जब ब्रूनो की बेटियां भी पूर्व आईपीएस के हरम में खुश हैं…
लेखक: राजकिशोर | February 14, 2010 | स्पेशल रिपोर्ट | 2 Comments
शुरुआत नाम की चर्चा से करते हैं। टैगोर पुरस्कार कहने भर से कोई पुरस्कार सम्माननीय नहीं हो जाता। साहित्य अकादेमी-सामसुंग पुरस्कार का रवींद्रनाथ टैगोर या उनके मूल्यों से कोई संबंध नहीं है। यह पुरस्कार की ब्रांडिंग है। हम जानते हैं कि बाजार में गांधी छाप बीड़ी और जवाहर छाप दियासलाई भी मिलती है। कायदे से पुरस्कार देने वाले को अपने ही नाम का इस्तेमाल करना चाहिए। जैसे नोबेल पुरस्कार अल्फे्रड नोबेल के नाम पर है। या भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार दिवंगत कवि के परिवार द्वारा दिया जाता है। साहित्य अकादेमी जो पुरस्कार देती है, वे अकादेमी पुरस्कार कहलाते हैं। सामसुंग और अकादेमी को मिल-जुल कर पुरस्कार देना था, तो उन्हें टैगोर को बीच में नहीं लाना चाहिए था। यह एक महान लेखक के नाम का दुरुपयोग है।
ऐसा दुरुपयोग सबसे अधिक महात्मा गांधी के नाम का हुआ है। हाल ही में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के साथ महात्मा गांधी का नाम जोड़ दिया गया, जबकि यह योजना गांधीजी की मान्यताओं के बिलकुल विपरीत जाने वाली है। गांधीजी कतई नहीं चाहते थे कि गांवों में रहने वालों के रोजगार की गारंटी दिल्ली की सरकार दे। वे चाहते थे कि गांव वाले अपना रोजगार खुद पैदा करें और उससे होने वाली आमदनी का एक छोटा सा हिस्सा टैक्स के रूप में राज्य और केंद्र सरकारों को दें। इसी तरह, टैगोर बेशक अंतरराष्ट्रीयतावादी थे, लेकिन उनकी अंतरराष्ट्रीयता व्यापारिक या पूंजी-केंद्रित नहीं थी। वह एक मानववादी और आध्यात्मिक विचार था। सामसुंग एक व्यापारिक कंपनी है। मानववाद से या विश्व संवेदना से उसे कुछ भी लेना-देना नहीं है। इसलिए सामसुंग को टैगोर के नाम का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए था।
साहित्य अकादेमी को भी चाहिए था कि वह एक व्यावसायिक कंपनी के चक्कर में न पड़े। पड़ना ही था, तो इसे सामसुंग-अकादेमी पुरस्कार के नाम से स्थापित किया जाना चाहिए था। छोटी-मोटी ईमानदारियों का सुख भी हम भूलते जा रहे हैं। साहित्य अकादेमी बेशक साहित्यिक संस्था है, लेकिन कहां टैगोर की ऊंचाई और कहां अकादेमी के घटिया तौर-तरीके! रवींद्रनाथ का पुनर्जन्म अगर सुनील गंगोपाध्याय के रूप में हुआ होता (निस्संदेह यह एक दुष्ट कल्पना है), तो वे महाश्वेता देवी से चुनाव प्रतिद्वंद्विता नहीं करते।
सर्वाधिक उचित यह था कि सामसुंग अपने नाम से साहित्यिक पुरस्कार देती। लेकिन सामसुंग के मैनेजरों को लगा होगा कि साहित्य का मामला जरा अलग किस्म का है। यहां पानी गहरा है। इसलिए उसने साहित्य अकादेमी को अपना साहित्यिक जोड़ीदार बनाया। जैसे सामसुंग बड़ी कंपनी, वैसे ही अकादेमी बड़ी संस्था। बन गई जोड़ी नंबर एक। लेकिन मेरा खयाल है, अकादेमी ने लेखकों का चयन जिस तरह किया है, उसे देख कर सामसुंग पछता रही होगी। राजी सेठ और गोविंद मिश्र जैसों को पुरस्कृत कर सामसुंग को क्या फायदा होने वाला है? सामसुंग को चमकते हुए स्टार चाहिए। अकादेमी ने उसे ब्लैक होल में फेंक दिया है। अपनी-अपनी फितरत है।
शंभुनाथ (जनसत्ता, 31 जनवरी) ने बिलकुल सही लक्षित किया है कि इस पुरस्कार को लेकर सिर्फ हिंदी साहित्य के दिल्ली मुख्यालय में खलबली है, अन्य भाषाओं के लेखकों के कान जरा भी लाल नहीं हुए हैं। टैगोर ने अपनी आस्थाओं को रूपायित करने के लिए जिस विश्व भारती की स्थापना की थी, उसके चित्त में टैगोर और सामसुंग के संग-साथ से कोई बेचैनी नहीं है। निश्चय ही यह शांतिनिकेतन के वैचारिक क्षय का एक पहलू है। लेकिन अन्यत्र बेचैनी या असुख भाव नहीं है, इससे यह साबित नहीं होता कि वे क्षेत्र गये-गुजरे हैं। मैं कहूंगा, वे क्षेत्र अधिक सामान्य हैं। उनके लिए कोई भी पुरस्कार पुरस्कार है, जिससे पैसा और सम्मान, दोनों मिलते हैं। पुरस्कार समारोह की रंगीन तस्वीर फ्रेरम कर बैठकखाने में सजायी जा सकती है। हिंदी के भी बहुत-से लेखक इसी वर्ग में आते हैं। उन्हें भी पैसा और सम्मान चाहिए- वे चाहे जहां से आएं। यह सोचने की बात है कि हिंदी क्षेत्र में इतने अमीर और अमीरजादे होते हुए भी दयावती मोदी किस्म के सम्मान इतने कम क्यों हैं। स्पष्ट है कि हिंदी के धनकुबेरों में साहित्यानुराग बहुत कम है। हिंदी में सरकारी पुरस्कार सबसे ज्यादा हैं। लेकिन हिंदी में राजनीति भी तो ज्यादा है।
रेडिकल चेतना की अभिव्यक्ति की दृष्टि से हिंदी के लेखक देश भर में शायद सबसे आगे हैं। पिछले लगभग तीन दशक से मार्क्सवाद हिंदी की ऑफिशियल विचारधारा बना हुआ है। इसीलिए सामसुंग-अकादेमी पुरस्कार पर हिंदी में इतना आक्रोश देखा जा रहा है। दुख की बात यह है कि यह आक्रोश प्रचार और आत्मप्रचार का अनुषंग मात्र है। लेखकों के जीवन में इसकी परछाईं कम ही दिखाई देती है। कहीं दिखाई पड़ जाए, तो समझिए, वह अपवाद है। दस-दस, पंद्रह-पंद्रह हजार रुपयों के पुरस्कारों के पीछे लोग कुत्तों की तरह भागते हुए देखे जाते हैं। साहित्य अकादेमी के पुरस्कार हिंदी में जितने विवादग्रस्त रहे हैं, उतने किसी और भाषा में नहीं। आज यह कहना कोई दूर की कौड़ी नहीं रही कि हिंदी में पुरस्कार दिये नहीं जाते, लिये जाते हैं। पैसे के लिए तो हिंदी का लेखक हत्या और अपहरण छोड़ कर कुछ भी कर सकता है। उन लेखकों में से भी, जो सामसुंग-अकादेमी पुरस्कार के विरुद्ध अभियान-सा छेड़े हुए हैं, कई की शराब, धन, पद, विदेश यात्रा और देह लिप्सा के अनेकानेक किस्से दिल्ली से पटना तक और भोपाल से लखनऊ तक तैरते रहते हैं।
यही कारण है कि पुरस्कार वाले दिन सामसुंग-अकादेमी जोड़ी का प्रतिवाद करने वाला एक भी लेखक गिरफ्तार नहीं हुआ। आप भारत सरकार और कोरिया सरकार जैसी शक्तिशाली मशीनरी का व्याकुल-विक्षुब्ध विरोध करें और आपकी कोई क्षति न हो, यह किसी परीलोक की ही कहानी हो सकती है। कितनी दक्ष व्याख्या है कि पुलिस ने घटना स्थल पर जाने से हमें रोका, इसलिए हम रुक गये और मानव शृंखला बनाने के लिए साहित्य अकादेमी की सुनसान बिल्डिंग की ओर चल दिये। कल दिल्ली पुलिस आपको रेडिकल कविता लिखने से रोकना चाहेगी, तो क्या आप रुक जाएंगे? हिंदी लेखकों के लिए सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का प्रतिरोध करते हुए गिरफ्तार होने का यह अच्छा मौका था। यह मौका बड़ी धूर्तता के साथ गंवा दिया गया।
एक स्पष्टीकरण यह भी दिया गया है कि प्रतिवाद करने वाले अनेक लेखक सरकारी कर्मचारी हैं, इसलिए वे मुखर नहीं हो सके। वक्त की मांग यह थी कि ऐसे लेखक पराधीनता की बेड़ियां काटने के लिए मचलने लगते। अगर सरकारी कर्मचारी होना उनके लेखक होने पर भारी पड़ रहा था, तो उन्हें इसे संघर्ष का मुद्दा बनाना चाहिए था कि सरकारी कर्मचारियों को साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में प्रतिरोध करने से रोकना संविधान और कानून के विरुद्ध है। सरकारी कर्मचारी लेखक के रूप में पुरस्कार प्राप्त कर सकते हैं, विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लेने सात समुंदर पार जा सकते हैं, लेकिन किसी सांस्कृतिक षड्यंत्र का विरोध नहीं कर सकते, यह क्या बात हुई? हुजूर, आपका काफिया तंग है, इसे दुरुस्त कीजिए।
यह बात कि सामसुंग का पैसा पाप का पैसा है, जरा भी कायल नहीं करती। जिसके पास भी जरूरत से ज्यादा पैसा है, वह पाप का पैसा है। अगर सामसुंग का पैसा पाप का है, तो ज्ञानपीठ का पैसा क्या पुण्य का पैसा है? साहित्य अकादेमी द्वारा दिया जाने वाला पैसा क्या धर्म का पैसा है? अकादेमी स्वायत्त संस्थान है, लेकिन जो भारत सरकार उसका वित्त पोषण करती है, उसके पास पैसा कहां से आता है? भिखारी भी बीड़ी का बंडल या दियासलाई की डिब्बी खरीदता है, तो सरकार उससे कर वसूल कर लेती है। एक गरीब देश की सरकार का इतना समृद्ध होना कि वह कला और साहित्य पर हर साल करोड़ों रुपया न्योछावर करती रहे, क्या भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गर्व की बात है? मेरा बस चले, तो अकादेमी पुरस्कार के रूप में पांच सौ रुपये से एक पैसा ज्यादा न दूं।
यही बात मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार सरकारों द्वारा स्थापित संस्थाओं द्वारा दिये जाने वाले पुरस्कारों पर भी लागू होती है। ये गरीब जनता की अमीर सरकारें हैं। सामसुंग का पैसा अगर पाप का पैसा है, तो इन सरकारों का पैसा भी पुण्य का पैसा नहीं है। सामसुंग को मानवाधिकारों, राजनीतिक शुचिता, लोकतंत्र आदि की परवाह नहीं है, तो भारत सरकार और राज्य सरकारें तो और भी क्रूर हैं। सामसुंग कंपनी ने खुद किसी की टांग नहीं तोड़ी होगी, न किसी की जान ली होगी, लेकिन इन सरकारों के कारिंदे लगभग रोज यही सब करते हैं। ऐसी सरकारों की साहित्य और कला संस्थाएं अगर आज सामसुंग से, कल आईटीसी से और परसों फिलिप्स से हाथ मिलाती हैं, तो इस पर गुस्से में आना कुल्हड़ में हुल्लड़ से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
अंतत: समस्या वही है जिसकी ओर शंभुनाथ ने इशारा किया है। गुड़ खाएंगे और गुलगुले से परहेज करेंगे, तो लानत-मलामत होगी ही। नाले में नहाएंगे और गड़ही देख कर मुंह बिचकाएंगे, तो लोगों को हंसने से कैसे रोका जा सकता है? इस हंसी में व्यंग्य कम, वेदना ज्यादा है। नहीं, नहीं, आपकी बेइज्जती करने का कोई इरादा नहीं है। आपके इरादों के पीछे अगर कुछ व्यक्तिगत या गिरोहगत है, तब भी वे नेक हैं। हमारी प्रार्थना यह है कि तलवार उठा ही ली है, तो उससे सिर्फ घास-फूस न काटिए, ऐसी डालियों पर भी वार करें जो बगीचे की पूरी हवा में विष और बदबू घोल रही हैं। समकालीन हिंदी साहित्य का परिदृश्य विचार के स्तर पर वीरगाथा काल का है, पर आचरण के स्तर पर भक्तिकाल और रीतिकाल कुछ ज्यादा ही हावी हैं। यह वह समय है जब ब्रूनो की बेटियां भी एक पूर्व पुलिस अधिकारी के हरम में शामिल होकर प्रसन्न हैं। ऐसे माहौल में, वाग्वीरता को कर्मवीरता में बदला जा सके, तो पचास साल बाद होने वाली क्रांति पांच साल में ही हो सकती है। (जनसत्ता से साभार)
((वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर इन दिनों इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में सीनियर फेलो हैं। आप उनसे raajkishore@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।))
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rajan said:
http://matmatantar.blogspot.com/2009/05/3.html
Wednesday, May 20, 2009
यादों में बसे लोग- 3
“जो जात-पांत की बात करे, उस पर थूक दीजिए…”
1991 में मैं एमए (इतिहास) में दाखिला ले चुका था। विजय कुमार ठाकुर के संरक्षण में अशोक जी ने “इतिहास विचार मंच” की स्थापना की, जिसका मुझे संयोजक बनाया गया। इस संस्था का प्रमुख काम अकादमिक महत्त्व के विषयों में लेक्चर आयोजित करना था। इसी सिलसिले में हमलोग एक दिन आलोक धन्वा से मिले और “प्राचीन भारत में जाति व्यवस्था” विषय पर अपनी बात रखने के लिए उनसे आग्रह किया। लगभग आधे घंटे तक वे तफसील से बताते रहे कि किन-किन महत्त्वपूर्ण गोष्ठयों की उन्होंने अध्यक्षता की है। इस बात को भी रेखांकित किया कि कैसे आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा ने उनसे एक बार किसी गोष्ठी की अध्यक्षता करवाई थी, जब वे महज इंटर के छात्र थे। लगभग आधे घंटे की अपनी विरुद् गाथा से निवृत्त होकर उन्होनें बदली भंगिमा में कहना शुरू किया- “राजू भाई, अगर कोई जाति-पांति की बात करता हो तो वैसे लोगों पर थूक दीजिए।” मैंने हल्का प्रतिवाद करने की कोशिश की- “आलोक जी, मैं जाति की राजनीति करने की कोई मंशा नहीं रखता। मेरा उद्देश्य तो समस्या का समाजशास्त्रीय अध्ययन भर है।”
वे कहां मानने वाले थे। जब वे अपनी रौ में होते तो सामने वाले की शायद ही सुनते थे। फिर वे अपने मूल कथन को ही दुहराने लगे। मैं तो लिहाजवश चुप ही रहा, लेकिन अशोक जी ने अपना मुखर मौन तोड़ा। कहने लगे- “आलोक जी, सच्चाई यह है कि जाति-पांति का नाम लेने वाले हर आदमी पर अगर इसी तरह थूकते रहे तो आप डिहाइड्रेशन के शिकार हो जाएंगे और देवयोग से अगर बच भी गए तो अपने ही थूक के अंबार में डूबे जीवन की भीख मांगते नजर आएंगे। वैसे इसकी कम ही संभावना है कि ऐसा करने को आप बचे भी रहें।” इसके बाद हम दोनों मन ही मन कुढ़ते हुए अशोक जी के लालबाग स्थित डेरे में लौट आए।
नौकर के खर्च में तो एक बीवी रखी जा सकती है…
आलोक धन्वा एक लंबे समय से एकाकीपन में जीते आ रहे थे। शादी नहीं की थी। इस लायक शायद किसी को समझा नहीं था। या फिर कोई और कारण भी हो सकता है। कभी-कभी वे शारीरिक दुर्बलताओं का भी जिक्र किया करते। लेकिन इन दिनों शादी को लेकर कुछ गंभीर होने लगे थे। “छतों पर लड़कियां” कविता का ठीक यही समय है। एक दिन वे खाने-पीने की दिक्कतों की बात करने लगे। मैंने सलाह दी, “कोई नौकर क्यों नहीं रख लेते?” वे बोल उठे- “नौकर बहुत महंगा हो गया है। खाता भी बहुत है। उतने खर्च में तो एक बीवी भी रखी जा सकती है।”
मैं भी वही हूं…
वे जानते थे कि मेरी शादी हो चुकी है, इसलिए पूछ बैठे- “राजू भाई, आपकी कोई बड़ी साली है?” मैंने मजाक के लहजे में कहा- “सर, मेरी पत्नी बहनों में सबसे बड़ी है। अफसोस!” वे कहने लगे- “कोई बात नहीं, इधर-उधर ही देखिए।”
आगे उन्होंने अंतिम सत्य की तरह जोड़ते हुए कहा- “आप तो मेरी जाति जानते हैं न राजू भाई? आप भूमिहार हैं न! मैं भी वही हूं।”
Posted by राजू रंजन at 11:51 PM
Labels: यादें
यह वह समय है जब ब्रूनो की बेटियां भी एक पूर्व पुलिस अधिकारी के हरम में शामिल होकर प्रसन्न हैं। Yeh Likhne Se Pahle Manniya Rajkishore Ji Ko jo इन दिनों इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में सीनियर फेलो हैं Yeh Batana Chahiye Ki Unka Institute Kya Hai ? Woh Kiska Harem Hai?
Yar Hamari Baat Suno
Aisa Koi Insan Chuno
Jishne Pap Na Kiya Ho
Jo Papi Na Ho
Jisne Pap Na Kiya Ho
Wo Pahla Paththar Mare
Har Kishi Ko Paththarbaji Ka Bhi Naitik Adhikar Nahin Hai Bhai Saheb.
Aur Yehan To Academic World Ke Balatkar Ke Aropi Bhi Ish Abhiyan Mein Samil Dikh Rahe Hain. Ish Ninda Abhiyan Ki Naitik Vishat Hi Kya Hai?
Fair Cause Ke Liye Fair means Bhi Hona Chahiye Bhai Saheb.
Barbolapan / Sabdon Ka bematlab Durupyog/ Ye Sab Fauri Chamatkar To Paida kar Sakte Hain Lekin Koi Amit Chhap Nahin Chod Sakte. Waise Ninda Puran Mein Jo Maja Dekhtein Hain Unki Adat To Badali Nahin Ja Sakti Kyonki Yeh ek kishma Ka nasha hai. Nature aur Signature Nahi Badla Karte.
Isliye Meri Aise Login Se Koi Apekcha Bhi Nahin Hai.
Kya Koi Yeh Baat Bata Sakta Hai Ki Alok Dhanwa Ki Haisiyat Ka Jankavi Jo Sirf Apni kavitaon Ki Takat Se / Kishi Prayojit Purashkar Ki Takat Par Nahin /
Khada Hi Nahin Tamam Mukhalfat aur Kshudrata Bhare hamlon Ki Andhi Mein Bhi Bargad Ki Tarah Shan Se Khada Ho. Jiski Kavitayen paththaron par Ukeri Jati Hon Aur Jishe Varavara Rao jaise Kavi Bhi Bade Kavi Mante Hon. Purashkar To Prayojit Tarike Se Liya Ja Sakta Hai Magar Yeh Sab Kisi Ko Prayojit tarike Se Hasil Nahin Ho Sakta. Aise kavi Kitne Hain Jinki Kavitayen Utni Bhasaon Mein Anoodit Hui Hon Jitni Alok Ki.
Waise Itne Ke Bavajood Bhi Main Alokji Ko Ek Great Poet Hi Manta Bhagwan Nahin Jo Dudh Ke Dhule Hon Hi. Manviya Kamjoiryon Ke Saath Hi Kisi Ko Kabool Karne Ki Jaroorat Hai. Na Hi Wo Bilkul Bhagwan Yah Bilkul Shaitan Hain.
Kam Az Kam Yeh To Tai Hai Ki Alok Aaj Wardha University Mein Katha Samay Ayojan Mein Hi Samil Ho Rahe Hain Koi Professor To nahin Ho gaye Hain. Phir Unko Bibhuti Narayan Roy Ki Rajniti Ke Saath Jorne Ke Kya Maine Hain ? Kya Yeh Dooshit Mansikta Ka Dyotak Nahin Hai ?
Kya Kishi Jati Mein Paida Lena Apradh Hai? Ye Phir Agar Kishi Jati Ka Koi Ek Admi Agar Kuch Galtiyan Karta Ho To Ushki Wajah Se Ush Puri jati Ko Hi Gali Di Jaye ? Kya Yeh Ek kishma Ka Fascism nahin Hai
Aur Ant Mein Manniya Anil Chamaria Babu kab Se Dalit Lekhak Ho Gaye ? Chamaria Title To Marwari Vyavsahiyon Ki Ek Title Hai.We To Vaishya Hain Koi dalit Nahin Hain ? Unko Dalit Lekhak Pracharit Karne Ke Piche Nihitarth Kya hai?
Jish Samay Manniya Chamaria Ji Ko Rai Saheb Ne wardha University Mein Bahal Kiya Tha Ush Samay To Kishine Bhi Nahin Jana Ki Ek Bhumihar aur Dusre Kathit Dalit Lekhak Ke Bich Yeh Dosti Kaisi Thi ?
Aj Agar Unko Kishi Kishm Ki Dikkat Ho Gayi To Yeh To Gahre Shodh Ki Baat Ki Hai Ki Aisha Kyon Hua ? Bina Kishi Khoj Ke Ek Ninda Abhiyan Chalana aur Blog Kranti Karke Rai Saheb Ko Vice Chancelorship Se Hatwane Ki Muhim Kya Hai ? Yeh To Wahi Bata Sakte Jo In Sab Chijon Mein Samil Hain.
Magar Kishi Bhi Samanya Buddhi Wale Admi Ki Samajh Mein To Ye Baten Ane Se Rahi. Age Rajkishore Bhai To Vidwat Jan Hain Unka Nahin Kah Sakta.