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दलितों, पिछड़ों के ख़िलाफ़ साज़िश है महिला आरक्षण बिल
,लेखक: अजय यादव | March 8, 2010 | हक़ की आवाज़ | 3 Comments
बात अगर यूं कहें कि भारत, एक ऐसा देश, जो अपने निर्माण के हजारों साल पहले से ही धर्म, जाति, क्षेत्र, समुदाय और विभिन्न संस्कृतियों के बीच उलझा हुआ देश था (है), आज वही देश कई तरह के संक्रमण को झेलते हुए न सिर्फ दुनिया की महाशक्ति बनने को बेकरार है, बल्कि संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने को प्रतिबद्ध भी। भारत के लिए यह ऐतिहासिक समय ही है कि महिला दिवस के मौके पर दक्षिणपंथी-वामपंथी-कांग्रेसी और कुछ क्षेत्रीय दल भी राजनीति में महिलाओं को एक तिहाई हिस्सेदारी देने के लिए एकमत हो गये हैं। ‘आरक्षण विरोधियों’ या यूं कहिए कि पिछड़ों का प्रतिनिधित्व करने वाली नाममात्र की कुछ क्षेत्रीय पार्टियों को छोड़ दें तो आज पूरा देश इस बात पर सहमत है कि महिलाएं, जो किसी भी वर्ग, वर्ण, जाति, क्षेत्र, समुदाय, धर्म या संस्कृति की हों, ‘दलित’ ही हैं, इसलिए उन्हें आरक्षण देना देश और समाज के हित में है – जाहिर है यह सब पढ़कर बहुतों को अच्छा लग रहा होगा, और इनमें भी सबसे ज्यादा वे लोग होंगे जो महिला आरक्षण के मामले में भरत (भारत) के साथ हैं। Read more




