मेरा पैसा, मेरा मजहब, मेरी आज़ादी और मेरी नागरिकता

एम एफ हुसैन साहब ने एनडीटीवी की पत्रकार बरखा दत्त को एक इंटरव्यू दिया है। अगर टेलीविजन पर वह इंटरव्यू आपने देखा-सुना नहीं है तो उसे पढ़ना ज़रूर चाहिए। हिंदी पाठकों के लिए हमने एनडीटीवी की अंग्रेजी वेबसाइट से उस इंटरव्यू के कुछ हिस्सों का अनुवाद किया है। आप उसे पढ़ सकते हैं। लेकिन हम आपसे यही गुजारिश करेंगे कि एक बार अंग्रेजी का वह पूरा इंटरव्यू पढ़िएगा। उससे इस विवाद का एक दूसरा पहलू भी सामने आएगा। - मॉडरेटर

बरखा दत्त – आपने भारतीय पासपोर्ट सरेंडर क्यों किया और कतर की नागरिकता क्यों कबूल की? आखिरकार आप कई साल से देश से बाहर रह रहे थे, ऐसी नौबत क्यों आई कि आपने भारतीय नागरिकता छोड़ दी?
एम एफ हुसैन – मैं मानता हूं कि इसकी एक बड़ी वजह है। 2006 में तीन बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम करने का फैसला किया।
- मोहनजेदाड़ो से मनमोहन सिंह तक भारतीय सभ्यता का इतिहास – बेबिलोन काल तक दूसरी सभ्यताओं का इतिहास
- और सिनेमा, जो मेरे दिल के बहुत करीब है – यह मेरा प्यार है – भारतीय सिनेमा के 100 साल। सौ साल अगरे वर्ष पूरे हो रहे हैं।

मैं ये सभी प्रोजेक्ट्स भारत में करना चाहता था। लेकिन वहां कई बाधाएं थीं। आप मानिए, वहां काम करना आसान नहीं। पहला, वहां स्पॉन्सर ढूंढना मुश्किल है। मैं इंतज़ार कर रहा था और मैंने 2004 में यह फैसला लिया जब मैं स्पॉन्सर की तलाश में दुबई आया था। लंदन में भारतीय सभ्यता के प्रोजेक्ट के लिए मुझे एक प्रायोजक मिला। और कतर में शेख मूजा ने दूसरी सभ्यताओं पर काम करने न्योता दिया और अबु धाबी भारतीय सिनेमा के प्रोजेक्ट को स्पॉन्सर करने के लिए तैयार हो गया। वहां के टैक्स स्ट्रक्चर की वजह से (आप किसी भी कॉरपोरेट से पूछ लीजिए और आपको पता चल जाएगा) इन सभी प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए मुझे एनआरआई बनना था। यह केवल यहीं नहीं है, पूरी दुनिया में ऐसा ही है। स्वीडन में बर्गमैन, पोलान्सकी को क्या हुआ. उन्हें वहां से जाना पड़ा क्योंकि इनकम टैक्स विभाग के लोग पीछे पड़ गए थे।

अगर मैं 40 साल का होता तो मैं एड़ी-चोटी का जोर लगा कर लड़ लेता, लेकिन यहां मैं सारा ध्यान अपने काम पर केंद्रित करना चाहता हूं। मैं कोई तनाव नहीं चाहता। मैं सारी सुविधाएं और आराम चाहता हूं।

जैसा कि वो कहते हैं हिंदी हैं हम वतन हैं, सारा जहां हमारा

ये सीमाएं केवल सियासी सीमाएं हैं। खासकर विजुअल आर्ट तो युनिवर्सल भाषा है। आप दुनिया के किसी भी देश में हो सकते हैं लेकिन आप जो काम करते हैं उसका 5000 साल पुरानी महान भारतीय संस्कृति से गहरा जुड़ाव होता है।

बरखा दत्त – हुसैन साहब आपकी बात से लगता है कि आपने एक व्यावहारिक फैसला लिया है। उन अवसरों को ध्यान में रख कर जो भारत में नहीं हैं। लेकिन यह कहते हुए कोट किया गया है कि भारत ने आपको ठुकरा दिया है। क्या वाकई में उसने आपको कतर की नागरिकता कबूल करने के लिए प्रभावित किया है?
एम एफ हुसैन – मैं कभी नहीं कहा कि भारत ने मुझे ठुकरा दिया है। मेरा पूरा नजरिया सामने है। जैसा की मैंने कहा यहां अवसर मौजूद थे, इसलिए मैं यहां आया। आखिर नागरिकता है क्या? यह केवल एक पेपर का टुकड़ा है। अगर कोई मुझे बहुत प्यार और स्नेह से न्योता दे तो क्या मैं उसके यहां नहीं जाऊंगा और उसके साथ डिनर (रात का भोजन) नहीं करुंगा? क्या मैं ऐसा कहूंगा कि नहीं, मैं मीट नहीं खाना चाहता, मैं केवल शाकाहारी भोजन करुंगा? ऐसे मामलों में मैं कोई ढकोसला नहीं करता।

वो कहते हैं ना जहां भी प्यार मिला उसी के साथ हो गया। मैं एक महान प्रेमी हूं। जहां के लोग मुझसे जोश से मिलते हैं मैं उनसे प्रेम करता हूं। भारत में यकीनन 99 फीसदी भारतीय मुझे प्यार करते हैं। आज भी करते हैं। लेकिन रचनात्मक के प्रति सियासत का हमेशा नकारात्मक प्रभाव रहा है।

गैलिलियो से लेकर कालीदास तक – हर महान कलाकार का उत्पीड़न हुआ। नेरुदा, चैपलिन जैसे ढेरों उदाहरण मौजूद हैं।

आखिर में सबकुछ सिसायत से जोड़ दिया जाता है। अगर यह कानूनी और सामाजिक समस्या होती तो इसका हल निकाला जा चुका होता। अदालतें भी ऐतिहासिक फैसले देतीं हैं। लेकिन सियासत और कुछ लोग सारा माहौल खराब कर देते हैं।

बरखा दत्त – क्या आप वतन लौटने के लिए छटपटाएंगे नहीं?
एम एफ हुसैन – मेरी आत्मा और मेरा सबकुछ वहीं मौजूद है। आखिर शारीरिक मौजूदगी होती क्या है? टेक्नोलोजी और कम्यूनिकेशन से भरी आज की दुनिया में आप सभी जगह मौजूद हैं। और एक क्रिएटिव शख़्स भौगोलिक सीमाओं में नहीं बंधा होता है। यह कोई मायने नहीं रखता कि आप कहां रहते हैं। मैं मौलिक रूप से एक भारतीय चित्रकार हूं और अंतिम सांस तक भारतीय चित्रकार रहूंगा।

बरखा दत्त – लेकिन यह भी एक तथ्य है कि बहुत-बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि आपको वापस लाने के लिए भारत सरकार काफी कुछ कर सकती थी।
एम एफ हुसैन – मैं ऐसी बातों पर ज़रा भी ध्यान नहीं देता। वो क्या सोचते हैं यह उनका काम है। मैं और मेरा काम इससे ज़रा भी प्रभावित नहीं होता।

बरखा दत्त – कुछ आलोचक आपके इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं कि आपने एक ऐसा देश चुना है जहां लोकतंत्र ही नहीं है। आखिर कतर ही क्यों?
एम एफ हुसैन – जैसा की मैं कह चुका हूं। मुझे यहां स्पॉन्सर मिला और सारी सुविधाएं। इसलिए मैं यहां काम कर रहा हूं। मैं ऐसा साठ साल से करता आ रहा हूं। मेरा कहीं भी अपना स्टूडियो नहीं है। मैं एक लोक पेंटर की तरह हूं। जो मौके पर ही पेंटिंग बनाता है। मैंने पेंटिंग के अपने स्टाइल को ऐसे ही डेवलप किया है। वहां कई महान पेंटर और विचारक हैं, मैं उनका सम्मान करता हूं। लेकिन मेरे काम का तरीका ऐसा ही है।

बरखा दत्त – क्या भारतीय पासपोर्ट को सरेंडर करने का फैसला आपके लिए कष्टदायक रहा?
एम एफ हुसैन – सच यही है। मुझे लगता है कि सारा दुख और दर्द मीडिया को है। मुझे नहीं है। मैं बीते 40 साल से परमानन्द (तमाम बंधनों से मुक्त हो चुका हूं) की स्थिति में (हंसते हुए … ) फिल्म बना रहा हूं, यहां और वहां कुछ शब्द लिख रहा हूं… अपनी सोच का सृजन कर रहा हूं … मैंने अभी तक केवल दस फीसदी ही जाहिर किया है। नब्बे फीसदी अब भी मेरे भीतर है। मुझे नहीं लगता कि मैं उन सभी को बाहर ला सकूंगा। मुझे लगता है कि वो सारी चीजें मेरे कब्र में मेरे साथ होंगी।

((बाकी इंटरव्यू पढ़ने के लिए आप यहां क्लिक करें))

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Comments

5 Responses to “मेरा पैसा, मेरा मजहब, मेरी आज़ादी और मेरी नागरिकता”
  1. प्रवीण says:

    गजब का इंटरव्यू है। एक तरफ हुसैन तमाम भौगोलिक सीमाओं से मुक्त हो गए हैं। लेकिन दूसरी तरफ दुनिया के तमाम ऐशोआराम भी चाहिए। एक तरफ उन्हें कोई बात कष्ट नहीं पहुंचाती दूसरी तरफ टैक्स बचाने के लिए एनआरआई बन जाते हैं। महान के कलाकार और रंगबाज हैं हुसैन साहब। उनकी इस बाजीगरी को सलाम।

  2. आपे अनुवाद करके अच्छा किया। बज पर अजय ब्रह्मात्मज ने ये लिंक लगायी थी और मैंने कहा था कि कोई इसका अनुवाद कर दे।.

    • विनीत जी, अगर कोई चूक हो गई हो तो बताइयेगा। बहुत जल्दीबाजी में अनुवाद किया गया है। और हो सके तो इस इंटरव्यू पर अपनी राय भी दें।

  3. रमेश शंकर says:

    कला की गहराई समझो. कला की कोई सीमा नहीं होती. कोई बंधन नहीं होता. कोई राष्ट्रप्रेम नहीं होता. अभिव्यक्ति की आज़ादी को तुम धर्म, जाति, राज्य, देश की सीमाओं में क्यों बांधना चाहते हो. कला और कलाकार को मुक्त कर दो. बांधने के लिए बाकी चीजें शेष रह जाएंगी.

    हुसैन सही कह रहे हैं. अगर समस्या समाजिक या कानूनी होती तो कब की हल हो जाती. यह सियासी मसला है. सियासतदानों ने अपने फायदे के लिए विवाद छेड़ा है. अगर तुम उनके झांसे में आए तो ठेस आज़ादी को लगेगी. हुसैन को बस माध्यम बनेंगे.

    इसलिए सभी से विनती है कि हुसैन को मुसलमान न समझें. एक पेंटर के तौर पर उन्हें देखें. उनकी कलाकृतियों को उनकी निगाह से देखें. जैसे ही ऐसा करेंगे… बात समझ जाएंगे. गुस्सा थम जाएगा. नाराज़गी दूर हो जाएगी.

  4. हुसैन से कोई व्यक्तिगत नाराजगी नहीं है
    उनके प्रकार की मानसिकता पर प्रश्न चिन्ह है
    और इसे आप सिर्फ कलाकारी के लबादे में छुपा देना चाहते हैं .. जो गले नहीं उतरती