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यूपी और बिहार : पानी को लेकर रार
,लेखक: आवेश तिवारी | April 6, 2010 | मुद्दा | Comments Off

अभूतपूर्व जल संकट से त्राहि त्राहि कर रहे बिहार और उत्तर प्रदेश के बीच पानी के बंटवारे को लेकर एक बार पुनः तलवारें खींच गयी हैं। बिहार सरकार ने उत्तर प्रदेश से सिंचाई के लिए रिहंद बांध से 5000 क्यूसेक पानी छोड़ने को कहा है, वहीं उत्तर प्रदेश ने जल संकट का हवाला देते हुए पानी छोड़ने से साफ इनकार कर दिया है। उप्र के सिंचाई विभाग के प्रमुख सचिव किशन सिंह अटरिया का कहना था कि मौजूदा समय में रिहंद से अतिरिक्त जल छोड़ना असंभव है। बिहार जिस रिहंद समझौते का हवाला देकर जल की मांग कर रहा है – असल में वैसा कोई भी समझौता उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच कभी नहीं हुआ है। वहीं बिहार जल संसाधन विभाग के अधिकारियों ने इस पूरे मामले पर केंद्रीय जल आयोग का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया है।
महत्वपूर्ण है कि बिहार के जल संकट का ये सारा तानाबाना उत्तर प्रदेश में जारी विद्युत संकट से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। प्रदूषण के अथाह भंडार पर बैठे रिहंद बांध की जलग्रहण क्षमता पिछले एक दशक में बहुत तेजी से घटी है। हर वर्ष मार्च का महीना शुरू होते ही रिहंद का जल स्तर तेजी से न्यूनतम बिंदु की ओर भागने लगता है। ऐसे में रिहंद के पानी का उपयोग करने वाले लगभग 15 हजार मेगावाट क्षमता के बिजलीघरों के सामने जबरदस्त उत्पादन संकट की स्थिति पैदा हो जाती है। उस वक़्त एनटीपीसी और उत्तर प्रदेश उत्पादन निगम के बिजलीघर जल विद्युत इकाइयों को बंद करने और पानी को नष्ट न करने की गुहार लगाने लगते हैं। यह वही समय होता है, जब बिहार और उत्तर प्रदेश में सोन नदी के किनारे स्थित तमाम जिलों में रबी की फसल के लिए पानी की जरूरत होती है, मगर सोन नदी पर स्थित इंद्रपुरी बैराज पानी के अभाव में दम तोड़ रहा होता है। वहीं समूचे बिहार को सिंचित करने वाला 125 साल पुराना सोन कैनाल सिस्टम किसानों, ग्रामीणों को मुंह चिढ़ाता नजर आता है।
यहां ये भी जान लेना जरूरी है कि सोन नदी पर ही उत्तर प्रदेश में बनाये गये सोन पंप कैनाल के माध्यम से सोनभद्र और मिर्जापुर जनपदों में सिंचाई का काम होता है।
सोना उगाने वाली सोन अब अभिशापित हो चुकी है। विकास की मौजूदा होड़ ने नदी के स्वरूप को छिन्न भिन्न करके, नदी के जल पर निर्भर किसानों-खेतिहरों के लिए मुश्किल की स्थिति पैदा कर दी है। बिहार के भोजपुर, अलवर, जहानाबाद, पाटलिपुत्र आदि जनपदों में जल संकट की वर्तमान परिस्थितयों से रबी की फसल में भारी नुकसान की संभावनाएं हैं। पूर्व में इंद्रपुरी बेराज द्वारा पूर्वी और पश्चिमी सोन कैनाल के माध्यम से इन इलाकों में 2410 क्यूसेक पानी छोड़ गया था, लेकिन ये पानी पूरी तरह से अपर्याप्त साबित हुआ है।
जल संसाधन विभाग, बिहार के अधिकारियों का कहना है कि अगर उत्तर प्रदेश हमारे हिस्से का पानी हमें दे दे तो बिहार की आवश्यकता पूरी हो सकती है – मगर उत्तर प्रदेश द्वारा समझौते का उल्लंघन किये जाने से हम आवश्यकता के सापेक्ष तीस से चालीस फीसदी ही पानी इंद्रपुरी बैराज के माध्यम से छोड़ पाते हैं। गौरतलब है कि सोन कैनाल प्रणाली द्वारा रोहतास, भभुआ, बक्सर, भोजपुर, औरंगाबाद, गया, जहानाबाद, पटना जिलों के लगभग 24 लाख एकड़ जमीन पर सिंचाई किये जाने का लक्ष्य रहता है, मगर ये लक्ष्य पिछले दो दशकों में कभी पूरा नहीं हो पाया। वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के जिन हिस्सों में सोन नदी के पानी से सिंचाई होती है, वहां पर भी किसान बेबसी और लाचारी से जूझते रहते हैं। सोन पंप कैनाल भी गर्मी शुरू होते ही बंद हो जाता है। हालात ये हैं कि किसी वक़्त देश में सर्वाधिक टमाटर पैदा करने वाले मिर्जापुर के इलाकों से ज्यादातर किसान एक बार पुनः वनोपजों की खेती की ओर लौटने लगे हैं।
सोन के सूखने की वजह सिर्फ उत्तर प्रदेश में ताप बिजलीघरों की रिहंद बांध पर अतिनिर्भरता और रिहंद जलाशय का जल संकट ही नहीं है। प्रदेश के सोनभद्र जनपद में बालू का अवैध खनन भी इस संकट की एक बड़ी वजह है। सत्ता समर्थित माफियाओं ने सोनभद्र में सोन नदी को बालू के खनन हेतु जगह जगह से बांध दिया है। कई जगहों पर तो वो पाइपों से होकर गुजरती है। ऐसे में नदी के जलस्तर का कम होना स्वाभाविक है। इसके अलावा सोन कैनाल प्रणाली की मरम्मत को लेकर भी बिहार की सरकार ने कभी गंभीर प्रयास नहीं किया। नीतीश कुमार द्वारा कैनाल के जीर्णोद्वार हेतु वादे तो बार बार किये गये, लेकिन उन्हें पूरा नहीं किया गया।
जल आंदोलन से जुड़े और बिहार के पत्रकार प्रभात कुमार शांडिल्य कहते हैं, आप राज्य सरकार की गंभीरता का अंदाजा इस तथ्य से लगा सकते हैं कि 1965 में अस्तित्व में आये इंद्रपुरी बैराज ने अपनी उम्र पूरी कर ली है, लेकिन सरकार के पास नया बैराज बनाने का या फिर इंद्रपुरी का अन्य विकल्प तैयार करने का कोई भी कार्यक्रम नहीं है।
जहां तक रिहंद समझौते का प्रश्न है, जिसे हम बाणसागर अनुबंध भी कहते हैं, बिहार को रिहंद जलाशय से कुल 50 लाख एकड़ फीट पानी दिया जाना था। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के बीच हुए इस समझौते का अगर पालन किया जाता तो स्थिति पूरी तरह से भिन्न होती। मगर अफसोस इस बात का है कि रिहंद बांध के अस्तित्व में आने के बाद से ही पूरी तरह से भविष्यगत जल संकट की अनदेखी की गयी। एक तरफ रिहंद की तलहटी में जमे कचड़े ने बांध को अधमरा कर दिया – हालात यूं हो गये कि बांध की जलग्रहण क्षमता को कम (880 से 970 फीट) करना पड़ा, वहीं दूसरी तरफ सोन नदी में जमा गाद के ढेर से सोन का न्यूनतम जल बिंदु भी पांच से छह फीट बढ़ गया। ऐसे में स्वाभाविक जल प्रवाह पर तो असर पड़ा ही, रही-सही कसर उत्तर प्रदेश में बन रहे दुनिया के सबसे बड़े एनर्जी पार्क ने पूरी कर दी। अब जबकि बिहार सोन नदी पर बहुद्देशीय बांध बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है, आने वाले दिन दोनों ही राज्यों के लिए संबंधों को और भी तल्खी भरा कर सकते हैं।
(आवेश तिवारी। लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। पिछले सात वर्षों से विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन और उन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आवेश से awesh29@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
सोनभद्र में रेत-लकड़ी से सोना बना रहे हैं हुक्मरान
,लेखक: आवेश तिवारी | March 31, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment

नेहरु का स्विट्ज़रलैंड आज कराह रहा है। जंगल के रखवालों ने जंगल को ही चर डाला। ओबरा और सोनभद्र वन प्रभाग में सुरक्षित वन भूमि पर गिट्टी बोल्डरों की सैकड़ों अवैध खदानों को संचालित कर अरबों रुपये की काली कमाई कर रहे जंगल विभाग का अगला निशाना वन्य जीव अभ्यारण्य हैं। हाल ये है कि सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली समेत पांच जनपदों में फैले कैमूर वन्य जीव अभ्यारण्य का अस्तित्व संकट में है। सूत्रों की माने तो लगभग 70 फीसदी अभ्यारण्य इस वक़्त अवैध खनन का केंद्र है। यही हाल प्रभागों का है। यहां अब शेर, बाघ, मोर और काले हिरण की आवाज़ सुनाई नहीं देती। यहां या तो धूल उड़ाते भारी वाहन नज़र आते हैं या फिर नदी तटों पर जनरेटर और मशीनों का भारी शोर, जिनके जरिए नदी को छाती चीरकर बालू निकाला जाता है। Read more
तुलसी के रामचरितमानस से छेड़खानी पर संतों में कोहराम
,लेखक: आवेश तिवारी | March 26, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 4 Comments

इन दिनों हिंदू धर्माचार्य कुछ ज़्यादा ही विवादों में हैं। कृपालू महाराज के बाद अब ताज़ा विवाद में घिरे हैं चित्रकूट स्थित तुलसीपीठ के पीठाधीश्वर और जगतगुरु रामभद्राचार्य। उन्होंने तुलसीकृत “रामचरितमानस “को ही संपादित कर उसका संशोधित संस्करण प्रकाशित करा दिया है। आडवाणी और अशोक सिंघल के बेहद करीबी माने जाने वाले और पूर्व राष्ट्रपति कलाम से संस्कृत भाषा में निपुणता हेतु पुरस्कृत स्वामी जी ने कहा है “श्रीरामचरितमानस कि दस हजार पंक्तियों के छोटे से कलेवर में लगभग तीन हजार अशुद्धियां”।
रामभद्राचार्य की इस हरकत से धर्माचार्यों और अखाड़ों के बीच हडकंप मचा हुआ है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने रामभद्राचार्य द्वारा किये गए इस कारनामे को अक्षम्य अपराध घोषित किया है। साथ ही जगतगुरु की पदवी छीनने पर विचार करने और अयोध्या में प्रवेश पर प्रतिबंध भी लगा दिया है। लेकिन हिन्दू धर्मगुरु से जुड़ा मामला होने के कारण विश्व हिन्दू परिषद खुद इस पूरे मामले में कुछ भी कहने से बच रही है। रामभद्राचार्य के पास करोडो रूपए की चल अचल संपत्ति है, और देश विदेश में इनके कई संस्थान भी चल रहे हैं जिनमे एक पब्लिकेशन हाउस और एक विश्वविद्यालय भी शामिल है । यही नहीं सत्ता के हलके में भी उनकी गहरी पैठ है। रामभद्राचार्य की ताक़त का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ताज़ा विवाद में जब लखनऊ के स्वतंत्र पत्रकार एस. ए. अस्थाना ने जगतगुरु के ख़िलाफ़ न्यायालय चले गए तो उन्हें डराया-धमकाया जाने लगा। पत्रकारों के भारी दबाव के बाद पुलिस ने अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की। Read more
चौंकिए मत, ये उत्तर प्रदेश है और यहां दलित हुक्मरान है
,लेखक: आवेश तिवारी | March 19, 2010 | ब्लॉग, हक़ की आवाज़ | 2 Comments
उत्तर प्रदेश का सोनभद्र जिला सुलग रहा है। गांव मगरदहा में आदिवासियों पर वनकर्मियों के हमले को 48 घंटे हो चुके हैं। हर बीतते पल के साथ वनकर्मियों के जुल्मों के नए-नए किस्से सामने आ रहे हैं। बुधवार को कोन के घने जंगलों में मगरदहा की ही लकिता अगरिया बेहोश पड़ी मिली। उसे इतना पीटा गया था कि उसका गर्भपात हो गया। आप तस्वीरों में लकिता को देख सकते हैं। बगल में शोक मनाते परिजन हैं। वो समझ नहीं पा रहे कि कानून के रखवाले कैसे इतनी बेरहमी से एक अजन्मे बच्चे की हत्या कर सकते हैं? Read more
मायावती के राज में दलितों, आदिवासियों पर दमन
,लेखक: आवेश तिवारी | March 18, 2010 | हक़ की आवाज़ | 3 Comments
पहली तस्वीर नोटों में ढकी मायावती की हैं। बाकी दोनों तस्वीरें जख्मी आदिवासी महिला लालती की हैं। उन्हें ये जख़्म किसी और ने नहीं बल्कि वनकर्मियों ने दिए हैं। लालती का गांव मगरदहा, उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में पड़ता है। बीते साल मगरहदा गांव के सभी लोगों को वन विभाग उजाड़ चुका था। कुछ दिन पहले उन्होंने दोबारा बसने की कोशिश की तो उनका ये हाल कर दिया गया। वनकर्मियों ने निहत्थे आदिवासियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। और सबक सिखाने के इरादे से सैकड़ों लोगों के बीच लालती के गुप्तांगों में लाठी डालने की कोशिश की। Read more
क्या लालू-मुलायम किसी “सुखो रानी” को टिकट देंगे?
,लेखक: आवेश तिवारी | March 15, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment
आजादी के बाद जिस जननेता की विचारधारा का सहारा लेकर कुर्सी का खेल सर्वाधिक किया गया, वो डॉ लोहिया हैं। लालू ,मुलायम सरीखे धुरंधरों ने खुद को लोहियावादी बताते हुए लोकतंत्र की छाती पर अपने महल बनाए, उन महलों में अपने भाइयों, भतीजों, और बच्चों का भरा पूरा कुनबा बसाया और खुद सिंहासन पर जा बैठे। भारत के इतिहास में किसी व्यक्ति के नाम को भुनाने का ये अब तक का सबसे बड़ा उदहारण है। देश में जितनी राजनीति लोहिया का नाम लेकर की गयी उतनी राजनीति न तो गांधी और न ही इंदिरा गांधी का नाम लेकर की गयी। मगर अफ़सोस लोहिया का नाम लेकर राजनीति करने वालों ने उनकी विचारधारा की बार-बार हत्या की। कुर्सियों के अंकगणित के लिए देश के सबसे उपजाऊ हिस्से में कुकुर भिडंत शुरू करा दी। इधर बीच संसद के भीतर और बाहर महिला आरक्षण को लेकर लालू, मुलायम और उनके समर्थकों द्वारा जो हो हल्ला किया जा रहा है वो सिर्फ एक शोर नहीं है। वो डॉ लोहिया की विचारधाराओं की निरंतर हो रही हत्याओं की श्रृंखला की महज एक कड़ी है। Read more
Exclusive: बेतुके आरक्षण से नक्सली बन रहे हैं आदिवासी
,लेखक: आवेश तिवारी | March 11, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 6 Comments
सोनभद्र। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के बीच उत्तर प्रदेश का आदिवासी इलाका। जिस आरक्षण से देश के करोड़ों दलितों और आदिवासियों को उनके लोकतांत्रिक अधिकार मिले, आरक्षण की उसी नीति में खामियों की वजह से यह इलाका अब धीरे-धीरे नासूर बनता जा रहा है। ग्रामसभाओं से लेकर संसद तक चुनाव लड़ने के लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित आदिवासी अब माओवादी बन रहे हैं। “बैलेट नहीं तो बुलेट” का नारा बुलंद हो रहा है।
उत्तर प्रदेश के जिस जिले में सबसे अधिक आदिवासी हैं, विधानमंडल में वहां से एक भी आदिवासी प्रतिनिधि का नहीं होना काफी कुछ कहता है। यह बताता है कि आरक्षण के नाम पर हित साधने में जुटे हमारे हुक्मरान कितने दोमुंहे, मूर्ख और भ्रष्ट हो सकते हैं। यहां माहौल इतना ख़राब है कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में मौजूद खामियों को दूर करने की कोशिश से जातिगत तनाव बढ़ जाता है और हिंसा शुरू हो जाती है। Read more
तसलीमा को पढ़ कर मोनिका लेविंस्की याद आती हैं
,लेखक: आवेश तिवारी | March 6, 2010 | ब्लॉग, स्पेशल रिपोर्ट | 20 Comments
इस्लामिक कट्टरता और पुरुष के पुरुष होने के ख़िलाफ़ किसी भी आम मुस्लिम स्त्री के भीतर चल रही लड़ाई उतनी ही पैनी हैं जितना तसलीमा के उपन्यासों का कथानक। उनमें नया कुछ अगर है तो वो सिर्फ़ सेक्स है। “का” से लेकर “अमर मेयेबेला” तक उनके लिखे उपन्यासों को पढ़कर उतनी ही उत्तेजना महसूस होती है जितनी जेम्स हेडली चेईस के किसी उपन्यास या फिर लोलिता को पढ़कर। जिस वक़्त उनकी कहानियां उत्तेजित नहीं कर रही होती, मन मस्तिष्क में इस्लामिक कट्टरता के ख़िलाफ़ हमले का वर्चुअल वर्ल्ड तैयार करती दिखती हैं। लज्जा को पढ़कर संभव है आप अपने मन में कितने ही अनदेखे चेहरों की आंखें फोड़ डाले या फिर उनका सर कलम कर दें। कभी-कभी मुझे उन्हें पढ़कर मोनिका लेविंस्की की भी याद आती है। जिसके और बिल क्लिंटन के सेक्स संबंधों के किस्से आज भी चाव से पढ़े जाते हैं । Read more
ये थ्री, इडियट्स नहीं हैं!
,लेखक: आवेश तिवारी | February 22, 2010 | ब्लॉग, हक़ की आवाज़ | 1 Comment
ये तीन थे। मगर इडियट्स नहीं थे। न ही किसी 70 एमएम की फिल्म के हीरो थे, जिनकी अदाकारी पर आप ताली बजाएं। ये तीनों देश के सर्वाधिक मेधावी छात्रों में से एक थे। अभी दो हफ़्ते पहले की बात है। इनमें से एक के. सुशील ने छात्रावास परिसर में आत्महत्या की कोशिश की। कृष्णमोहन ने इसी महीने 48 घंटों तक खुद को कमरे में बंद रखा। वहीं ज्ञानेंद्र के पास अपनी विधवा मां के सवालों के उत्तर में सिर्फ़ आंसू थे। देश के बड़े प्रौद्योगिकी संस्थानों में से एक भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान इलाहाबाद के इन होनहार छात्रों की इस हालत की वजह सिर्फ एक थी। इन दलित छात्रों ने संस्थान के निदेशक द्वारा संस्थान के ही एक विद्वान प्राध्यापक की मनमाने ढंग से असमय सेवा समाप्ति के आदेश को लेकर ई-मेल किए थे। इसका खामियाजा इन्हें विश्ववद्यालय से निलंबन के साथ बंधक बनकर चुकाना पड़ा। Read more
आज भी क्लास की अगली सीटों पर इनका बैठना गुनाह है…
,लेखक: आवेश तिवारी | February 19, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 2 Comments
वो आज भी क्लास की पिछली सीट पर बैठते हैं। आज भी वो दूसरे छात्रों के साथ खाना खाने से घबराते हैं। आज भी उन्हें जेहन में यह डर बैठा हुआ है कि किसी भी वक़्त उनकी सारी काबिलियत को धत्ता बताए हुए, उनके सारे सपने चूर-चूर कर दिए जाएंगे।
हम बात कर रहे हैं दलितों की सरकार के राज में जी रहे दलित छात्रों की। एच.बी.टी.आई कानपुर में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का छात्र राकेश कॉलेज के मेस में खाना नहीं खा सकता। वो और उसके साथी किसी भी सवर्ण छात्र के साथ एक कमरे में नहीं रह सकते। लखनऊ स्थित आई टी में पिछले पांच साल के आंकड़ों को देखा जाए तो प्रोजेक्ट वर्क में सबसे कम नंबर दलित छात्रों को ही मिले हैं। छात्र हमेशा खौफ में रहते हैं कि पता नहीं कब उनके स्वर्ण प्राध्यापक का डंडा उन पर चल जाए। Read more




