नीतीश कुमार के सुशासन का एक ख़ौफ़नाक सच
लेखक: प्रसून लतांत | January 14, 2010 | हक़ की आवाज़ | Comments Off
इस बार जनसत्ता के रविवारी में प्रसून लतांत की रिपोर्ट छपी है। इस रिपोर्ट से बिहार में नीतीश कुमार के सुशासन का दूसरा पहलू सामने आता है। पता चलता है कि मुखिया भले ही पिछड़ी जाति का है लेकिन राज दबंगों का चल रहा है। यह भी कि बिहार में सुशासन का गुणगान एक छलावा है। कुछ समय पहले जब केंद्र में लालू यादव रेल मंत्री थे तो दिल्ली के कुछ पत्रकारों ने उन्हें मैनेजमेंट गुरू घोषित कर दिया था। इन दिनों मीडिया लालू के सियासी दुश्मन नीतीश पर मेहरबान है। बिहार में उनका राज है। करोड़ों अरबों रुपये विज्ञापनों पर खर्च हो रहे हैं और शायद ही किसी अख़बार में इतना साहस है कि नीतीश को सच्चाई का आईना दिखाए। लेकिन जनसत्ता की यह रिपोर्ट पढ़ने लायक है। हम जनसत्ता से साभार प्रसून लतांत की यह रिपोर्ट आपसे साझा कर रहे हैं। इस उम्मीद में कि आप पढ़ेंगे, सोचेंगे और खुलकर अपनी प्रतिक्रिया देंगे। – मॉडरेटर
एक जमाने में लाखों भूमिहीनों को भूस्वामी बनाने वाले भूदान आंदोलन की ज़मीन खिसक रही है। बिहार के करीब साढ़े चार लाख भूदान किसान अब गांधी-विनोबा का रास्ता छोड़ खूनखराबे वाली विचारधारा के करीब जाने को मजबूर हैं। इन किसानों को भूदान आंदोलन के दौरान बड़े-बड़े भूपतियों से विनोबाजी को दान में मिली ज़मीन से एक-एक टुकड़ा आजीविका के लिए मिला था, जिस पर अब दबंगों की आंखें लग गई हैं। वे हर तरह के हथकंडे अपना कर निर्बल भूदान किसानों की ज़मीन हड़पने में जुटे हैं। इसके बाद किसान असहाय हो जा रहे हैं। सरकार भी दबंगों से भूदान किसानों की ज़मीन बचाने में विफल नज़र आ रही है। ये वे किसान हैं, जो सबसे छोटे किसानों में शुमार किए जाते हैं। अब उनकी ज़मीन का यह छोटा-सा टुकड़ा भी उनके पास नहीं बच पा रहा है। सरकारी रसीद नहीं दिखाने पर भूदान किसानों को उनकी ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है, क्योंकि सरकार का रसीद-दाता विभाग नियमित रसीद नहीं दे रहा है। रसीद के लिए भूदान किसान अंचल कार्यालय के चक्कर लगाकर थक चुके हैं। वे अपने इस जीवन-धन को बचाने के लिए माओवादियों की शरण में जाने की तैयारी में हैं।
इन खेतिहरों की यह तकलीफ दिसंबर में पटना में हुए एक सम्मेलन में खुलकर सामने आई। वे लंबे समय से सरकार के ढुलमुल रवैए और सरकारी अधिकारियों की उदासीनता से आजिज दिखे। इस सम्मेलन में बिहार के तीस जिलों से हजारों भूमिहीन किसान अपने-अपने खर्चे से पहुंचे। इनमें नंगे पांव महिलाएं और भूदान किसान भी भारी संख्या में शामिल थे। इन किसानों ने आपबीती सुनाने के बाद साफ कहा कि अब उनके पास माओवादियों की मदद लेने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है। बिहार भूदान किसान यज्ञ कमेटी के अध्यक्ष शुभमूर्ति ने बताया कि अगर सरकारी अफसर भूदान किसानों को उनकी ज़मीन की रसीद नहीं देंगे और पुलिस उनकी ज़मीन हड़पने वाले दबंगों की मदद करेगी तो बिहार के साढ़े चार लाख भूदान किसानों को माओवाद का रास्ता अख्तियार करने से रोकना मुश्किल हो जाएगा। गया और पश्चिमी चंपारण इलाके में तो माओवादी भूदान किसानों के बीच सक्रिय भी हो गए हैं।
भूदान को लेकर, खासतौर से, बिहार की तस्वीर दूसरे राज्यों से अलग है। विनोबा को अपनी भूदान यात्रा के दौरान सबसे अधिक ज़मीन बिहार में मिली थी। इस कामयाबी के साथ सैकड़ों भूदानी कार्यकर्ता भी तैयार हो गए थे। वे सब चालीस सालों से भूदान किसानों की ज़मीन बचाए रखने के लिए राज्य सरकार की कामचलाऊ मदद से चल रही भूदान यज्ञ कमेटी के तहत काम कर रहे हैं। इनकी संख्या भी तेजी से घटी है। बचे-खुचे इन कार्यकर्ताओं के भरोसे ज़मीन नहीं बचाई जा सकती, क्योंकि इनके पास अपने ही वजूद को बचाने के लिए संसाधन नहीं हैं।
भूदान यज्ञ कमेटी के कर्मचारियों की हालत खस्ता है। उन्हें साल-साल भर वेतन नहीं मिलता। सरकार इस कमेटी को दी जाने वाली वित्तीय मदद में कटौती करती रही है। स्वीकृत राशि भी समय पर नहीं दी जाती। इस कमेटी को मजबूत करने के लिए भू-सुधार आयोग ने भी सिफारिश की थी। ऐसे में भूदानी कार्यकर्ता अब सरकारी अफसरों के रवैए और सीनाजोरों के हथकंडों के आगे बेबस हैं। पूर्णिया जिला भूदान कार्यालय के कार्यकर्ता मुस्तफा आलम रजा कहते हैं कि उनके जिले में विनोबा भूदान यात्रा के दौरान दो महीने ठहरे थे और उन्हें यहां करीब सत्ताईस हजार एकड़ ज़मीन मिली थी, जिसमें चौदह हजार एकड़ ज़मीन भूमिहीनों को बांटी गई थी। लेकिन इनमें आधी से अधिक वितरित ज़मीन के सरकारी कागज दुरुस्त नहीं हैं। जिन्हें ज़मीन मिल चुकी है उन्हें रसीदें नहीं दी गईं। जिन किसानों के पास रसीद नहीं है, उनकी ज़मीन दबंग ज्यादा आसानी से अपने कब्जे में ले रहे हैं। किसान इंसाफ के लिए अदालत दौड़ते हैं लेकिन उनकी इतनी सामर्थ्य नहीं होती कि अदालती कवायद से गुजर कर ज़मीन अपने कब्जे में फिर से हासिल कर लें। मुस्तफा कहते हैं कि ऐसे में अगर इन किसानों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया तो जाहिर है वे वहीं जाएंगे जहां उन्हें मदद की उम्मीद होगी।
बिहार के पास भूदान में मिली करीब 6.48 लाख एकड़ ज़मीन थी। इनमें 3.48 लाख एकड़ ज़मीन नदी-नाले और पहाडीÞ थी तो उसे सरकारी अफसरों ने वितरण के अयोग्य घोषित कर दिया। बाकी बची 2.53 लाख एकड़ ज़मीन को 1953-54 से बांटा जा चुका है। अब केवल 4,818 एकड़ ज़मीन बांटने के लिए शेष है। बांटी गई ज्यादातर ज़मीन पर विवाद है और यह विवाद सरकारी लापरवाही के चलते पैदा हुआ है। इस पर काबू पाया जा सकता है पर लगता है अधिकारी अपने रवैए से मामले को बिगाड़ रहे हैं।
अहिंसावादी संगठन सर्व सेवा संघ के पूर्व अध्यक्ष अमरनाथ भाई कहते हैं कि भूदान किसान अहिंसा में विश्वास करते हैं लेकिन उनके सामने ज़मीन के एक टुकड़े को बचाने के लिए पहाड़ सी चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों के कारण वे अब माओवादी बनने को लाचार हो गए हैं। वे कहते हैं कि यह स्थिति इसलिए आ गई है कि नौकरशाही भ्रष्ट हो गई है और वह इन किसानों की तकलीफ को समझ नहीं पा रही है।
बिहार के भूदान नेताओं में सूर्यनारायण कामत, रामचंद्र चौधरी, फेंक नारायण मंडल और रामशरण भी भूदान किसानों के मौजूदा मसले पर एक जैसी राय रखते हैं। उनका मानना है कि अगर नौकरशाही ईमानदारी और चुस्ती से इनकी समस्याओं का हल नहीं करेगी तो वे दूसरे रास्ते अख्तियार करने को विवश हैं। राज्य सरकार भूदान यज्ञ कमेटी को सशक्त करेगी तो मसले हल हो सकते हैं पर वे यह नहीं मानते हैं कि नौकरशाही इस मामले में कभी गंभीर भी होगी। अब तो उनके लिए आंदोलन ही एकमात्र रास्ता है।
दिसंबर के पटना सम्मेलन में भूदान किसानों ने अपना एक संघ बनाया है। अब यह संघ ही आंदोलन के जरिए बिहार में भूदान यज्ञ के बचे काम को अंजाम तक पहुंचाएगा। शुभमूर्ति कहते हैं कि भूदान यज्ञ कमेटी की ज़मीन बांटने का काम पूरा हो चुका है। अब इसकी भूमिका बदलने की जरूरत है। अब कमेटी का सारा जोर भूदान किसानों को न केवल उनकी ज़मीन दिलाने बल्कि उन्हें सारे नागरिक हक दिलाने के लिए संघर्ष करेगा। वे कहते हैं कि अब जो काम बचे हैं वे दाखिलखारिज करने और दखल दिलाने का है, उसे पूरा करने में सरकार मदद नहीं करेगी तो हिंसा और नक्सलवाद से देश को बचाना मुश्किल हो जाएगा। रास्ता यही है कि तो गरीबों को न्याय मिले और संपूर्ण क्रांति हो।
सम्मेलन में महिलाओं की भागीदारी अभूतपूर्व थी। गया जिले की एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि भूदान ज़मीन की रक्षा में उसके बेटे की हत्या हो गई, फिर भी ज़मीन उसके कब्जे में नहीं आ सकी।
हाल के सालों में राज्य की तीस हजार महिलाओं को ज़मीन का पर्चा दिया गया है, लेकिन इनमें से ज्यादातर की इस बुजुर्ग जैसी ही कहानी है। महिलाओं को ज़मीन का पर्चा तो मिला है पर ज़मीन पर दखल नहीं। सरकारी अफसर उन्हें उनकी ज़मीन की रसीद नहीं देते। दाखिल खारिज में भी गड़बड़ियां हो रही हैं। ज़मीन जब दान में मिली थी, तब राजस्व कार्यालय में उसकी स्थिति 1903 के नक्शे के हिसाब से थी। अब नए सर्वे के मुताबिक ज़मीन का खाता खसरा नया बना दिया गया है। अंचल के अफसर भूदान किसानों से 1903 का नक्शा मांगते हैं। उनके पास तब के नक्शे होते तो वे ऐसे अफसरों के पांवों पड़ने को लाचार नहीं होते। सरकारी उदासीनता की वजह से उनकी ज़मीन का पर्चा मात्र कागज का एक टुकड़ा साबित हो रहा है। भूदान महिला किसानों में ज्यादातर की स्थिति दयनीय है। उसे भूदान की ज़मीन से ही अपनी आजीविका की गाड़ी खिंचने की उम्मीद थी, पर अब वे इंसाफ के लिए संघर्ष के रास्ते पर उतर चुकी हैं।
भूदान किसान संघ ने संघर्ष करने का एलान किया है। सम्मेलन में यह मांग जोरशोर से की गई कि वितरित ज़मीन का दाखिल खारिज जल्द से जल्द हो और इसमें सरकार पूरी उदारता से मदद करे। इसी के साथ पहले नदी-नाले और पहाड़ों वाली जिस ज़मीन को वितरण के अयोग्य माना गया था, उसका सर्वेक्षण कराया जाए ताकि उसमें से खेती के लायक ज़मीन को भूमिहीनों के बीच बांटा जा सके।
विनोबा लगातार बारह सालों तक भूदान यात्रा पर रहे। करीब पचहत्तर हजार किलोमीटर की यात्रा कर उन्होंने पूरे देश की परिक्रमा कर डाली। इस दौरान उन्हें करीब 45 लाख एकड़ ज़मीन दान में मिली। 1951 में विनोबा के इस पराक्रम से देश में भूमिहीनों के बीच ऐसी आशा का संचार हुआ कि उस समय देश में लगी ग्रामीण हिंसा की आग तत्काल बुझ गई। आज इतने सालों बाद जो स्थिति सामने है, उसकी भी आशंका विनोबा ने जाहिर कर दी थी। उन्होंने कहा था कि भूदान का काम पूरा नहीं हुआ तो नरकटिया होगी। आज नरकटिया वाली हालत है। भूदान किसान जिस हाल में हैं, उससे यही आशंका हो रही है कि बिहार में फिर नरसंहार का दौर शुरू होने वाला है। एक उम्मीद थी कि सरकार बंद्योपाध्याय के नेतृत्व वाली भूमि सुधार आयोग की सिफारिशों को अमल में लाएगी तो बड़े पैमाने पर ज़मीन उपलब्ध होगी और सभी भूमिहीनों को आजीविका के लिए ज़मीन मिल जाएगी। लेकिन अब तो जिन्हें थोड़ी-सी ज़मीन भूदान यज्ञ कमेटी से मिली है, वही अपनी ज़मीन नहीं बचा पा रहे हैं तो बाकी भूमिहीन किसके भरोसे ज़मीन पाने की उम्मीद करें।




