इनके हाथ में विकास की लकीर नहीं, सिर्फ़ बदहाली है

बात साल के आखिरी महीने के आखिरी दिन की है, जब मेरी ड्यूटी उत्तर प्रदेश में लखीमपुर खीरी के एक गाँव में लगाई गयी। मसला एक प्राइवेट बीमा कम्पनी और भारत सरकार के साझे का था। तमाम अप्रशिक्षित नव-युवकों को ठेकेदारों ने तैनात किया था। सभी को एक-एक पाइरेटेड माइक्रोसाफ़्ट विन्डोज वाले लैपटाप दिए गए थे, ताकि वे बीपीएल आबादी की अंगुलियों के निशान स्कैन कर कम्प्यूटर के डेटावेस में सुरक्षित रख सके। इस काम के बदले प्रत्येक गरीब से तीस रुपये की वसूली करने की भी इजाजत थी। एक मास्टर कार्ड मुझे भी दिया गया जिसमें मेरे अगूंठे का निशान सुरक्षित था और प्रत्येक व्यक्ति की अंगुलियों का निशान लेने के बाद मुझे अपना अंगूठा स्कैनर पर रखना पड़ता, ताकि उस व्यक्ति पहचान सुनिश्चित की जा सके। ये एक तरह का वेरीफ़िकेशन था।

यहां मैं लोगों की जिस जीर्ण-शीर्ण दशा से रूबरू हुआ उसके लिए मेरे पास कोई माकूल शब्द नहीं हैं। मुझे उस गांव में किसी भी व्यक्ति की उंगलियों के निशान नही मिले जिन्हे स्कैन किया जा सके। गरीबी और शोषण की हर परिस्थिति ने उन्हे नोचा-घसोटा था। कहते हैं, आदमी के हाथो की लकीरें उसका भूत-भविष्य बताती है, यकीनन उनके हाथ मुझे हस्तरेखा के सौ फीसदी सच होने का भरोसा दिला रहे थे। ये ऐसे अभागे हाथ थे जिसे शायद कोई ज्योतिषी कभी नही पढ़ सकता, क्योंकि लकीरे नदारत थी। उनके हाथों में अगर कुछ था तो समय की मार के चिन्ह, फ़टी हुई मोटी व भद्दी हो चुकी बिना रक्त की खाल, जो हथेलियों के बचे हुए सख्त मांस व हड्डियों पर चढ़ी भर थीं। जिसे प्रबुद्ध जन कर्म-योग कहते है तो वे उसकी प्रतिमूर्ति थे, इस मुल्क के अनियोजित विकास को ढ़ोने में इनके हाथों पर चढ़ी हुई कालिख हमें बता रही थी कि कैसे नगरीय सभ्यता के संभ्रान्त लोगों की तमाम अयास्सियों का भार यह अन्न-दाता ढ़ो रहा है।

तकरीबन ९० फ़ीसदी परिवारों की यही दशा थी जिनमें स्त्री-पुरूषों की दोनों हाथों की सभी उंगलियों के सारे प्रयास निरर्थक हो जा रहे थे। किन्तु स्कैनर एक भी निशान नही खोज पा रहा था। आखिरकार मुझे उनके बच्चों के निशानों को स्कैन करना पढ़ता, जिनके हाथ अभी इस तरूणायी में सुरक्षित थे लेकिन आनेवाले वक्त में उसे खोने की तैयारी कर रहे थे। यदि नियमों का पालन होता और परिवार के मुखिया के ही निशान स्कैन करने की कवायद की जाती तो शायद दो-चार कार्डों के सिवा ( जुगाड़ द्वारा बनवायें गये अमीरों द्वारा बीपीएल कार्ड धारकों ) सभी को खाली हाथ वापस जाना पड़ता। उन्हे ये भी दुख होता कि दिन भर की मशक्क्त में दिहाड़ी भी गयी और कार्ड भी नही मिला। कुल मिलाकर परिवार के मुखिया की जगह उनके बच्चों के निशान या बीमा कंपनी के जिम्मेदार लोगों के निशान से काम चलवाना पड़ रहा था।

कम्पनी द्वारा तैनात किए गये दैनिक वेतन-भोगियों को भी तो प्रति कार्ड पैसा मिलना था। जितने कार्ड उतना कमीशन। यहां एक और स्थिति बनी जो मुझे शर्मसार करती थी बार-बार वो ये कि.जब भी किसी की उंगलियों का निशान न मिलते तो तकनीके खोजी गई कि सिर के बाल में अंगूठे को रगड़ों तो
इसे स्कैन किया जा सकता है। लेकिन यहां किसी के सिर में चिकनाई की एक बूंद भी नही थी। आखिर में कम्प्यूटर वाला लड़का अपने सिर से उस व्यक्ति का अंगूठा रगड़ता, यदि फ़िर भी काम नही चलता तो हार कर वह अपना अंगूठा स्कैनर पर रख देता। पर ज्यों ही मुझे उस व्यक्ति के अंगूठे के निशान को वेरीफ़ाई करने के लिए अपना अंगूठा स्कैनर पर रखता तो झट से कम्प्यूटर वह निशान ले लेता। वहां खड़े भोलेभाले लोगों में एक खुशी की लहर दौड़ जाती कि अरे साहब का की उंगलियों के निशान कितने सुन्दर आ रहे है। ये लोग हमारी उसी आबादी के हिस्से हैं जो अपनी उंगलियों के चिन्ह खो चुके है। ये वही चिन्ह है जो सरकारी कार्यों में उनके इंसान होने का प्रमाण होते है।

मैं आमंत्रित करता हूं उन सभी भद्रजनों को जो ये हाल देखना चाहते हैं अपने सो-काल्ड विकास का। वे इस तरह के किसी गांव में आये और कोशिश कर ले, अंगूठों के निशान पाने की वहा एक काले ठप्पे के सिवा कुछ नही मिलेगा। यहां यह बता देना जरूरी है कि बीमित व्यक्ति की कम से कम दो उंगलियों के निशान और उसके परिवार के किसी अन्य वयस्क सदस्य के निशान लेना जरूरी था। इसके बदले उस परिवार के मुखिया को एक प्लास्टिक कार्ड मिलना था जिसमें उसके अगूंठे और उंगलियों के निशान कैद थे, ताकि जब वह बीमार हो तो उस कम्पनी द्वारा निर्धारित सेन्टर पर जा कर उस कार्ड से अपनी पहचान करा सके कि असल व्यक्ति वही है।

हाँ, बीमा कम्पनी की शर्ते भी सुन लीजिये। यदि मरीज भर्ती होने की स्थित में नही है , नशा आदि के कारण बीमार हुआ है, महिला गर्भवती है तो उसे बीमा कंपनी कोई मदद नहीं करेगी। इस बारे में भी कुछ स्पष्ट नही है कि सर्प आदि ने काट लिया है या प्राकृतिक आपदा हुई है तो उस व्यक्ति को वो ३०,००० रुपये की बीमित राशि मिल पाएगी या नहीं। इससे भी बड़ी बात ये कि यदि किसी परिवार के मुखिया न हो, तो अव्यस्क बच्चों के लिए यह बीमा नही हो सकता……..। जिस कुपोषण में महिलायें सिर्फ़ बीमार बच्चों को जन्म देती है, वहां इस बीमा की शर्तों के अनुसार किसी जन्म-जात बीमारी का इलाज की कोई सुविधा नही। फ़िर आप बतायें हमारे गांव के आदमी का कौन सा विमान क्रैश या कार दुर्घटनाओं से साबका पड़ता है जो वह इस बीमित राशि का लाभ ले पायेगा?

यहां प्रश्न ये नही है बीमा कम्पनी से इन्हे लाभ मिलेगा या नही या यह योजना उचित या अनुचित है । सवाल ये है कि क्या ये हमारी व्यवस्था पर एक कड़ा सवाल नहीं है कि हमारी आबादी के कुछ लोगों के हाथ की लकीर मिट गई है? अगर वाकई ऐसा है तो सरकार क्या कर रही है। मनमोहन-मायावती दोनों क्या कर रहे हैं?

((कृष्ण कुमार मिश्रा। पेशे से अध्यापक। शौक से वाइल्डलाइफ बॉयोलोजिस्ट। बेहतरीन फोटोग्राफर और लेखक। इन दिनों उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में रहते हैं। आप उनसे dudhwajungles@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।))

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Comments

3 Responses to “इनके हाथ में विकास की लकीर नहीं, सिर्फ़ बदहाली है”
  1. shambhu says:

    गांव का सच हिम्मत से बयान करने के लिए शुक्रिया… आपका लेख अंधेरे में टिमटिमाते दिए की तरह है जो एक दिन जरूर रोशनी के लिए आग का काम करेगा…

  2. sushant jha says:

    कृष्ण कुमार जी..लाजवाब लिखा है। उम्मीद है, आगे भी लिखते रहेंगे।

  3. रंगनाथ सिंह says:

    यह स्थिति शर्मनाक है। जिसके हाथ में कोई निशान न बचा हो वो बंदूक उठा ले तो क्या बुरा करेगा !