TRP डिबेट पार्ट -2… कौन कहता है कि अख़बार गंदे नहीं?
लेखक: जनतंत्र डेस्क | January 13, 2010 | पहरेदार | 1 Comment
टीआरपी पर चल रही बहस में कई आयाम जुड़ रहे हैं। डिस्ट्रिब्यूशन का मुद्दा भी उछला है और केबल माफिया की दादागीरी भी बहस के दायरे में है। टीवी की तुलना अख़बारों से भी हो रही है और रंगनाथ जी जैसे कुछ लोगों का मानना है कि अगर अख़बारों में विजुअल का स्कोप होता तो वो नंगई में टीवी को भी मात दे देते। आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं? – मॉडरेटर
दारेन शाहिदी - अजीत जी, बहुत अच्छी बहस शुरू की है आपने. आपको क्या लगता है कि टीआरपी हर हफ्ते न आकर साल में दो बार आने लगेगी तो सबकुछ ठीक हो जायेगा? अभी तो कम से कम ये होता है कि किसी हफ्ते न्यूज़ दिखाकर कोई चैनल नंबर एक हो जाता है तो बाकी दो तीन नंबर वाले अगले हफ्ते न्यूज़ दिखाने लगते हैं. और कोई गन्दगी दिखाकर नंबर एक होता है तो बाकी अगले हफ्ते गन्दगी पर उतर आते हैं. चलिए अगर छमाही सिस्टम आ गया तो हो सकता है कि कम से कम छ महीने न्यूज़ देखने को मिले लेकिन डर ये भी है कि कहीं छः छः महीने गन्दगी न झेलनी पडे.
टीआरपी बंद करना या छमाही तिमाही करना कोई समाधान नहीं देगा… विज्ञापन देने वाले बाज़ार को जानते हैं… वो अन्दर की बात जान लेंगे… प्राइवेट सर्वे करवा लेंगे… फिर आपको वही करने पर मजबूर करेंगे जो आप नहीं करना चाहते… अख़बारों में तो ये होता ही आया है… अंग्रेजी के एक बडे अखबार में ये ड्रामा हो चुका है. कई संपादक छोड़ कर चले गए लेकिन फिर कुछ वापस भी आ गए. मालिक का क्या बिगडा. रही बात सैम्पल की तो कहीं पढा था कि अगर सैम्पल बहुत ज्यादा बडा कर दिया गया तो हो सकता है कि दूरदर्शन न्यूज़ नंबर एक हो जाये. पता नहीं सही है या गलत.
सर आप जिस स्थान पर हैं वहाँ सचमुच ऊहापोह की स्थिति होगी… क्या करें क्या न करें… चैनल चलाना एक धंधा है… है कि नहीं… ये भी सही है कि यहाँ बाजार हावी है… इस बाजार में मालिक मुनाफा कमाने के लिए बैठे हैं… हर धंधा हर कारोबारी को कहीं न कहीं विवश बनाता है… कहीं निवेश के नाम पर… कहीं राजनैतिक प्रतिबद्वताओं और मजबूरियों के नाम पर… आज न जाने कितने संपादक या मालिक राजसभा की सीट का सपना पाले बैठे होंगे… कौन जानता है.
आलोचना से घबराना नहीं चाहिए… ये देखा जाना ज़रूरी है कि आलोचना कौन कर रहा है. आजकल हिंदी न्यूज़ चैनल को गरियाना फैशन हो गया है. पंजाब केसरी जैसे अखबार भी अब हिंदी न्यूज़ चैनल पर उपदेशात्मक संपादकीय लिखने की जुर्रत करने लगे हैं. अब आप समझ सकते हैं. समरेन्द्र सही कह रहे हैं… मेरा भी ये मानना है कि आपलोग आपस में बैठ कर तय करें कि कितना नीचे जाना है. और वो सीमा ऐसी हो कि आपको भविष्य में माफी मांगने के लिए मजबूर न करे. बल्कि तब भी आप गर्व से ये कह सकें कि हां … बाजार की मजबूरी के तहत हमने ये किया लेकिन इसमें भी पत्रकारिता की शुचिता के साथ खिलवाड़ नहीं किया.
रंगनाथ सिंह - जिन लोगों को फौरी समाधान चाहिए उन्हें ऐसी किसी बहस से दूर हट जाना चाहिए। “बहस” कोई डिसपैंसरी नहीं होती जहां बीमारी के लक्षण बताया नहीं कि डाक्टर ने गोली लिख दी। अजीत जी आपने अखबारों का जिस तरह से हवाला दिया है वो पूरी तरह अनुचित है। अखबारों में टीआपी नही होती लेकिन नम्बर वन का तमगा उन्हें भी मिलता है। वो उसका दुरू या सद – उपयोग भी करते हैं। आप के कहे से ऐसा लगता है कि अखबारों में पत्रकारिता बची हुई है! हम जानते हैं कि हर मीडियम की अपनी सीमाएं होती हैं। अखबारों में जो चीज नहीं दिखाई देती वो उसके विजुअल न होने के ही कारण है। टाइम्स आफ इण्डिया या पंजाब केशरी या दैनिक जागरण विजुअल होने लगे तो वो अपने हमराह चैनलों से भारी ही पड़ेंगे। जिन समूहों के अखबार और चैनल हैं उनकी पालिसी हर मीडियम में एक ही होती है। दिलीपजी ने गौरतलब बात रखी है कि टीआरपी तो विज्ञापनदाताओं के लिए है न कि जनता के लिए। उसकी जरूरत या गैर-जरूरत का निर्णय वो करेंगे न कि नौकरीजीवी मध्यमवर्गीय पत्रकार। यह भी सही है कि साधुवाद से सुधार की गंजाइश होती तो दूरदर्शन कि यह दुर्गती न होती। चैनलों के कंटेट में आ रही गिरावट अपनु मूल में राजनीतिक-अर्थशास्त्र का प्रश्न है। मोंटेक-मनमोहन-चिंदबरम की एलपीजी पालिसी के तहत लागु की जाने वाली नीतियां ही इसके लिए जिम्मेदार है। ध्यान रहे खुली प्रतिस्पर्धा वाले बाजार में नैतिकता के ब्रेकर नहीं होते। यहां एक बुनियादी मतभेद यह भी हो सकता कि समाचार या मनोरंजन चैनलों का उद्देश्य क्या है ? मुझे तो लगता कि चैनलों पूंजीपतियों के लिए मदारी का काम करते हैं। जिस तरह सड़क पर बैठा मदारी लुभावनी और हरदिलअजीज भाषा बोलकर भीड़ इकट्ठ करता है क्योंकि उसे कुछ अपने उत्पाद को बेचना है। उसी तरह प्रच्छन्न रूप से हर चैनल इन एमएनसी के उत्पाद को बेचने के लिए चैनल चलाते हैं। विज्ञापन ही ब्रह्मास्त्र है जिसके द्वारा चैनल रेगुलेट किए जाते हैं। सरकारी भी भारी विज्ञापन देती है लेकिन वो भी सरकारी विज्ञापनों का मीडिया को रेगुलेट करने के लिए खूबसूरती से इस्तेमाल करती है। अतः मीडिया में गिरावट एक राजनीतिक प्रश्न है। इसका किसी टुटीफ्रुटी टाइप टीआरपी से कोई सीधा संबंध नहीं दिखता। और यह गिरावट सभी क्षेत्रों में है। इसका जो भी समाधान होगा वो राजनीतिक होगा। सर्जरी करनी ही होगी। होम्योपैथिक इलाज से कोई उम्मीद नहीं रखे।
किरणदीप भाटिया – अगर टीआरपी का कोई दबाव नहीं होगा तो चैनल सच में न्यूज़ चैनल बन जाएंगे।
अनिल सोनी – अखबार और टीवी में फर्क है एक चल रहा है तो दूजा दौड़ रहा है
अगर टीआरपी की समय सीमा बढ़ा दी जाएगी इसकी रफ़्तार कम हो जाएगी….
सही बात तो ये है की मैं टीआरपी के सिस्टम को ही खराब समझता हूँ …महज कुछ लोगों के ऊपर हम पूरे देश में कौन क्या देख रहा है इसका आंकलन नहीं कर सकते …..
अजीत अंजुम – दारेन, आपकी बात से बहुत हद तक सहमत हूं . टीवी चैनल करोड़ों के इन्वेस्टमेंट की बुनियाद पर खड़ा होता है . बाहरी दुनिया के लोगों को लग सकता है कि चैनल लांच करने वाला कोई भी मालिक हर महीने मोटा मुनाफा कमा रहा होता है , लेकिन ये सच नहीं है . गिनती के कुछ चैनल्स को छोड़ दें तो सभी घाटे में चल रहे हैं. मैं अगर घाटे की बात कर रहा हूं तो आप तुरंत मुझ पर मैनेजमेंट की तरफदारी करने का आरोप लगाए बगैर सोचिए कि कोई भी चैनल पूंजी के बगैर चलेगा कैसे. एक चैनल चलाने के लिए हर महीने करोड़ो खर्च होते हैं. जितना खर्च कंटेंट तैयार करने में होता है , करीब उतना ही या उससे ज्यादा उस चैनल को आपतक पहुंचाने में होता है, यानी डिस्ट्रीब्यूशन में. आपको बता दें कि एक चैनल के डिस्ट्रीब्यूशन में हर साल 42-46 करोड़ का खर्च है. रेटिंग का खेल भी डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़ा है. जो जितना पैसा डिस्ट्रीब्यूशन पर खर्च करने का माद्दा रखता है, उसकी पहुंच उतनी ज्यादा होती है. रेटिंग भी उसी अनुपात में बढ़ जाती है. आप लाख बेहतर कंटेंट बना दें, खबरों की दुनिया का चैंपियन बन जाएं लेकिन अगर आपका चैनल 45 करोड़ खर्च नहीं कर सकता, तो गए काम से. केबल माफिया पर लगाम कैसे लगेगी. ये भी बड़ा सवाल है. डिस्ट्रीब्यूशन कितना अहम है , इसे समझना जरूरी है. कई महीने पहले ( शायद पिछले साल के आखिरी महीनों में) एनडीटीवी इंडिया अचानक सहारा समय से नीचे चला गया था. सहारा तेजी से ऊपर बढ़ रहा था. जानते हैं क्यों? क्योंकि एनडीटीवी का डिस्ट्रीब्यूशन कमजोर हुआ था और सहारा मजबूत हो गया था. क्यों हुआ होगा, ये आप समझ सकते हैं . कुछ ही हफ्तों में तस्वीर बदल गई . एनडीटीवी का डिस्ट्रीब्यूशन 28-30 फीसदी हो गया , वो उछलकर सहारा से ऊपर पहुंच गया . इस खेल को भी समझना होगा.
((यह बहस अभी जारी है … ))
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अगर बहस का मुद्दा टाइटल टीआरपी और सबटाइटल के तौर पर माध्यमों को घटिया और गंदा करार देने का है तो मैं अखबार को टेलीविजन से ज्यादा घटिया मानता हूं। ऐसा लिखने के पहले मैं न तो जनसत्ता को लेकर नास्टॉल्जिक होना चाहता हूं और न ही दूसरे किसी अंग्रेजी अखबारों को सामने रखने की कोशिश कर रहा हूं। जिस तरह न्यूज चैनलों को लेकर पूरी बहस उन चैनलों को लेकर हो रही है जिसकी टीआरपी है और वो गंध मचा रहे हैं उसी तरह आप उन अखबारों को लेकर बहस कीजिए जिनके सबसे ज्यादा सर्कुलेशन हैं। जो सीधे-सीधे मार्केटिंग के स्तर पर एक-दूसरे को टक्कर दे रहा है। मतलब कि चैनलों के मामले में अगर पूरी बहस टीआरपी पर रख रहे हैं तो अखबारों की पूरी बहस रीडरशिप औऱ रिच को लेकर की जानेवाली तिगड़मों पर बहस कीजिए। तब बात साफ-साफ बनेगी। तब आपको अंदाजा लगेगा कि मसालेदार,छिछले और क्रिस्पी खबरें छापने के पीछे अखबार की रणनीति क्या होती है? अखबारों में गूगल इमेज औऱ फिलक्रम की तस्वीरों को उठाकर छापने के पहले उभारों और नितंबों को कहां से काटा जाए कि वो ज्यादा से ज्यादा अपीलिंग लगे,पूरे मनोयोग से काम करनेवाले मीडियाकर्मियों को देखकर उबकाई आने लगती है। ये तो बहुत ही मामूली-सा नमूना है।
कंटेंट के लिए किस तरह से वो इन्टरनेट पर हांफते रहते हैं,इसका अंदाजा आपको आसानी से लग जाएगा। टेलीविजन के लोगों की शिकायत होती है कि उसकी खबर को अखबारों ने उठाकर छाप दिया,अखबार के लोगों की अकड़ होती है कि उन्हें पढ़कर टीवीवाले खबर बनाते हैं लेकिन सच्चाई ये है कि कहानी एक-दूसरे से जुदा नहीं है। अखबारों में भी फील्ड की रिपोर्टिंग घटी है। तथ्यात्मक गलतियों की बाढ़ है। अभी ज्योति बसु के स्वर्गवासी हो जाने की खबर बिना किसी क्रॉस चेकिंग के सहारा के छापे जाने की खबर मोहल्लालाइव पर प्रकाशित हुई है। खबरों को लेकर किस हद तक मैनिपुलेशन है ये आप-हमसे छुपा नहीं है। प्रथम प्रवक्ता के विशेषांक से लेकर इन्टरनेट की दुनिया में इस बात को लेकर जमकर बहस हुई है। अखबारों को टेलीविजन के मुकाबले बेहतर मानना एक खास किस्म की इलीटनेस झाड़ने का हिस्साभर है।
बड़़े-बड़े नामों को जुटाकर एडीटोरियल पन्नों पर किसी को एक कठ्ठा,किसी को दो कठ्ठा अखबारी जमीन दे देने से अखबार की विश्वसनीयता और गुणवत्ता बरकार रह जाने की अगर समझ है तो इसमें ध्वस्त किए जाने चाहिए। यहां ज्यादा भ्रष्टाचार है,ज्यादा घपलेबाजी है।..और टेलीविजन में तो सामंती ढांचा एक हद टूटता भी नजर आता है लेकिन अखबारों के भीतर ये ढांचा अभी भी मौजूद है। यहां अभी भी जाति,लिंग,क्षेत्रीय स्तर के भेदभाव, विज्ञापन को लेकर राजनीति स्तर की चाटुकारिता चरम पर है। बाहुबलियों से गठजोड़ का मामला और उनके प्रति नरम दिल रखने का रिवाज बरकरार है। लिजलिजापन और कईयापन दमभर है। ये भले ही कुछ चमकीले शहरों में दिखाई न देता हो।