ठहरी हुई, गुमसुम सियासत पर लिखना दर्दनाक है

लेखक: राजकिशोर  |  February 22, 2010  |  देश-दुनिया, ब्लॉग   |   3 Comments

भारत की राजनीति पर लिखना 1990 के बाद से ही एक कष्टदायक काम रहा है। लेकिन अब तो यह लगभग असंभव-सी चीज होती जा रही है। कारण बहुत साफ है : भारतीय राजनीति आगे नहीं बढ़ रही है। उसमें न कोई नई बहस पैदा हो रही है, न कहीं आत्म-परिष्कार की चेष्टा है। एक ठहरा हुआ-सा गुमसुम माहौल है। ऐसा माहौल कांग्रेस के लिए बहुत मुफीद होता है। इसलिए अजब नहीं कि बहुत-से लोगों को इस समय कांग्रेस ही सबसे बेहतर विकल्प प्रतीत हो रही हो।

इसका एक उदाहरण तो भाजपा के पुनर्जीवन की खारिज होती जा रही संभावना है। भाजपा के गंभीर संकट को सुलझाने के सिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हस्तक्षेप किया और संगठन में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। पुराने लोग हटा दिए गए और नितिन गडगरी के रूप में आशा की किरण इंजेक्ट की गई। लेकिन कई महीनों के बाद भी ऐसा नहीं लगता कि भाजपा में नई जान आ रही है। क्या यह नितिन की विफलता है? मुझे लगता है, यह उससे अधिक वर्तमान दक्षिणपंथ की विफलता है। दक्षिणपंथी राजनीति सभी देशों में मौजूद रहती है, क्योंकि किसी भी समाज में जहां परिवर्तन की शक्तियां कार्यरत रहती हैं, वहीं इनका प्रतिरोध करनेवाली शक्तियां भी चुप नहीं बैठ रहतीं। जहां तक भारत की बात है, ऐसा लगता है कि यहां का दक्षिणपंथ अब बुरी तरह थक चुका है। इसलिए नया नेतृत्व भी उसे पुनर्जीवित नहीं कर पा रहा है।

असल में, वामपंथ हो या दक्षिणपंथ, राजनीतिक उष्णता लाने के लिए उसमें कम से कम दो चीजें होनी चाहिए। एक, अपने देश से प्रेम और अपनी नीतियों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता। भाजपा में ये दोनों ही चीजें खत्म हो चुकी हैं। देश प्रेम की उसकी घोषणाएं खोखली नजर आती हैं। जब भी वह कोई मुद्दा उठाती है, तो वह उसे अंत तक नहीं ले जाती। कई बार बीच में ही छोड़ देती है और कई बार अवसरवाद के चलते उसके साथ समझौता कर लेती है। यही कारण है कि नरेंद्र मोदी भाजपा के किसी भी अन्य नेता की तुलना में ज्यादा निष्ठावान और विश्वसनीय प्रतीत होते हैं। मुश्किल यह है कि खुद भाजपा नरेंद्र मोदी के आगे बढ़ते जाने से डरती है।

बहरहाल, मैं नहीं समझता कि राजनीतिक टिप्पणीकार भाजपा को नया और मजबूत देखने के लिए तड़पते क्यों रहते हैं। शायद उनकी मान्यता यह है कि भाजपा ही मुख्य विपक्षी दल है और अगर उसका पूर्ण ह्रास हो गया, तो विपक्ष बचेगा ही नहीं और कांग्रेस पूरी तरह से निरंकुश हो जाएगी। सचाई यह है कि भाजपा विपक्षी दल नहीं है, क्योंकि वह कांग्रेस की नीतियों का पूरा विकल्प पेश नहीं करती। सिर्फ अपने सांप्रदायिक और कट्टरपंथी सोच के चलते जीवित है। इसलिए विपक्ष की उसकी भूमिका एक सीमा से आगे नहीं जा पाती। इसलिए भाजपा के लिए तो यही मनाना चाहिए कि वह धीरे-धीरे निश्चिह्न हो जाए। जब वह समाप्त हो जाएगी, तभी देश का मध्य वर्ग कांग्रेस के बेहतर विकल्प के बारे में सोचना शुरू कर सकेगा।

यह बेहतर विकल्प निश्चय ही कांग्रेस की तुलना में कुछ बाएं की तरफ झुका हुआ होगा। कुछ बाएं की ओर इसलिए कि पूरी तरह से वामपंथी हो जाना भारत के लिए फिलहाल संभव दिखाई नहीं देता। शायद यही कारण है कि जिसे असली वामपंथ समझा जा रहा था, वह अब अपने ढलान पर आ गया है। पश्चिम बंगाल में, जहां वह लगातार तैंतीस वर्षों से शासन कर रहा है, उसकी लोकप्रियता लगभग समाप्त हो चुकी है और राज्य की जनता वैकल्पिक सरकार गठित करने के लिए तैयार है। केरल में भी वामपंथ की हालत अच्छी नहीं है। वह अपने ही अंतर्विरोधों से त्रस्त हो रही है और किसी निश्चित दिशा में जा नहीं पा रहा है। केंद्र में वामपंथ ने कोई ऐसी भूमिका नहीं निभाई जिससे उसकी इज्जत बढ़े। कई मुद्दों पर उसने कांग्रेस के फैसलों का उचित विरोध किया, पर वह कोई ऐसी वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत नहीं कर पाया जो लोगों को आकृष्ट कर सके।

इस तरह, अगर भारत का दक्षिणपंथ अपना नवीकरण नहीं कर पा रहा है, तो वामपंथ तो और भी जीवनहीन नजर आ रहा है। उसके सामने इस समय एक तरह से अस्तित्व का संकट है। उसे आउटडेटेड मानने की प्रवृत्ति तेज हो रही है, उसके संगठन में घुन लग चुका है, फिर भी उसमें आत्मनिरीक्षण की ऊर्जा दिखाई नहीं पड़ रही है। अपने बुरे दिनों में भी वह एक अघाया हुआ समूह बना हुआ है। हरकिशन सिंह सुरजीत की मृत्यु के बाद जब करात और यचूरी की नई पीढ़ी ने सीपीएम का नेतृत्व संभाला, तो उम्मीद थी कि वे पार्टी की विचारधारा, नीतियों और संगठन में कुछ ताजगी लाएंगे। लेकिन ये भी अंतत: नितिन गडगरी ही साबित हो रहे हैं और पुरानी पार्टी को पुराने ही ढंग से चलाने के शौकीन जान पड़ते हैं। दूसरी ओर, सीपीआई तो इतनी बेजान पार्टी हो चुकी है कि वह अपना नेतृत्व तक नहीं बदल पाई और पके-थके वर्धन से ही अपना काम चला रही है।

राजकिशोर

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शायद भारत का राजनीतिक भविष्य वर्तमान दक्षिणपंथ और वामपंथ, दोनों के क्षय के बाद ही कोई नयी दिशा पकड़ सकेगा। यह तो निश्चित है कि कांग्रेस सिर्फ मध्य वर्ग का ही प्रतिनिधित्व कर सकती है। भारत की तीन-चौथाई जनता के लिए वर्तमान व्यवस्था में कुछ भी नहीं है। एक लोकतांत्रिक सिस्टम में इतनी बड़ी आबादी कब तक नेतृत्वविहीन रह सकती है? लेकिन उसका समय तभी आएगा जब इस बहुसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करनेवाले नेताओं और दलों का अवसान हो जाए। फिलहाल हमें इसी की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

((राजकिशोर हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं और आप उनसे raajkishore@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।))

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Comments

3 Responses to “ठहरी हुई, गुमसुम सियासत पर लिखना दर्दनाक है”
  1. रंगनाथ सिंह says:

    अच्छा प्रवचन है !

  2. Krishna says:

    ये दोनों विचारधारायें, निरर्थक हो चुकी हैं और मध्यमार्गी कांग्रेसी विचारधारा भी औचित्यहीन है! यह भी केवल साधे रहने का विकल्प मात्र हैं, तो क्या फ़िर किसी नयी क्रान्ति का सूत्रपात होना चाहिए?

  3. saurabh says:

    ye manthan ka samay hai. kya hum logon ke paas koi vikalp nahin hai. jab vaishvik estar pe poonjiwad ki prabhavita dikhai de rahi hai/ sidhi si baat hai ki labh jahan bhi ho , jaise bhi ho uske liye taiyari puri hai. yah samaj ke pratyek cone mein dikhai de raha hai……………
    hamen ek bar phir se najdik ke fayde ke bajay door ka laabh dekhna hoga sath hi dikhana bhi hoga….anytha najdik ka labh dekhne ki pravatti hamen puri tarah se nasht kar degi , sambhav hai ek aisi samasya ban jaye ……………jiska koi samadhan nahin hai……..
    he lekh kripya isse ubarne ka rasata bhi likhe ,, kathin hi sahi..per ham yuva samsya ka varan nahin apitu samadhan chahte hai. kam se kam rasta to awasy khoje…