कविता का रामदास और पुणे का सतीश शेट्टी

भारत के समकालीन लोकतंत्र की ख़ूबियों और उसमें आ रही गिरावटों को कविता में सबसे मुखर सबसे तीखे और सबसे उदास ढंग से दर्ज करने वाले थे हिंदी के वरिष्ठ कवि रघुबीर सहाय जिन्हें नागरिक लोकतांत्रिक मूल्यों की हिफ़ाज़त का पहरुआ कवि भी माना जाता है. उनकी एक चर्चित कविता है रामदास जिसे आशंका हो गई है कि एक दिन उसकी हत्या होगी. वो घर से निकलता है, उधेड़बुन, असमंजस और आधे भय आधे साहस और किंचित उदासी के साथ,

रामदास उस दिन उदास था, अंत समय आ गया पास था, उसे पता था आज उसकी हत्या होगी.

कविता का नागरिक रामदास अपनी हत्या की पक्की ख़बर को जानता हुआ जिस तरह चौड़ी सड़क और पतली गली से गुज़रता हुआ जा रहा था कुछ कुछ उसी तरह 21वीं सदी के हिंदुस्तान के एक शहर की एक सड़क पर सुबह की सैर पर निकला था सतीश शेट्टी. जिसकी उम्र 38 साल थी और उसे पता था कि उसकी हत्या हो सकती है. और उसने बताते हैं कि पुलिस को इस बारे में बताया भी था. उसे पता था कि भू दलालों के जिस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए वो सूचना के अधिकार के औजारों से लड़ाई में कूदा है वो उसे फंसा कर गिरा भी सकता है. लेकिन इस आशंका और चिंता के बावजूद सतीश सैर पर निकला था. खुली हवा से अपने फेफड़ो को सक्रिय करने और अपने ख़ून को और तपिश से भरने और अपने इरादों को और तरोताज़ा और इस्पाती बनाने के लिए.

लेकिन ये सुबह की सैर उनके पीछे हमलावर भी ला रही थी. एक कोने में अचानक सतीश पर हमला कर दिया गया. मध्ययुगीन किस्म की बर्बरता से लैस हमलावर तलवार लेकर आए. रघुबीर सहाय की कविता में हमलावर उचक कर चाकू से नागरिक रामदास पर वार करता है. देश के लोकतांत्रिक सिस्टम में हमलावर तलवार लहराते हुए एक निहत्थे नागरिक कार्यकर्ता पर वार करते हैं.

सतीश शेट्टी मारे जाते हैं. रामदास अपनी हत्या के बाद इस महान कविता के ज़रिए पैदा एक मानवीय उत्ताप और बेचैनी में ज़िंदा है, सतीश शेट्टी भी मर कर भी इसी तरह लोकतंत्र की चेतना और उसकी सुरक्षा के संघर्ष की अनकही हलचलों में ज़िंदा है.

वो मूल्यों की हार का उनकी बेबसी का प्रेत नहीं है. वो साहस की अविरलता की एक परंपरा का प्रतीक बन गए है.

सतीश शेट्टी सूचना के अधिकार के लिए संघर्षरत सामाजिक कार्यकर्ता थे. मशहूर समाजसेवी अन्ना हजारे ने उनकी हत्या पर गहरा क्षोभ जताया है. सीबीआई से जांच की मांग की गई है. और पुणे के जिस इलाके में अपने काम के लिए सतीश जाने जाते थे, वहां के आम लोग घटना से स्तब्ध और दुखी हैं. एक समाचार एजेंसी के हवाले से सतीश का एक कथन भी कोट किया गया है कि अहम ये नहीं है कि आप कितना जीते हैं, अहम ये है कि आप कैसे जीते हैं. सतीश शेट्टी ने अपनी कम उम्र में इतना सक्रिय, उबड़खाबड़ और जोखिम भरा जीवन बिताकर दिखा दिया कि जिया कैसे जीता है.

गजानन माधव मुक्तिबोध की महान कविता है अंधेरे में. कई दशक पहले की ये कविता 21वीं सदी के पहले दशक की समाप्ति के बाद भी जैसे कल की ही किसी विकरालता का बेतरतीब विचलित कर देने वाला ब्यौरा है. सतीश शेट्टी ऐसे समय में मार दिए गए जब लोकतांत्रिक संप्रभु राष्ट्र भारत गणतंत्र के रूप में स्थापित होने की साठवीं सालगिरह मना रहा है. आज़ादी के साठ साल मनाए जा चुके हैं. कई महापुरुषों की जयंतियां और कई सम्मानीय तारीख़ें गुज़र गई हैं. और तो और 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम के 150 साल भी हाल में पूरे हुए हैं.

हिंदी के वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी की एक मशहूर कविता है 1857 को लेकर..सामान की तलाश. मुक्तिबोध और रघुबीर सहाय की कविता की अनुगूंजें, प्रतिध्वनियां इसमें सुनाई देती हैं और वक्तों की क्रूरताओं का सिलसिला भी जैसे धूल उड़ाता हुआ तबसे लेकर अब तक हमारे समय की छाती को रौंद रहा है.

1857 की लडा़इयां जो बहुत दूर की लड़ाइयां थीं

आज बहुत पास की लड़ाइयां हैं

ग्लानि और अपराध के इस दौर में जब

हर ग़लती अपनी ही की हुई लगती है

सुनाई दे जाते हैं ग़दर के नगाड़े और

एक ठेठ हिंदुस्तानी शोर गुल

भयभीत दलालों और मुख़बिरों की फुसफुसाहटें

पाला बदलने को तैयार ठिकानेदारों की बेचैन चहलक़दमी…

सतीश शेट्टी ऐसी ही एक बहुत पास की लड़ाई लड़ रहे थे. एक स्वाधीन भारत के भीतर एक पराधीन बनाने वाले तंत्र से वो एक गुस्ताख़ लड़ाई लड़ रहे थे. उन्हें इस गुस्ताख़ी की सज़ा दे दी गई. तंत्र को ऐसी चुनौतियां मंज़ूर नहीं हैं. केरोसिन तेल के घपले की गंध और ज़मीनों और अपार्टमेंटो के घोटालो की धूल को सतीश शेट्टी और उनके साथियों ने सूंघ लिया था और देख लिया था और वे इस गंध और इस धूल को मिटाना चाहते थे, वे बस इतना चाहते थे कि केरोसिन आम आदमी को मिलता रहे और ज़मीन के कुछ हिस्से वंचितों के पास भी जाएं. उन्होंने कोई विश्व युद्ध नहीं छेड़ा था. उनके पास सामरिक ख़तरों के हथियार नहीं थे. उनके पास एटमी जखीरा नहीं था. उनके पास बारुदी सुरंगें नहीं थीं. बस कुछ मुड़े तुड़े क़ागज़ कुछ पीली पड़ चुकी फ़ाइलें कुछ कलम कुछ तख्तियां कुछ अख़बार कुछ पर्चे कुछ रंग कुछ दीवारें कुछ नारें और कुछ आवाज़ें और कचहरी की कुछ दौड़ें थीं.

38 साल की उम्र एक सपने की मौत की उम्र नहीं होती. एक स्वप्न की हत्या के लिए कोई भी उम्र काफ़ी नहीं है. एक स्वप्न की मौत नहीं हो सकती. महात्मा गांधी को तब गोली मारी गई जब वो क़रीब 80 साल के थे. सफ़दर हाशमी क़रीब 50 साल के थे, उमेश डोभाल को 35 साल में मार दिया गया. कई नाम हैं, कई ऐसी तड़प भरी यादें हैं जिनका ब्यौरा देते चले जाना ग़ैरमुनासिब है गोकि वे ज़ेहन में और संघर्षों की परंपरा में पैबस्त हैं. 38 साल के सतीश शेट्टी की मौत इस परंपरा की बेचैनी, उदासी, बेकली, भावुकता और आंसुओं को फिर से हरकत में ले आती है. लेकिन सिर्फ़ इतना ही नहीं. गुस्सा भी आता है जो कि निरर्थक नहीं है और न्यायसंगत है. विरोध की भावना और तीव्र और पैनी और संतुलित और फोकस्ड होती जाती है. साहस का और दायित्व का एक विवेक फिर से जागृत हो जाता है. लेकिन हममें से कई लोग ऐसे भी होंगे जिन्हें बाज़दफ़ा इतनी पास की लड़ाइयों को देखकर भी दूर खड़े रहने का उहापोह एक भीषण नैतिक बोझ की तरह दबाता रहेगा.

((शिवप्रसाद जोशी। पत्रकारिता में 15 साल लंबा सफ़र। राजनीति शास्त्र से एमए और भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। देश के चुनिंदा टीवी चैनलों में काम करने के बाद इन दिनों जर्मन रेडियो डॉयचे वेले की हिंदी सेवा में दूसरी पारी खेल रहे हैं।))

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Comments

One Response to “कविता का रामदास और पुणे का सतीश शेट्टी”
  1. कुमार राकेश says:

    सही कहा आपने। इस व्यवस्था में सतीश शेट्टी जैसे साहसी लोगों की हत्या होनी ही है। उन्हें अपने साहस की कुछ कीमत तो चुकानी पड़ेगी। जो लड़ रहे हैं वो घेर कर मार दिए जाएंगे … जो नहीं लड़ रहे उनकी नियति में घुट-घुट कर जीना है और आहिस्ता आहिस्ता मरना।