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Exclusive: बेतुके आरक्षण से नक्सली बन रहे हैं आदिवासी
,लेखक: आवेश तिवारी | March 11, 2010 | बड़ी ख़बर | 5 Comments
सोनभद्र। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के बीच उत्तर प्रदेश का आदिवासी इलाका। जिस आरक्षण से देश के करोड़ों दलितों और आदिवासियों को उनके लोकतांत्रिक अधिकार मिले, आरक्षण की उसी नीति में खामियों की वजह से यह इलाका अब धीरे-धीरे नासूर बनता जा रहा है। ग्रामसभाओं से लेकर संसद तक चुनाव लड़ने के लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित आदिवासी अब माओवादी बन रहे हैं। “बैलेट नहीं तो बुलेट” का नारा बुलंद हो रहा है।
उत्तर प्रदेश के जिस जिले में सबसे अधिक आदिवासी हैं, विधानमंडल में वहां से एक भी आदिवासी प्रतिनिधि का नहीं होना काफी कुछ कहता है। यह बताता है कि आरक्षण के नाम पर हित साधने में जुटे हमारे हुक्मरान कितने दोमुंहे, मूर्ख और भ्रष्ट हो सकते हैं। यहां माहौल इतना ख़राब है कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में मौजूद खामियों को दूर करने की कोशिश से जातिगत तनाव बढ़ जाता है और हिंसा शुरू हो जाती है। Read more
तसलीमा को पढ़ कर मोनिका लेविंस्की याद आती हैं
,लेखक: आवेश तिवारी | March 6, 2010 | ब्लॉग, स्पेशल रिपोर्ट | 20 Comments
इस्लामिक कट्टरता और पुरुष के पुरुष होने के ख़िलाफ़ किसी भी आम मुस्लिम स्त्री के भीतर चल रही लड़ाई उतनी ही पैनी हैं जितना तसलीमा के उपन्यासों का कथानक। उनमें नया कुछ अगर है तो वो सिर्फ़ सेक्स है। “का” से लेकर “अमर मेयेबेला” तक उनके लिखे उपन्यासों को पढ़कर उतनी ही उत्तेजना महसूस होती है जितनी जेम्स हेडली चेईस के किसी उपन्यास या फिर लोलिता को पढ़कर। जिस वक़्त उनकी कहानियां उत्तेजित नहीं कर रही होती, मन मस्तिष्क में इस्लामिक कट्टरता के ख़िलाफ़ हमले का वर्चुअल वर्ल्ड तैयार करती दिखती हैं। लज्जा को पढ़कर संभव है आप अपने मन में कितने ही अनदेखे चेहरों की आंखें फोड़ डाले या फिर उनका सर कलम कर दें। कभी-कभी मुझे उन्हें पढ़कर मोनिका लेविंस्की की भी याद आती है। जिसके और बिल क्लिंटन के सेक्स संबंधों के किस्से आज भी चाव से पढ़े जाते हैं । Read more
ये थ्री, इडियट्स नहीं हैं!
,लेखक: आवेश तिवारी | February 22, 2010 | ब्लॉग, हक़ की आवाज़ | 1 Comment
ये तीन थे। मगर इडियट्स नहीं थे। न ही किसी 70 एमएम की फिल्म के हीरो थे, जिनकी अदाकारी पर आप ताली बजाएं। ये तीनों देश के सर्वाधिक मेधावी छात्रों में से एक थे। अभी दो हफ़्ते पहले की बात है। इनमें से एक के. सुशील ने छात्रावास परिसर में आत्महत्या की कोशिश की। कृष्णमोहन ने इसी महीने 48 घंटों तक खुद को कमरे में बंद रखा। वहीं ज्ञानेंद्र के पास अपनी विधवा मां के सवालों के उत्तर में सिर्फ़ आंसू थे। देश के बड़े प्रौद्योगिकी संस्थानों में से एक भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान इलाहाबाद के इन होनहार छात्रों की इस हालत की वजह सिर्फ एक थी। इन दलित छात्रों ने संस्थान के निदेशक द्वारा संस्थान के ही एक विद्वान प्राध्यापक की मनमाने ढंग से असमय सेवा समाप्ति के आदेश को लेकर ई-मेल किए थे। इसका खामियाजा इन्हें विश्ववद्यालय से निलंबन के साथ बंधक बनकर चुकाना पड़ा। Read more
आज भी क्लास की अगली सीटों पर इनका बैठना गुनाह है…
,लेखक: आवेश तिवारी | February 19, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 2 Comments
वो आज भी क्लास की पिछली सीट पर बैठते हैं। आज भी वो दूसरे छात्रों के साथ खाना खाने से घबराते हैं। आज भी उन्हें जेहन में यह डर बैठा हुआ है कि किसी भी वक़्त उनकी सारी काबिलियत को धत्ता बताए हुए, उनके सारे सपने चूर-चूर कर दिए जाएंगे।
हम बात कर रहे हैं दलितों की सरकार के राज में जी रहे दलित छात्रों की। एच.बी.टी.आई कानपुर में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का छात्र राकेश कॉलेज के मेस में खाना नहीं खा सकता। वो और उसके साथी किसी भी सवर्ण छात्र के साथ एक कमरे में नहीं रह सकते। लखनऊ स्थित आई टी में पिछले पांच साल के आंकड़ों को देखा जाए तो प्रोजेक्ट वर्क में सबसे कम नंबर दलित छात्रों को ही मिले हैं। छात्र हमेशा खौफ में रहते हैं कि पता नहीं कब उनके स्वर्ण प्राध्यापक का डंडा उन पर चल जाए। Read more
पुलिस ने कहा नक्सली, मीडिया ने कबूल कर लिया
,लेखक: आवेश तिवारी | February 8, 2010 | हक़ की आवाज़ | 2 Comments
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद की पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सीमा आजाद और उनके पति विश्वविजय को अचानक इलाहाबाद जंक्शन से गिरफ्तार कर लिया गया। वे दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले से लौट रहे थे। ये घटना बताती है कि उत्तर प्रदेश में मानवाधिकार आहत और लहूलुहान है। जिस एक वजह से सीमा आज़ाद और उनके पति की गिरफ्तारी की गयी, उस एक वजह का यहां हम खुलासा करेंगे।
जिस वक़्त सीमा आजाद को गिरफ्तार किया गया, ठीक उसी वक़्त पूर्वी उत्तर प्रदेश के अति नक्सल सोनभद्र जनपद में सोन नदी के किनारे बालू के अवैध खनन को लेकर सरकार के विधायक विनीत सिंह और उदयभान सिंह उर्फ़ डॉक्टर के समर्थकों के बीच गोलीबारी हो रही थी। इस गोलीबारी से डर कर तमाम आदिवासी अपने घरों से भाग खड़े हुए थे। घटनास्थल पर पुलिस पहुंची। गोली के खोखे भी बरामद किये, लेकिन किसी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की गयी। ये घटना कोई नयी नहीं है। समूचे प्रदेश में खनन मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा और उनके कारिंदों के द्वारा अवैध खनन का जाल बिछा कर अरबों रुपये की काली कमाई की जा रही है और इसको अंजाम तक पहुंचाने के लिए प्रदेश के तमाम माफियाओं, हिस्ट्रीशीटरों को बेनामी ठेके दिये जा रहे हैं। निस्संदेह ऐसी स्थिति में आम मजदूर, आदिवासी और किसान का शोषण होना लाजिमी है। Read more



