हमारे हाथ भी सतीश शेट्टी के ख़ून से सने हैं!
लेखक: समरेंद्र | January 15, 2010 | हक़ की आवाज़ | 3 Comments
आरटीआई एक्टिविस्ट सतीश शेट्टी की हत्या गहरी हताशा और निराशा को जन्म देनी वाली है। भ्रष्ट तंत्र और आपराधिक व्यवस्था के बदलाव की हल्की उम्मीद भी ख़त्म होने को है। लगता है कि इस उम्मीद को ज़िंदा रखना खुद को धोखा देना है। हमें यह मान लेना चाहिए कि अपराधियों और क्रूर तंत्र से लड़ने वालों का यही अंजाम होगा। लड़ने का हौसला करने वालों को सरे राह ऐसी ही मौत मिलेगी। धोखे से वार करके उन्हें तड़पता हुआ छोड़ दिया जाएगा। ताकि सनद रहे कि आवाज़ उठाना मौत को दावत देना है। कानून चंद छोटी मछलियों को सज़ा देकर अपना नैतिक दायित्व पूरा कर लेगा। बड़े अपराधी सत्ता का सुख भोगते रहेंगे।
38 साल के सतीश शेट्टी की हत्या बुधवार की सुबह 6:45 मिनट पर हुई। वो पुणे के तालेगांव में टहलने निकले थे। कुछ “अज्ञात” लोगों ने उन पर तलवार से वार किया। सतीश शेट्टी को अस्पताल पहुंचाया गया। जीवन के लिए हर सांस संघर्ष किया। फिर खामोश हो गए। उम्मीदों ने दम तोड़ दिया।
सतीश शेट्टी का गुनाह क्या था? यही कि उन्हें इस भ्रष्ट तंत्र में सुधार की उम्मीद थी। यही कि उन्हें लगता था कि अपराधी धरे जाएंगे। वो सोचते थे कि जो लोग दीमक की तरह देश को खा रहे हैं, आम जनता का हक़ मार रहे हैं, गरीबों का लहू चूस रहे हैं… ऐसे वहशी लोगों को उनके किए की सज़ा मिलेगी। आज के दौर में ऐसा सोचना बहुत बड़ा गुनाह है। क़त्ल और बलात्कार से भी बड़ा गुनाह। तभी तो क़ातिल और बलात्कारी संसद तक पहुंच जाते हैं… किसी राज्य के डीजीपी बन सकते हैं… राज्यपाल बन सकते हैं। दलाल सत्ता की मलाई खा सकते हैं। जीवन के अनंत सुख भोग सकते हैं। लेकिन आम लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वालों के हिस्से बेबसी के सिवाए कुछ नहीं। उन्हें एक तरफ क्रूर और वहशी व्यवस्था से लड़ना है। साथ ही अपने भीतर हर पल गहराती निराशा से संघर्ष करना है। ताकि उम्मीद की लौ धधकती रहे।
सतीश शेट्टी की हत्या पर हाई कोर्ट ने कठोर टिप्पणी की है। जस्टिस रिबेलो और भाटिया की बेंच ने राज्य सरकार और पुलिस महानिदेशक को इस हत्याकांड पर हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह आदेश वकील दिनेश गोंजारे की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। लोनावला और तालेगांव इलाके में भू-माफिया ने किसानों की ज़मीन पर कब्जा करने के लिए नया हथकंडा निकाला था। कानून के मुताबिक किसानों की ज़मीन किसी किसान को ही खरीदी और बेची जा सकती है। लेकिन भू-माफिया ने किसानों से ऐसे समझौते किए जिनके जरिए मालिकाना हक़ तो किसान के पास रह जाता लेकिन उस जमीन के इस्तेमाल के सारे हक बिल्डरों और भू माफिया के नाम हस्तांतरित हो जाते। यह सबकुछ बिना सत्ता की शह के मुमकिन नहीं था। बीते साल इस गोरखधंधे के ख़िलाफ़ जनहित याचिका दायर हुई थी। उसके लिए तथ्य जुटाने में सतीश शेट्टी ने अहम भूमिका निभाई थी। इस जनहित याचिका में राज्य के मुख्यमंत्री, राजस्व मंत्री, पुणे के कमिश्नर, जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सभी को जवाब देना है।
यह सिर्फ़ एक मामला है। सतीश शेट्टी ने भ्रष्टाचार के ऐसे कई मामलों को सामने लाने में अहम भूमिका निभाई थी। जब भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी मजबूत हों तो संघर्ष कितना मुश्किल होगा इसका अंदाज़ा लगाइए। यह भी सोचिए कि सतीश शेट्टी की हत्या के पीछे किन लोगों का हाथ हो सकता है। फिर इंसाफ़ की आस कितनी रह जाती है यह अनुमान लगाइए।
अभी पुलिस कह रही है कि सूचना अधिकार के तहत सतीश शेट्टी ने जो जवाब मांगे थे उन जवाबों से जिन-जिन की सेहत पर असर पड़ता था उन सभी से पूछताछ की जाएगी। लेकिन यह अभी मीडिया के दवाब में हो रहा है। कुछ दिन बाद सबकुछ ठंडा पड़ जाएगा। देश की जनता तो छोड़िए महाराष्ट्र के लोग भी भूल जाएंगे कि सतीश शेट्टी नाम का कोई आरटीआई कार्यकर्ता हुआ करता था। यह भी भूल जाएंगे कि ताक़तवर लोगों ने उसकी सरे राह हत्या कर दी।
दरअसल, अकेले सतीश शेट्टी ने दम नहीं तोड़ा है। हमारे सड़े-गले लोकतंत्र की हत्या हुई है। इस लोकतंत्र में जहां एक तरफ़ चंद लोग हैं जिनके हिस्से दुनिया की तमाम खुशियां हैं और दूसरी तरफ़ करोड़ों लोग जिनके हिस्से भूख और गरीबी है। जिनकी आंखों में ज़िंदगी की जगह उदासी है। जो हमारी सड़कों पर कहीं भी भीख मांगते नज़र आ जाएंगे। खेतों में पसीने की जगह लहू बहाते दिख जाएंगे। ऊंची-ऊंची इमारतों के निर्माण में अपनी हड्डियां गलाते मिलेंगे। इनमें से ज़्यादातर के पास कोई आसरा नहीं है। लेकिन कुछ के पास ज़िंदगी ढोने के लिए एक-दो बीघे ज़मीन है। लेकिन हमारी व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे क्रूर और वहशी लोगों को नज़र इनके उस आखिरी सहारे पर है। वो इनसे वो ज़मीन भी छीन लेना चाहते हैं, ताकि उस पर अपने सपनों का महल खड़ा कर सके। सतीश शेट्टी जैसे लोग उस महल के निर्माण में बाधक होते हैं। इसलिए रास्ते से हटा दिए जाते हैं।
चलिए हम सब सतीश शेट्टी और भारत के सड़े-गले लोकतंत्र की मृत्यु पर दो मिनट का मौन रखें। यही एक काम है जो हम ईमानदारी से करते आए हैं। आज भी करेंगे। वैसे भी इससे अधिक कुछ करने की हमारी औकात नहीं। औकात है तो फुरसत नहीं। कई बार तो लगता है कि हम सतीश शेट्टी जैसे जुझारू लोगों के साथ नहीं बल्कि उनके क्रूर क़ातिलों के साथ खड़े हैं!
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समरेंद्र ji, सतीश शेट्टी jasee logan ke kurbani ikk din rang zaroor layegee…hum esse logan ko har samay yaad rakhee or unkee politics ko uphold karen yeh hamara faraz hai.
काश मैं भी सतीश शेट्टी बन पाता… पता नहीं इस देश की मीडिया, ब्यूरोक्रेट्स, नेता और व्यापारी किस मिट्टी के बने हैं… जिनके उपर जिम्मेदारी है… वो ही हवशी बने हुए हैं… पता नहीं कब कोई राह निकलेगी… कब सम्मान और ईमानदारी से जीने वालों को कम से कम शोहरत नहीं तो इज्जत मिलेगी…
डेमोक्रेसी में जो लोग क्रेसी के सबसे ऊपर बैठे हैं उनके खिलाफ सबूत जुटाना और जुटाने की हिम्मत करना मौत को ही बुलावा देना है….सतीश इस हकीकत से वाकिफ थे, फिर जुटे हुये थे। उन्हें तलवारों से काट दिया गया….देखते है इस क्रेसी में यह सिलसिला बंद भी होता है या नहीं….वैसे संभावना कम है। ऐसा नहीं है हम कुछ नहीं कर सकते …कर सकते हैं बहुत कुछ…बहुत कुछ.