क्रीमी लेयर को क्यों चाहिए महिला आरक्षण
लेखक: दिलीप मंडल | March 11, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 10 Comments
आरक्षण की पिछले 20 साल में हुई कोई चर्चा क्रीमी लेयर के बगैर पूरी नहीं हुई है। सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण संबंधी मंडल कमीशन लागू होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के दायरे से क्रीमी लेयर को बाहर करने का फैसला सुनाया। इसी आधार पर 2006 में भी केंद्र की यूपीए सरकार के उच्च शिक्षा संस्थानों में ओबीसी आरक्षण लागू करते समय क्रीमी लेयर को कोटे से बाहर रखा गया। यहां तक कि हाल ही में जब पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य सरकार की नौकरियों में मुसलमानों के लिए 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया तो उसमें भी क्रीमी लेयर को आरक्षण नहीं देने की व्यवस्था की गई। यहां तक कि दलितों और आदिवासियों के आरक्षण में, संविधान और कानून में कहीं प्रावधान न होने के बावजूद, बीच बीच में ये शिगूफा छेड़ा जाता है कि यहां भी क्रीमी लेयर को कोटे से बाहर किया जाए।
ऐसे में महिला आरक्षण के साथ क्रीमी लेयर की चर्चा क्यों नहीं की गई? इससे ही जुड़ा सवाल है कि क्या ये दरअसल कमजोर के सशक्तिकरण का कानून है? महिला आरक्षण के जरिए सरकार विधायिका में जेडर डायवर्सिटी यानी लैंगिक आधार पर विविधता लाना चाहती है। इसके लिए कानून बनाने की प्रक्रिया चल पड़ी है। इस विधेयक को लेकर पार्टियों के स्तर पर जिस तरह की सहमति है उसमें इसके कानून बनने में कोई अड़चन नहीं है। लेकिन क्या विधायिका में जेंडर डायवर्सिटी लाने की ये कोशिश सोशल डायवर्सिटी को खत्म करके या कमजोर करके आगे बढ़ेगी? भारत के विशिष्ट संदर्भ में सामाजिक विविधता का काफी महत्वपूर्ण स्थान है, जिसे हमारे संविधान निर्माताओं ने माना और इसके लिए कई संवैधानिक प्रावधान किए गए। समाज के हर तबके को, खासकर पीछे रह गए तबकों को भी देश अपना लगे और राजकाज से लेकर संसाधनों में उनका हिस्सा सुनिश्चित हो, इसके लिए ही आरक्षण का प्रावधान रखा गया है।
महिला आरक्षण से जुड़ा सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है कि क्या ये कानून विधायिका यानी संसद और विधानमंडलों की सामाजिक विविधता को नष्ट करेगा। इसी की व्याख्या के क्रम में ये बातें आ रही है कि भारत की सामाजिक विविधता, जो आजादी के बाद शुरुआती लोकसभाओं में नजर नहीं आई थी और अगड़े जाति समूहों का वर्चस्व विधायिका पर था, वहां से देश अब काफी आगे बढ़ चुका है। आजादी के बाद से ही संसद औऱ विधानसभाओं में दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण था। इस आरक्षण को कभी क्रीमी लेयर के दायरे में नही रखा गया क्योंकि इसे भारतीय राज्य के साथ इन समूहों के समझौते के तौर पर देखा गया। इस आरक्षण की वजह से संसद और विधानसभाओं में दलित और आदिवासियों की मौजूदगी हमेशा रही। शुरुआत में दस साल के लिए किए गए इस प्रावधान को हमेशा आगे बढ़ाया जाता रहा। लेकिन ओबीसी जातियों का संसद और विधानसभाओं में बड़े पैमाने पर आना साठ के दशक में शुरू हुआ और नब्बे के दशक के बाद ये प्रक्रिया एक तरह से पूरी हो गई। हालांकि संसद में अल्पसंख्यकों और खासकर मुसलमानों की संख्या चिंताजनक रूप से कम रही है।
इस समय महिला आरक्षण का विरोध जिस आधार पर किया जा रहा है, उसका तर्क यही है कि महिला आरक्षण दशकों के सामाजिक बदलाव और पिछड़ा उभार को फिर से नकार देगा और संसद का चरित्र एक बार फिर वैसा हो जाएगा, जैसा पिछड़ा उभार से पहले था। इस तर्क की अपनी कमजोरियां हैं और पंचायतों का अनुभव भी बताता है कि वोट के आधार पर जब चुनने या खारिज करने के फैसले होंगे तो उसमें संख्या का महत्व खत्म नहीं हो होगा। किसी सीट पर किसी जाति समूह या जातियों और धार्मिक समूहों का समीकरण अगर प्रभावशाली है तो उस सीट पर उस समीकरण का उम्मीदवार सिर्फ इसलिए नहीं हार जाएगा कि वो सीट महिलाओं के लिए रिजर्व हो गई है। लेकिन शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े समूहों को शुरुआती दौर में कुछ दिक्कतें जरूर आएंगी क्योंकि शैक्षणिक पिछड़ेपन की वजह से इन समूहों की महिलाओं को न सिर्फ चुने जाने में दिक्कत होगी बल्कि राजकाज के बाकी काम करने में भी उन्हें शुरू में कुछ असुविधा हो सकती है।
वैसे संविधान को देखें तो महिला आरक्षण का विधेयक विशेष अवसर के मान्य सिद्धांत के तहत नहीं है। भारत का संविधान बनाते समय कई वंचित समूहों का नाम लेकर और कुछ का नाम लिए बगैर शासन को ये अधिकार दिया गया कि उनके लिए विशेष उपबंध लाए जा सकते हैं और उन्हें विशेष अवसर दिए जा सकते हैं। समानता के मौलिक अधिकार को विशेष अवसर के लिए बाधक नहीं बनने दिया गया। लेकिन विधायिका में महिलाओं के लिए विशेष अवसर की बात संविधान निर्माताओं ने कहीं नहीं की। ठीक उसी तरह जैसे अल्पसंख्यकों के लिए संसद-विधानसभाओं और नौकरियां या शिक्षा में आरक्षण का प्रावधान नहीं किया गया है। अल्पसंख्यकों के आरक्षण का संविधान के आधार पर विरोध करने वाले महिला आरक्षण का समर्थन किस आधार पर कर रहे हैं ये समझना मुश्किल है।
महिला होना अपने आप में पिछड़ेपन का एक बिंदु तो है, लेकिन जैसे कि सभी समुदायों के पुरुष बराबर नहीं होते, वैसे ही सभी समुदायों की महिलाएं भी बराबर नहीं होतीं। एक सवर्ण महिला और पिछड़ी जाति की एक महिला की बराबर सामाजिक हैसियत नहीं होती। महिलाओ में भी मुस्लिम महिलाओं का पिछड़ापन ज्यादा है और ये बात तमाम तरह के सर्वे और रंगनाथ मिश्रा कमीशन में भी निर्विवाद रूप से साबित हुई है कि मुस्लिम महिलाएं इस देश में सबसे पिछड़े समुदायों में हैं।
ऐसी हालत में अगर महिला आरक्षण को सही मायने में विशेष अवसर का सिद्धांत साबित होना है तो महिलाओं को सिर्फ महिला के तौर पर देखना अनुचित होगा। इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि वो अगड़ी महिला हैं, वो दलित महिला हैं, वो ओबीसी महिला हैं और वो अल्पसंख्यक महिला हैं। महिला कोटे के अंदर कोटे का वही आधार है जो आरक्षण का आधार है। यानी जो कमजोर है उसे विशेष अवसर मिले, ताकि वो भी लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी निभाए। साथ ही महिला आरक्षण के अंदर अगर क्रीमी लेयर भी लागू हो तभी आरक्षण का फायदा उन्हें मिलेगा, जिनको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। इन उपायों के बगैर लागू किया गया महिला आरक्षण प्रतिगामी कदम साबित हो सकता है और अगर इसे मौजूदा स्वरूप में लागू किया गया तो हो सकता है कि अगली संसद का सामाजिक संरचना बदल जाए। इस कानून को पारित कराने को लेकर कांग्रेस-बीजीपी और वामपंथी दलों की एकता भी कई सवाल खड़े करती है।

दिलीप मंडल
((वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल इन दिनों भारतीय जनसंचार संस्थान में छात्रों को पत्रकारिता के मायने सिखा रहे हैं।))
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जिस तरह संसद में पिछड़ों और दलितों के मुद्दे लाल जी,मुलायम जी,शरद जी,पासवान जी,मायावती जी वगैरह उठा सकते हैं उसी तहर महिलाओं के मुद्दे वह महिलाएं भी उठा सकती हैं। जिनकी आलोचना आप करने का प्रयास कर रहे हैं। जिस तरह से हम शोषण के विभिन्न सोपानों एवं प्रकारों से दलित,आदिवासी और पिछड़ा घोषित करते हैं उसी तरह महिला को एक अलग शोषित वर्ग के रूप में चिन्हित किया जाता है।
महिलाओं का शोषण किसी राजनीतिक,सामाजिक,आर्थक आधार पर नहीं होता। उनका शोषण जेंडर के आधार पर होता है। हर स्टेªटा समान रूप से में होता है। एक महिला मजदूर को कम तनख्वाह मिलती है तो एक फिल्मी हिरोईन को भी अपने पुरुष साथी से कम राशि मिलती है।
आपके परिचय में लिखा है कि आप शिक्षक हैं। अतः उम्मीद है आप मेरी बात आसानी से समझ लेंगे। आपको यह पता ही होगा कि दूसरे तरह के शोषणों में व्यक्ति की सामाजिक,राजनीतिक हैसियत पूरे मामले को पलट देती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बहन मायावती है। बहुत से सवर्ण बहनजी का पैर छूते हैं। उनके सामने गिड़गिड़ाते हैं। लेकिन यूपी के बहुचर्चित गेस्ट हाउस काण्ड में बहनजी के साथ यादव ब्रिगेड ने जो दुर्व्यवहार किया वो उनके महिला होने के कारण ही हुआ। आपको समझ आता होता कि भंवरी देवी का बलात्कार होता है तो दूसरी तरफ किसी दुतावास के अधिकारी के संग भी ऐसा होता है। जब बात महिला-पुरुष की होगी तो कोई पुरुष सवर्ण-अवर्ण नहीं रह जाता। अमीर-गरीब नहीं रह जाता। सड़क पर एक आम लड़की छेड़ी जाती है तो रेल में महिला आईएएस छेड़ी जाती है।
आप शिक्षक हैं तो थोड़ी बहुत जानकारी दूसरे क्षेत्रों की भी रखते होंगे। आप जानते होंगे कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिला आंदोलनों को अकमोडेट करने की कम्युनिस्टों ने बहुत कोशिश की लेकिन वो असफल रहे। क्योंकि उनका मूल अंजेण्डा मजदूरों के लिए सेट किया गया था। एशिया में आने के बाद उसमें किसानों को जोड़ा गया। महिलाओं ने अपनी लड़ाई खुद लड़ी। उन्होंने अपनी सैद्धांतिकी विकसित की। सिमोन द बोउवार तो महा अस्त्विवादी की पत्नि थीं। उन्होंने सार्त्रे की तरह दार्शनिक अमूर्तिकरण के बजाय स्त्री समस्यायों पर अपना सबसे महत्वपूर्ण काम किया। सार्त्रे के अमूर्त समस्याओं से ज्यादा जरूरी उन्हें स्त्रियांे की ठोस समस्याएं लगी। फिलहाल इस विषय पर मैं इतना ही यही कहुंगा।
आज जब मैं इंटरनेट पर आया तो निराशा हुई। मेरी पिछली टिप्पणी का किसी टिप्पणीकार ने संज्ञान नहीं लिया। सब के सब गोबर-विमर्श में उलझे रहे।
नोट- इंटरनेट पर मैंने कई लोगों के विचार-विमर्श पढ़े। यहाँ पर लोग विमर्श में अपनी भूल-चूक नहीं स्वीकार करते। जो दल भारी पड़ जाता है वो दहाड़ता रहता है। जिस दल के पास कोई जवाब नहीं बचता वो अचानक से गायब या चुप हो जाता है।
अनुरोध – लालु जी, मुलायम जी, शरद जी, रामविलास जी और बहन जी की आर्थिक हैसियत को ध्यान में रखकर ही मेरी टिप्पणी पर विचार करें।
अखिलेश्वर जी, आपका ये दुख शायद सही नहीं है कि आपकी पिछली टिप्पणी का संज्ञान नहीं लिया गया और बाकी सब गोबर विमर्श है। इंटरनेट पर विमर्श का अपना कायदा है और सबसे बड़ा कायदा ये है कि कोई कायदा ही नहीं है। मेरी बात का भी कोई संज्ञान ले ये क्यों जरूरी है।
बहरहाल आपने जो लिखा है उससे मेरी सहमति है कि महिला होना अपने आप में वंचित होना है। लेकिन समान आर्थिक हैसियत के बावजूद एक दलित या मुस्लिम महिला और एक ब्राह्मण महिला में ज्यादा वंचित कौन है। इसका भाष्य करेंगे तो शायद आप समझ पाएंगे कि किसे आरक्षण की जरूरत ज्यादा है। महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप का क्रिटीक यही है कि ५० फीसदी आरक्षण महिलाओं को दिया जाए, लेकिन कानून बनाने वाली महिलाओं में भारत की विविधता दिखे, न कि कोई एक टुकड़ा भारत।
धन्यवाद
बिल के बखेड़े ने बिगाड़ा सबका जायका
महिला आरक्षण बिल पर एक-एक दिन भारी पड़ता जा रहा है। सोमवार से गुरुवार के बीच देश के सियासी माहौल में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। लोकसभा में पिछले चार दिनों से चल रही महाभारत ने कमोबेश हर पार्टी का सियासी जायका खराब कर दिया है। बिल का प्रारुप बदले-न-बदले, रफ्ता-रफ्ता कामयाबी समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के एजेंडे का रुख लेती जा रही है। बिल के बहाने दोनों पार्टियां अपने-अपने हिस्से के निकट भविष्य की राजनीति जिस दिशा में हांकना चाह रही थीं, उसमें उन्हें फिलहाल तो सफलता मिलती दिख रही है। मसलन, वे देश के दलित, मुस्लिम, पिछड़े मतदाताओं और बुद्धिजीवियों तक ये संदेश पहुंचाने में सफल रही हैं कि बिल दूध का धुला नहीं। उसके माध्यम से पिछड़े, मुस्लिम, दलित समुदायों का राजनीतिक हक मारने का छल किया जा रहा है। मुस्लिम संगठन एकजुट होने लगे हैं। उनकी अंगड़ाई को ताजगी दी है राजद-सपा-जदयू अध्यक्षत्रयी के बिल विरोधी अभियान ने। उनकी सफलता का दूसरा पड़ाव गुरुवार को तब देखने-सुनने को मिला, जब भाजपा के अंदर से वैसी ही गूंज बाहर आने लगी। पार्टी की सुबह की मीटिंग में जितने सांसद बिल के मौजूदा प्रारूप पर ऐतराज जता रहे थे, शाम को आडवाणी के घर दोबारा हुई पार्टी की मीटिंग में एक नाम और जुड़ गया मेनका गांधी का। उधर, कांग्रेस के एक मुस्लिम सांसद ने भी अपनी पीड़ा सरेआम कर दी। भाजपा-कांग्रेस की इन चिंगारियों पर लोकसभा घी उड़ेल दिया राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने। लालू ने कहा कि कहा कि विधेयक का समर्थन कर रही सभी पार्टियों के अधिकांश सांसद इसके विरोध में हैं और व्हिप के भय से खुलकर कुछ नहीं बोल पा रहे हैं। उन्हें निजी बातचीत में कई सांसदों ने बताया है कि उन्होंने बिल नहीं, अपने ‘डेथ सर्टिफिकेट’ पर हस्ताक्षर किए हैं। लालू आज लोकसभा में पूरे तेवर में नजर आए। उन्होंने अपने खिलाफ श्वेतपत्र लाने वाली ममता बनर्जी को यह कर कर मुस्कराने के लिए मजबूर कर दिया कि वेस्ट बंगाल में उन्होंने (ममता) वामदलों से बढ़त ले ली है और भविष्य में उनसे सहयोग की उम्मीद है। इसके अलावा लालू ने राहुल गांधी के कामकाज की भी सराहना की। लालू ने माकपा नेता बासुदेव आचार्य द्वारा टोकाटाकी किए जाने पर उन्हें आड़े हाथ लेते हुए कहा कि यहां तीन यादवों की बात हो रही है, हम सब अपनी अपनी पार्टी के सुप्रीमो हैं। आपके यहां तो सब सुप्रीम खत्म हो गया है। आप न तो पाकिस्तान में हैं और न ही भारत में। ममता जी आपसे लीड ले गयी हैं। महिला विधेयक के विरोध में पिछले चार दिनों से बार बार आसन के समक्ष आने पर अध्यक्ष मीरा कुमार की नाराजगी पर भी उन्होंने कहा कि हम लोगों का फैशन नहीं है कि आपकी सीट तक जाएं लेकिन जब कोई नहीं सुनता है तो नजदीक जाना पड़ता है। इसको अन्यथा ना लें। लालू के सुर में सुर मिलाते हुए आज मुलायम सिंह और शरद यादव भी चुप नहीं बैठे। जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने सदन में दावा कर दिया कि अधिकतर सांसद इस विधेयक के विरोध में हैं और अगर पार्टियों के व्हिप के बिना मतदान कराया जाए तो 70 फीसदी इसके विरोध में मत देंगे और ऐसा नहीं हुआ तो मैं इस्तीफा दे दूंगा।समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने लालकृष्ण आडवाणी पर चुटकी लेते हुए कहा कि महिला आरक्षण होने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ना है, क्योंकि वह तो रिटायर हो रहे हैं।
इसे भी सपा और राजद की बिल विरोधी राजनीति की गुरुवार तक की बड़ी कामयाबी ही मानना होगा कि वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा में चर्चा के दौरान कह दिया, अब केन्द्र सरकार महिला आरक्षण विधेयक के सभी मुद्दों पर बहस के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने को तैयार है। सरकार चाहती है कि इस विधेयक पर सभी मतभेदों को सुलझाकर आम सहमति बना ली जाए। तभी विधेयक लोकसभा में पेश किया जाए। इस मसले पर प्रधानमंत्री भी विरोध करने वाले नेताओं से बात कर चुके हैं। कल राज्यसभा में ध्वनिमत, फिर 1 के मुकाबले 186 मतों की वोटिंग से बिल पारित हो जाने पर कांग्रेस जिस जश्न के माहौल में डूबने जा रही थी, आज उस पर बिल-समर्थक भाजपा के भीतर से उठी बिल-विरोधी चिंगारी ने मायूसी थोप दी। इस पूरे बिल-समर्थक-विरोधी अंधड़ में वामदल की आवाज कहीं दबी-दबी सी पड़ी है। तृममूल कांग्रेस बार-बार यू टर्न ले रही है, लेकिन भाजपा के भीतर के तूफान ने बिल समर्थकों की नींद हराम कर दी है। अब सवाल सिर्फ बिल के पास होने, न होने तक नहीं रह गया है। दोनों दलों, खासकर कांग्रेस की निगाहें अपने निकट भविष्य के दलित-पिछड़े-मुस्लिम वोट बैंक को सहमी निगाहों से टोहने लगी हैं। पार्टी कर्णधारों को लगने लगा है कि दो-चार दिनों तक ऐसी ही फिंजा बनाने में राजद-सपा-जदयू अध्यक्षत्रयी कामयाब रही तो आगे ये पलीता बुझाए नहीं बुझने वाला हो सकता है। दरअसल, भाजपा के भीतर की ताजा दरार ने कांग्रेस को तत्काल लचीला रुख अख्तियार करने को विवश कर दिया है। वह इसलिए कि कहीं आधी छोड़ सारी पर धावै वाली कहावत न चरितार्थ हो जाए। (आधी मिलै न पूरी पावै)।
विपक्ष की नेता नेता एवं भाजपा सांसद सुषमा स्वराज भले कहें कि उनकी पार्टी ने लोकसभा में भी इसका समर्थन करने का फैसला किया है और इसी संबंध में पार्टी मुख्यालय पर आज सुबह हुई बैठक में वरिष्ठ नेताओं ने ये निर्णय ले लिया है और अरूण जेटली, रमेश बैस, मुरली मनोहर जोशी, अनंत कुमार आदि की मौजूदगी में बिल के समर्थन के लिए जरूरत पड़ी तो व्हिप भी जारी किया जाएगा। लेकिन बिल के मौजूदा प्रारूप पर अचानक खुली जुबान से उंगली उठाने लगे नाराज भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ, सांसद यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा, हुकुमदेव नारायण आदि के साथ शाम की मीटिंग में मेनका गांधी भी शुमार हो गईं। उनके विरोध की आवाज तत्काल पूरे देश में गूंज गई। सांसद योगी भाजपा की सुबह की ही मीटिंग में ऐतराज जता चुके थे कि बिल के समर्थन के लिए व्हिप जारी करना ठीक नहीं होगा। सांसद हुकुमदेव नारायण कह चुके थे कि महिला आरक्षण बिल में दलित और पिछड़े वर्ग के लिए विशेष प्रावधान होना बहुत जरूरी है। मामला गंभीर होते देख दोबारा शाम को लालकृष्ण आडवाणी के ठिकाने पर हुई मीटिंग में मेनका गांधी ने बिल के मौजूदा प्रारूप की जोरदार मुखालफत कर दी। यद्यपि लोकसभा में भाजपा के उपनेता गोपीनाथ मुंडे ने भी अपने 70 फीसदी सांसदों के महिला आरक्षण विधेयक के खिलाफ होने की खबरों का खंडन करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर पार्टी में कोई मतभेद नहीं है। हां, इस मुद्दे पर पार्टी के कुछ सदस्यों की व्यक्तिगत राय भिन्न हो सकती है। जबकि सांसद योगी ने गुरूवार को भी दोहराया कि इस मुद्दे को लेकर पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का परिचय दिया जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी भी दे डाली कि अगर राज्यसभा की तरह लोकसभा में भी मार्शलों के साए में यह विधेयक पारित कराने की कोशिश की गई तो वह इस्तीफा दे देंगे।
महिला आरक्षण विधेयक के विरोध के पीछे पिछड़े एवं दलित-मुस्लिम राजनीति का चुनौतीपूर्ण एजेंडा काम कर रहा है। सपा को जहां अपने खोए मुस्लिम जनाधार की चिंता रही है, वही बिहार में लालू प्रसाद यादव आगामी विधानसभा चुनाव में पिछड़े एवं मुस्लिम फैक्टर पर नजर गड़ाते हुए बिल विरोध को हवा दे रहे हैं। कांग्रेस, भाजपा के दलित, मुस्लिम एवं पिछड़े समुदायों से आए सांसदों का अंदरूनी तौर पर मुखर होने की एक वजह यही है। विरोध के स्वर में वे सांसद भी स्वर मिलाए हुए हैं, जिन्हें डर है कि उनकी सीट महिला नेताओं के हवाले हो सकती है। फिलहाल सबसे बड़ी सूचना ये मिल रही है कि इस विधेयक के खिलाफ देश भर के मुस्लिम संगठन एकजुट होने जा रहे हैं। बिल पास कराने से कांग्रेस और भाजपा जिस वाहवाही की वारिस बनीं, अब वही उनके दलित-मुस्लिम वोट बैंक के गले का फांस बनने वाला है। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह उत्तर प्रदेश में दलित-मुस्लिम वोट बैंक संभालने-सहेजने में जुटे हैं, उधर भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी हाल ही में पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में दलितों को गले लगाने का संदेश दे चुके हैं। अब महिला आरक्षण-बिल ने कांग्रेस-भाजपा दोनों के दलित-मुस्लिम समीकरण को डांवाडोल दिशा में मोड़ दिया है। उसी (बिहार और यूपी में मुस्लिम-यादव एका की संभावना) को हवा देने में जुटे हैं सपा, राजद और जदयू अध्यक्ष। बसपा सधे पांव इस हालात पर आगामी रणनीति तैयार करने में व्यस्त है। ताजा सूचना के अनुसार चार मुस्लिम एवं दलित संगठनों ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल, मूवमेंट फॉर इम्पावरमेंट ऑफ इंडियन मुस्लिम, सामाजिक न्याय मोर्चा और डॉक्टर भीमराव आंबेडकर सेवादल ने एक साझा बयान में कहा है कि महिला आरक्षण विधेयक वास्तव में मुसलमानों को राजनीतिक रूप से खत्म करने की साजिश है। इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद महिलाओं के लिए भी सीटें आरक्षित हो जाएंगी। इस आरक्षण से पहले से ही राजनैतिक रूप से कमजोर मुसलमानों की सियासत में हिस्सेदारी घटेगी। सेक्युलर फ्रंट के अध्यक्ष और समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य जमशेद जैदी का कहना है कि महिला आरक्षण बिल के जरिए भाजपा अपने मुस्लिम विरोधी एजेंडे को लागू करना चाहती है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के अलावा पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय मुस्लिम संगठन जल्द एक साथ इस विधेयक का विरोध तेज करने जा रहे हैं। राजद, सपा, जदयू अध्यक्ष की असली चिंता दलित नहीं बताए जाते हैं। उनका मकसद पिछड़ों एवं मुस्लिमों को एक मंच पर लाना लग रहा है। दलित सांसद अलग मोरचेबंदी के जरूरतमंत बताए जाते हैं। इस तरह के मोरचे की तस्वीर भी जल्द सामने आ सकती है। ऐसी सुगबुगाहट पार्टियों के भीतर चल रही बताई जाती है।
क्यों कि वो भी इसी देश की निवासी हैं…क्यों कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व लोकसभा मैं कम हैं……क्यों कि शाहवानो प्रकरण जैसे महिला विरोधी कारनामे लोकसभा मैं तभी पारित हो जाते हैं क्यों कि महिलाओं की संख्या लोकसभा मैं अंगुलियों पर गिनी जा सकती ैहं
इससे बड़ा असत्य क्या हो सकता है कि महिलाएं महिलाओं के हित में कानून बनाएंगी। फिर तो कांग्रेस और बीजेपी और लेफ्ट के ओबीसी, मुस्लम और दलित-आदिवासी सांसदों को महिला आरक्षण के खिलाफ वोट डालना चाहिए। ऐसा हो सकता है क्या?
ह्विप और दलबदल विरोधी कानून के बाद अब अगर कोई कहता है कि महिला सांसद महिला की बात करेगी और दलित सांसद दलित की बात करेंगे, तो उसे एक बार संविधान और उसमें हुए संशोधन के बारे में चंद मिनट का वक्त निकालकर पढ़ लेना चाहिए।
iimc main chatron ko patrakarita ke mayne sikhane ke lie bahut log hain dilip mandal ki zarurat nahi hai.
हां भई। तुम लोगों को उनकी जरूरत क्यों होगी। वहां भी तुम्हें कोई पांडे, तिवारी, सिंह, प्रधान, श्रीवास्तव चाहिए होंगे। आज तक उन्होंने ही तो सारी पत्रकारिता पढ़ाई है। आज भी सभी संस्थानों पर उन्हीं के कब्जे हैं। और कोई उनकी नीतियों के विरुद्ध हल्की सी बात कहे तो उसकी ज़रूरत ख़त्म हो जाती है।
शुरू हो गए व्यक्तिगत हमले। यही सवर्णों की खासियत है। इन्हें ब्राह्मणवाद नहीं दिखता है। यादववाद तुरंत दिख जाता है। तार्किक से तार्किक बाद भी इन्हें हजम नहीं होती तो छींटाकशी शुरू कर देते हैं।
मंडल जी इन लोगों को आजादी के साठ साल बाद तक और न जाने आजादी से पहले कितने सालों तक सवर्णों के पैर छूने की बात याद नहीं रहेगी… बस इनको याद है साठ साल में तीन या चार पिछड़े वर्ग के नेता जिनका सवर्ण पैर छूते हैं.. वो भी आत्मियता से नहीं बल्कि लालच से… पता नहीं सारे पापों और अन्याय को ये लोग सिर्फ मायावती की आड़ लेकर क्यों जस्टीफाई करने की कोशिश करते हैं… क्या साठ साल में सिर्फ इमानदारी और नैतिकता के लिए दलित नेता ही जिम्मेदार है… आप हमाम में नाक तक डूब हुए हैं… उससे कोई मतलब नहीं है… बात हो रही है क्रीमी लेयर की तो आरक्षण के विरोध करने वाले लोगों को शर्म नहीं आती आज महिला आरक्षण के नाम पर ढोल पीटने में( मैं महिला आरक्षण का विरोधी नहीं हूं) लेकिन महिलाओं की हैसियत भी देखना जरूरी है… देश में कुछ महिलाओं अपने पति के बदसलूकी और ऐय्याशी का शिकार हो रही है तो कुछ महिला सनातन से खाने पीने के लिए तरस रही है… जिन सवर्ण महिलाओं की बात कर रहे हैं… उन्हें समाज नहीं दबा रहा है,.. बल्कि वो अपने ही लोगों के दबाने से दबी हुई हैं.. और उन्हें घर में उसका विरोध करना चाहिए.. लेकिन दलित, पिछड़ी और आदिवासी महिला को एक खास वर्ग ने जाति के नाम पर दबाया है…