पाक के ख़िलाफ़ जेहाद का आगाज़ भारत की ओर से हो!

विशाल भारद्वाज की जल्द रिलीज होने वाली नई फिल्म इश्कियां में पाकिस्तान के मशहूर सूफी गायक मरहूम नुसरत फतेह अली खान के भतीजे राहत फतेह अली खां का गाया गाना इस समय हिंदुस्तान के फिल्म संगीत प्रेमियों का नेशनल ऐंथम हो गया है। गुलज़ार के लिखे इस गीत ‘दिल तो बच्चा है’ को गाकर राहत ने बच्चे, बूढ़े़ सब के दिलों में अपनी जगह बना ली है। संगीत प्रेमियों में राहत कोई नया नाम नहीं हैं। इससे पहले भी वो कई हिंदी फिल्मी हिट गाने गा चुके हैं। राहत पाकिस्तानी हैं और जब वो अपनी आवाज़ का जादू बिखेरते हैं तो सारा हिंदुस्तान उसे सुनता है। राहत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की फरीदा खानम हों या नुसरत, मेहदी हसन हो या गुलाम अली, पाकिस्तान का रॉक बैंड जुनून हो या नए युवा गायक आतिफ असलम। भारत ने पाकिस्तानी टैलेंट की हमेशा कद्र की और सर आंखों पर बिठाया। अमन का कोई भी सिपाही 26\11 हमले के लिए पाकिस्तान की कारस्तानियों को माफ तो नहीं कर सकता। लेकिन इसका गुस्सा फनकारों पर निकालने का इल्ज़ाम भी अपने ऊपर नहीं लेना चाहता।

अब सवाल उठता है कि जब संगीत को लेकर दोनों देशों में इतना भाईचारा है तो क्रिकेट पिच पर आते-आते हिंदुस्तानी सरकार, बीसीसीआई या आईपीएल मैनेजरों की भंवे क्यों तन जाती हैं? अगर बैकड्राप में 26\11 का आतंकी हमला है तो उसके बाद भारत टी-20 वर्ल्ड कप के लिए इंगलैंड गया जिसमें पाकिस्तान ने भी हिस्सा लिया। पाकिस्तान ने वर्ल्ड कप जीता भी। यही नहीं दोनों देश साउथ अफ्रीका में चैंपियंस ट्राफी में एक दूसरे से भी भिड़े। लेकिन जब नौबत आयी आईपीएल 3 में खिलाड़ियों के चयन की तो पाकिस्तानी खिलाड़ियों की नीलामी हुई ही नहीं। ख़बरें ये निकल कर आयीं कि 26\11 की पृष्ठभूमि के मद्देनज़र सरकार पाकिस्तानी खिलाड़ियों को हिंदुस्तान की सरज़मीं पर घुसने की इजाज़त नहीं दे सकती। ये बात आईपीएल के मैनेजरों ने फ्रैन्चाइज़ियों को बतायी और फिर सबने मिलकर ये तय किया कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों की बोली लगेगी ही नहीं। नतीजा ये रहा कि आईपीएल 3 के लिए सब ने अपनी-अपनी टीम चुन ली जिसमें एक भी पाकिस्तानी खिलाड़ी नहीं था।

जुल्फिकार अली भुट्टो ने एक बार कहा था कि पाकिस्तानियों को घास भी खाना पड़ा तो एटम बम बनाएंगे। और ज़रूरी हुआ तो एक हज़ार साल तक हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ जेहाद छेड़ेंगे। आज आतंकवाद को लेकर हिंदुस्तान का हर शख़्स पाकिस्तान से एक हज़ार साल की लड़ाई लड़ने को तैयार है। क्योंकि आवाम शांति चाहती है। मगर शांति बहाली के लिए लड़ी जाने वाली ये लड़ाई कैसी होगी? अब जबकि दोनों देश न्यूक्लियर हो चुके हैं तो क्या ये लड़ाई बंदूक, तोप और मिसाइलों के ज़रिये लड़ी जायेगी। शायद नहीं। ये बात दोनों देश के हुक्मरानों को पता है। करगिल भी करके देख लिया। लाशें बिछी, जीता कोई नहीं। लेकिन भारतीय संसद पर हमला हो या मुंबई पर आतंकवादी हमला दोनों देशों के रिश्ते पर इसका गहरा असर पड़ना लाज़मी था। ये पाकिस्तान की जिम्मेदारी बनती है कि जब विश्व पटल पर आतंकवाद के मुद्दे पर उसका नकाब उतर चुका है और आज जब आतंकवाद उसके खुद के लिए नासूर बन चुका है तो वो उससे लड़ने के लिए क्या रास्ता अख़्तियार करता है। क्योंकि इसका सकारात्मक असर पाकिस्तान और हिंदुस्तान ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया और विश्व शांति प्रयासों पर भी पड़ेगा। इसलिए हिंदुस्तान को भी पाकिस्तान की पहल का इंतज़ार रहेगा जब वो 26\11 के सभी मददगारों को पकड़ कर जेल में बंद करे, उन पर मुक़दमा चलाये और भारत की चार्जशीट पर जल्द कार्रवाई करे।

लेकिन वॉर डिप्लोमेसी ये कहती है रिश्तों को वापस पटरी पर लाने के लिए हर वो रास्ता तलाशा जाए जिससे दोनों देशों के संबंध सुधरें। शायद यही कारण है कि 26\11 के बाद भी हिंदुस्तान की तरफ से ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया कि वो पाकिस्तान को सबक सिखाकर रहेगा। उस पर आक्रमण करेगा। न हिंदुस्तान का ऐसा कोई इरादा था न विश्व की दूसरी ताकतें ऐसा चाहती थीं। इसलिए भारत ने दूसरा रास्ता अपनाया और पाकिस्तान को सबूतों का पुलिंदा थमा कर उसे उस पर कार्रवाई करने के लिए लगातार दबाव बनाये रखा। यहां तक तो सब ठीक था। लेकिन क्रिकेट का नाम आते ही फिर हिंदुस्तान के नथुने फूलते दिखे। अगर क्रिकेट को वॉर डिप्लोमेसी का हिस्सा बनाना था तो चैंपियन्स ट्रॉफी में टीम इंडिया को नहीं भेजना चाहिए था। फिर टी 20 के लिए खिलाड़ियों को इंगलैंड नहीं भेजना चाहिए था। जिस टूर्नामेंट में पाकिस्तान शिरकत करता उसमें भारतीय टीम को नहीं भेजा जाना चाहिए था। दिल्ली में बैठी सरकार ये कसम उठा ले कि जब तक पाकिस्तान 26\11 के दोषियों को सज़ा नहीं देता तब तक हिंदुस्तान पाकिस्तान के साथ किसी फोरम, किसी देश में किसी भी प्रकार का क्रिकेट नहीं खेलेगा। चाहे वो टी 20 हो या फिफ्टी ओवर्स या टेस्ट मैच। लेकिन भारत सरकार या बीसीसीआई ने ऐसा कोई फैसला नहीं लिया। जो ये नहीं किया तो नाक उल्ट तरीके से पकड़ने की कोशिश की गयी और आईपीएल मैनेजरों के कान में मंत्र फूंक कर हुक्मरान रायसीना हिल के अपने-अपने दड़बों में घुस गए।

कुछ 25 साल पहले भी दोनों देशों के बीच तनाव था। लेकिन फिर पाकिस्तानी राष्ट्रपति ज़िया जयपुर टेस्ट मैच देखने के लिये पहुंच गये। गिल-शिकवे दूर तो नहीं हुए लेकिन तनाव जरूर कम हुया। डिप्लोमेसी का यही तकाज़ा है। पुख्ता हल न भी निकले तनाव कम करने के रास्ते ढू़ढ़े जाए। आज क्रिकेट डिप्लोमेसी के नाम पर राष्ट्रवाद का तकाज़ा देकर क्रिकेट को ही आम लोगों से दूर रखने की कोशिश की जा रही है। लेकिन दोनों देश की आवाम ने पीपुल-टू-पीपुल कॉन्टैक्ट बनाये रखा है। आवाम के इस ट्रैक 2 का ही नतीजा है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के दो बड़े अखबार समूहों ने मिलकर एक मुहिम चलायी – अमन की आशा – जिसके तहत दोनों देशों के फनकार एक मंच पर हिंदुस्तान के अलग-अलग शहरों में अपना जलवा बिखेरेंगे। ये मुहिम आवाम ने झट लपक ली। और फनकारों को चियर करने भारी भीड़ उमड़ पड़ी।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कह चुके हैं कि हम जीवन में कुछ भी बदल लें लेकिन पड़ोसी नहीं बदल सकते। पड़ोसी कमज़ोर पड़ा तो उसका खामियाज़ा भारत को भी उठाना पड़ सकता है। पड़ोसी तो चीन भी है। उसके साथ भी जीना है। जब खबरें आती है कि चीन ने भारत का कुछ हिस्सा हथिया लिया है, या चीन भारतीय अधिकारियों की साइट्स हैक कर रहा है या चीन ने भारतीय इंजिनियरों को भारत के ही हिस्से में सड़क बनाने से रोका, तो क्या इन सब के चलते दिल्ली सरकार चीन पर आक्रमण की तैयारी में जुट जाती है कि वो हमारी समप्रभुता को चुनौती दे रहा? तो क्या ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लोगों के हत्या के लिए भारत उससे सारे संबंध विच्छेद करने के लिए तैयार है? क्या बदली परिस्थितियों में भारत कॉमनवेल्थ गेम्स अध्यक्ष माइक फैनेल को ये कहेगा कि ऑस्ट्रेलिया शामिल हुआ तो गेम्स इंडिया में नहीं होंगे?

प्रभात शुंगलू

प्रभात शुंगलू

अगर इन सवालों का जवाब हां है तो बेशक बदन पर तिरंगा लपेट कर, हाथ में बंदूक लिए, अश्फाक़ उल्ला खान के बोल गुनगुनाते, दिल में सरफरोशी की तमन्ना लिए देश का हर नागरिक पाकिस्तानी और चीनी सरहद पर दुश्मनों से मोर्चा लेने के लिए तैयार है। देश की एक दक्षिणपंथी पार्टी ने ऑस्ट्रेलिया को भारतीय सरज़मीं पर खेलने के ख़िलाफ़ धमकी दी है। चीन, ऑस्ट्रेलिया, ईरान, फ्रांस, बांग्लादेश और पाकिस्तान समेत, भारत की समप्रभुता को कभी किसी मोड़ पर चुनौती देने वाले हर उस देश को एक धमकी दिल्ली से भी जारी हो। एक हज़ार साल की जेहाद का आगाज़ इस बार हिंदुस्तान की तरफ से हो। ((यह लेख आज दैनिक जागरण में छपा है))

((वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू IBN 7 के एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं))

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Comments

2 Responses to “पाक के ख़िलाफ़ जेहाद का आगाज़ भारत की ओर से हो!”
  1. फ़िर से वही हवा-हवाई बातें… प्रभात जी समस्या का हल भी तो बताईये… कब तक जूते खाने की रस्म निभाये भारत?

  2. sam says:

    प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कह चुके हैं कि हम जीवन में कुछ भी बदल लें लेकिन पड़ोसी नहीं बदल सकते………
    bilkul badal sakte hai ………. khatam kar do padosi ko jo pareshan karta ho….. poori tarah se…….. jaise IRAN se iraniyo ko muslimo ne poori tarah se khatam kar diya ……. waise