत लड़की थी। 1994 में उसने मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में अपने देश का प्रतिनिधित्व किया था। सुंदरता के तय स्टैंडर्ड्स पर वो हर तरह से फिट थी। लेकिन 15 साल बाद, सुंदरता के उन्हीं तय स्टैंडर्ड्स पर फिट बने रहने की चाहत ने आखिरकार उसकी जिंदगी ले ली। बात हो रही है सोलांगे मैगनानो की। 1994 की मिस अर्जेंटिना। इस खिताब को जीतने के 15 साल बाद वो एक शादीशुदा महिला थीं। आठ साल पहले उसे जुड़वा बच्चे हुए थे।
सोलांगे मैगनानो को जमाने ने सुंदर माना। जमाने की नजरों में वो उसी तरह सुंदर बने रहना चाहती थी। इसके लिए वो समय यानी उम्र से भी लड़ ही थी। 38 साल की उम्र में वो सुंदरता के उन स्टैंडर्ड्स पर फिर से खरा उतरना चाहती थी, जो जमाने ने, जमाने के प्रभुत्वशाली लोगों ने और पुरुषों ने तय किए थे। वो अपनी हिप यानी कूल्हे को सुंदर बनाना चाहती थीं। इसके लिए उसने कॉस्मैटिक सर्जरी की शरण ली। इस सर्जरी के लिए वो देश की राजधानी ब्यूनस आयर्स आईं। वहां के अस्पताल में उनकी सर्जरी की गई। ग्लूटेयोप्लास्टी नाम की इस सर्जरी में उनके कूल्हे में इंप्लांट डाले गए। लेकिन सर्जरी के दौरान हीं उन्हें सांस की तकलीफ शुरू हो गई और तीन दिन तक मौत से जुझने के बाद आखिरकार जिंदगी हार गई। Read more



