बिहार में तेज़ी से पनप रहा है तेलंगाना

लेखक: सुशांत झा  |  January 9, 2010  |  स्पेशल रिपोर्ट   |   17 Comments

नीतीश राज में 11 फीसदी विकास के डंके का शोर अब कर्कश लगने लगा है। कर्कश सिर्फ़ इसलिए नहीं कि राज्य और नेशनल मीडिया उसे करीने से छाप रहा है, कर्कश इसलिए कि इस विकास में ख़तरनाक किस्म की क्षेत्रीय असामनता के बीज छुपे हैं जिन्हें नीतीश सरकार पल्लवित करने में दिन-रात एक कर रही है।

नीतीश सरकार विकास के उसी मॉडल पर आगे बढ़ रही है जिस पर कभी चंद्रबाबू नायडू काम करते थे। पटना में बिहार का पूरा भ्रष्ट पैसा जमा हो गया है। कुछ आंकड़े आंखें खोल देने के लिए काफी है। पटना में एक फ्लैट की कीमत 25 लाख से लेकर 65 लाख रुपये तक पहुंच गई है जो दिल्ली-एनसीआर के बराबर है। पटना उन शहरों में शुमार हुआ है जहां से हवाई यात्रियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इंडिया टुडे के एक सर्वे के मुताबिक पटना में इंटरनेट की पहुंच (प्रतिव्यक्ति फीसदी में) दिल्ली से थोड़ी ही कम है! ये विकास की भयावह तस्वीर है, जो बताती है कि विकास कहां केंद्रित हो रहा है।

लेकिन जश्न के इन पलों के बीच एक औसत बिहारी जो चीज नहीं देख पा रहा वो ये कि बिहार में – गंगा से उत्तर और गंगा से दक्षिण – आर्थिक विषमता की बड़ी खाई पैदा की जा रही है जिसे जाने अनजाने नीतीश सरकार बढ़ावा दे रही है। ख़ासकर मिथिलांचल का इलाका इस विकास की दौड़ में अपने को असहाय पा रहा है। आप नीतीश सरकार के हाल की योजनाओं पर गौर कीजिए-आपको पता लग जाएगा कि नीतीश सरकार किस तरह अपनी सारी ताक़त मगध और भोजपुर के इलाकों में केंद्रित कर रही है।

नीतीश कुमार अक्सर छुट्टी मनाने राजगीर जाते हैं - तर्क दिया जाता है कि ऐसा करके नीतीश, इस पर्यटन स्थल को दुनिया की निगाहों में लाना चाहते हैं। नीतीश ने नालंदा विश्वविद्यालय, एनटीपीसी बाढ़ और नालंदा आयुद्ध कारखाना अपने कार्यकाल (केंद्र और राज्य दोनों के दौरान) में शुरू किए। हाल ही में राजगीर को नीतीश कुमार ने तकरीबन 100 करोड़ का पैकेज दिया साथ ही उनके द्वारा शहरों में जलजमाव से मुक्ति के लिए दिए गए पैकेज में पटना, गया, नालंदा और मुंगेर का नाम अहम है। नीतीश कुमार गया को फोकस कर रहे हैं – यूं ये काम ग़लत भी नहीं है। ये इलाके बिहार की पहचान हैं। लेकिन ये महज संयोग नहीं है, कि नीतीश का घर और उनका प्रभावक्षेत्र इन्हीं इलाकों में पड़ता है!

लेकिन यह प्रवृति ख़तरनाक रूप इसलिए लेती जा रही है कि सूबे का सबसे ज़्यादा आबादी वाला और दरिद्र इलाका मिथिलांचल नीतीश की आंखों से ओझल हो जाता है। नीतीश जब रेल मंत्री थे तो उस वक्त कोसी पर महासेतु बनाने की घोषणा की गई थी – वो योजना पहले लालू और अब ममता की फाइलों में छटपटा रही है – उस इलाके के लिए नीतीश ने शायद यही एक बड़ा काम किया था। मगर उस पर भी अमल नहीं हो सका।

मिथिलांचल की त्रासदी यह है कि यह बाढ़ वाले इलाके में पड़ता है जिसका निदान केंद्र और राज्य के सहयोग के बिना मुमकिन नहीं। पिछले साल कोसी की त्रासदी के बाद भी पटना और दिल्ली की सरकारों ने सिवाय जुबानी लड़ाई के इस मामले में कुछ नहीं किया। नीतीश के लिए ये सुकूनदेह बात है कि मामला केंद्र के जिम्मे हैं। उस इलाके को पिछले कई दशकों में एक मात्र बड़ा प्रोजेक्ट देने की जो घोषणा की गई है वो है अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी की एक शाखा। इस इलाके की एक मात्र जीवनदायिनी रेखा जो बनने वाली है वो है – स्वर्णिम चतुर्भुज राष्ट्रीय राजमार्ग योजना के तहत बनने वाली ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर…जो चार लेन की सड़क होगी। ये केंद्र सरकार का प्रोजेक्ट है।

ऐतिहासिक रुप से बिहार की राजनीति पर दबदबा रखनेवाला ये इलाका आज अपने अतीत के नेताओं को तो कोस ही रहा है, साथ ही मौजूदा प्रशासन में भी छला हुआ महसूस कर रहा है। घनघोर पिछड़ापन, विशाल भौगोलिक क्षेत्र और विराट आबादी के साथ ये इलाका बड़ी राजनैतिक संभावना बटोरे हुए है – इसमें शक़ नहीं। लेकिन ये मानने का मन नहीं करता कि नीतीश सरकार सिर्फ़ इसी ‘संभावित भय’ की वजह से इस इलाके के प्रति अपनी आंख मूंद रही है – खासकर तब जब सत्ताधारी पार्टी को यहां सबसे ज़्यादा समर्थन मिला है।

आप बदलते बिहार में निवेश के सुरक्षित ठिकाने खोजिए। जो ठिकाने पनपने  लगे हैं वो गंगा से दक्षिण हैं। सरकारी प्रोजेक्ट तो फिर भी मानवीय आधार पर बनाए जा सकते हैं, लेकिन निजी निवेश अपना माकूल जगह तलाशती है। वे सारी जगहें मगध या भोजपुरी इलाके (खासकर गंगा से दक्षिण का भोजपुरी इलाका) हैं। हाल ही में धान के भूसे से बिजली बनाने का प्रस्ताव गया के लिए आया है तो कोयला आधारित बिजली घर का प्रोजेक्ट औरंगाबाद के लिए।

सुशांत झा

सुशांत झा

नीतीश सरकार बिहार में केंद्रीकृति विकास को बढ़ावा दे रही है। सारा कुछ पटना या इसके इर्दगिर्द समेटा जा रहा है। चाहे वो एम्स हो… या आईआईटी… या फिर चंद्रगुप्त प्रवंधन संस्थान या फिर चाणक्या लॉ स्कूल। प्रस्तावित नालंदा विश्वविद्यालय भी इसी इलाके में है और नीतीश का प्रभाव क्षेत्र भी।

ऐसे में ये साफ़ है कि भावी बिहार में पिछड़ा हुआ मिथिलांचल एक नया “तेलंगाना” बनने वाला है। जिसे वर्तमान प्रशासन बड़ी बारीकी से आगे बढ़ा रही है। नीतीश सरकार, जाने-अनजाने बाढ़ की समस्या से उसी तरह मुंह मोड़ रही है जैसा पिछले 60 साल में तमाम सरकारों ने किया है। वो केंद्र से इस मसले पर कोई पंगा नहीं लेना चाहती।

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Comments

17 Responses to “बिहार में तेज़ी से पनप रहा है तेलंगाना”
  1. कोसी के प्रकोप से बचाव की योजना बनाए बिना खोखले विकास के दावों पर मुग्ध होना आत्मप्रवंचना से कम नहीं. इस पर विचार की ज़रूरत है, मीडिया को भी और सियासत को भी. अच्छा लिखा.

  2. सुन्दर व सार-गर्भित लेख………….यही लोग है जो भारत को छिन्न-भिन्न करने पर तुले हुए है।

  3. मुकुंद पांडे says:

    सुशांत जी, बिहार पर आपके लेख ने एक नई रोशनी दी है। हम सभी जानते हैं कि बिहार में प्रगति हो रही है। लेकिन उसे बढ़ा चढ़ा कर या फिर कहें की फर्जी तरीके से पेश किया जा रहा है। नीतीश का मीडिया मैनेजमेंट इतना बढ़िया है कि सारे मीडिया हाउस दलाल की भूमिका में आ गए हैं। िसलिए एक सुर में तारीफ पर तारीफ कर रहे हैं। आपने उन सभी पत्रकारों को बताया है कि रिपोर्टिंग वह नहीं जो दिखता है बल्कि वह है जो नहीं दिखता।

  4. सलीम says:

    बिहार में लोकतंत्र की हत्या हो रही है। सभी बड़े अख़बारों ने सरकार के आगे घुटने टेक दिए हैं। आप जैसे ही कुछ लोग हैं जो इक्का दुक्का ही सही कुछ ख़बरें दे देते हैं। वरना इन दिनों बिहार के अख़बारों को पढ़ने पर लगता है कि सरकार का कोई भोंपू पढ़ रहे हैं।
    इस लेख के लिए शुक्रिया।

  5. Sanjeev says:

    More astonishing fact is the media which protrays Nitish as the only last hope for Bihar revival .Time and again Mithilanchal has been ignored by the people in power…..Despite sucess of Bihar one cant ingnore the proximity of Mithilancal with Nepal (read as communist influence).Its better that this regime start some genuine interest in this region before its too late to repent.

  6. Ashish says:

    अरे…आपको मालूम नहीं है नीतीश उन्ही इलाकों का विकास कर रहे हैं जो कुर्मीयों और भूमिहारों का है। मिथिला तो वैसे भी यादवों और ब्राह्मणों का इलाका है-नितीश को उसने क्या मतलब। याद है न…जगन्नाथ मिश्रा के बेटे को क्यो साईडलाईन किया गया था! नीतीश नहीं चाहते कि उन इलाकों से कोई बड़ा नेता पैदा हो जो उनके लिए चुनौती बन जाए।

  7. सुशांत का आकलन ठीक है। कोसी क्षेत्र की हालत दिन पर दिन भयावह ही होती जा रही है। बाढ के अलावा राजनीतिक उपेक्षा भी इसके लिए जिम्‍मेदार रही है। वैसे, सुशांत के लेख के शीर्षक से लगता है कि वह इसे अलग राज्‍य बनाने के पक्ष में नहीं है। लेकिन मेरी समझ में व्‍यवहारिक निदान यही है कि वह इलाका ‘कोसी’ नाम से ही अलग राज्‍य बने। अब इसकी मांग होनी ही चाहिए।

  8. दिलीप मंडल says:

    कोसी अलग राज्य बनना चाहिए। इस क्षेत्र के बुद्धिजीवियों को तत्काल इस काम में जुटना चाहिए। इसकी पहल वही कर सकते हैं। वरना कोसी का बिहार में वही हाल होगा (बल्कि हो गया है)जो देश में बिहार का हो गया है। उत्तर भारत के बड़े शहरों में सबसे ज्यादा रिक्शा चालक कोसी और आसपास के जिले से आते हैं। इसे देश का सबसे दरिद्र इलाका होने और देश भर के लिए सस्ते मजदूर और नौकर सप्लाई करने का केंद्र बनने से बचाने की सख्त जरूरत है।

  9. @ आशीषजी, मेरे लेख का मकसद इस अनियमित विकास की जातीय व्याख्या करने का नहीं है-जहांतक ब्राह्मणों या य़ादवों के उत्तर बिहार या खासकर मिथिलांचल में ज्यादा घनत्व की बात है तो ये महज एक संयोग है और इन इलाकों में खासकर पूर्वोत्तर बिहार के इलाकों में अल्पसंख्यकों की भी खासी आबादी है जो उतनी ही गरीब है। जहांतक भूमिहारों या कूर्मियों की बात है तो वे भी गंगा से उत्तर खासी तादाद में है। विकास वैसे भी किसी एक जाति को प्रभावित नहीं करती-लेकिन अगर जाने या अनजाने कोई इलाका उपेक्षित हो रहा है तो ये चिंता की बात जरुर है। और जैसा कि संजीव ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि नेपाल की सीमा से लगे होने के कारण और वहां अव्यवस्था की हालत होने के कारण ये इलाका माओवादी आन्दोलन के असर में आने के लिए बिल्कुल उपयुक्त है-बहुत हदतक सही है।

    जहांतक प्रमोदरंजनजी का कहना है कि अलग राज्य की बात हो तो मैं अभी तक इस पर कोई खास राय नहीं बना पाया हूं-इसकी वजह ये भी है जो भी आन्दोलन चल रहे हैं उसमें सर्वांगीणता का अभाव दिखता है-ये आन्दोलन जातीय या वर्गीय हित को ज्यादा प्रदर्शित कर रहे हैं या इसके लिए चिंतित है। हां, इसकी कोई ठोस रुपरेखा हो, एजेंडा हो और मुकम्मल तरीके से रखने की बात हो तो कुछ कहा जा सकता है। हां, हालात अलग राज्य के लिए जरुर आधार मुहैया करा रहा है।

  10. राघवेंद्र त्रिपाठी says:

    विकास का जो भ्रमित चेहरा नीतीश सरकार पेश करती रही है, आपका ये लेख उसकी कलई खोल कर रख देता है। सत्यता यही है अभी बिहार के बहुत से ऐसे हिस्से हैं जो विकास के पहले ही शब्द से दूर हैं। अद्भुत…

  11. सुशांत जी,
    लेख बहुत अच्छा है…कुछ हद तक आपकी बातों से सहमत भी हूं। लेकिन एक बात तो है…. सच है कि नितीश कुमार कहीं न कहीं मिथलांचल को Ignore कर रहे हैं। लेकिन हमारे जगन्नाथ मिश्र नें ही हमारे लिए क्या किया….वो तो हमारे बीच से थे। कुछ साल पहले पिताजी ने डाक्टर साहब का पैर छूने के लिए कहा था….’बाबा हैं’…..घृणा इतनी थी कि मैंने नहीं किया…आख़िर उन्होंने ही हमारे लिए क्या किया…। मिथलांचल हमेशा से उपेक्षा की शिकार रही है। तो बात कहीं न कहीं नितीश के ignorance की नहीं हैं….समस्या बड़ी है…..आप कृप्या तेलंगाना से compare न करें…। जब वोट देने की बात होती है तो हम भी तो विकास की जगह जाती और क्षेत्र को प्राथमिकता दे देते हैं…।

  12. sushantji, kshetriya vishamta par aapane achha prakash daalaa hai. mithila kee andekhee pahle se hee chali aa rahi hai. is sambandh me maine apane blog—-ayachee.blogspot.com me jyaadaa prakash daalaa hai. dekhane kaa kast karen. ilake kee varvaadee aur avhelanaa kee tees kam se kam patrakaaron ko udwelit karnee hee chahiye.
    sanjay mishra.

  13. अरविंद शेष says:

    इस तरह से लिखने की शृंखलाबद्ध कोशिश होनी चाहिए। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के आंकड़ों को हथियार के रूप में जिस भांजा जा रहा है, उसकी हकीकत भी खोजने की कोशिश की जानी चाहिए। टाइम्स ऑफ इंडिया के एक पत्रकार राजकुमार ने अपने आकलन में पिछले चार साल में हुए अपहरण की संख्या महज 317 बताई है, जबकि सरकार विधान सभा में खुद यह स्वीकार कर चुकी है कि केवल 2008 में 902 अपहरण के मामले दर्ज किए गए। उसी दौरान सभी तरह के अपराधों के जो आंकड़े पेश किए थे, उसे बिहारी मीडिया अपने आकलन का आधार नहीं बनाता। क्यों…
    एक अखबार ने तो चारणगिरी की सारी हदें पार करते हुए आज के अंक में नीतीश कुमार के लिए लगभग चालीसा गा दिया है। दूसरों को करीब-करीब अंधा कहते हुए…
    नीतीश कुमार को जितना मुख्यमंत्री कहना चाहिए उससे ज्यादा मीडिया मैनेजर…
    हालांकि बार-बार उदयन शर्मा के उस लेख की याद आती है, जिसमें उन्होंने नीतीश कुमार, शरद यादव और जॉर्ज फर्नांडीज को भाजपा के लिए महज एक इस्तेमाल होने वाली चीज घोषित किया था। किस रूप में, इसका भी उल्लेख करता, अगर वह अंक मेरे पास उपलब्ध होता। मुझे वह शब्द पूरी तरह याद है। नीतीश कुमार, शरद यादव और जॉर्ज फर्नांडीज ने उससे अलग आचरण नहीं किया है, पिछले लगभग दस सालों में…

  14. mritunjay says:

    सुशांत सर,
    आपका लेख पढा. आपके लिखे किसी भी विचार को पढ़ने का यह मेरा संभवतः दूसरा मौका था. खैर, इस लेख में अपने विकासपुरुष के जिन परतों को उघारा है वो परतें काफी महीन थीं. बिहार में क्या कुछ हो रहा है सभी ये जानते हैं और कुछ जान कर भी नहीं जानने का उपक्रम करते हैं, बाढ़ के कारण बिहार का एक हिस्सा जिसे गार्डेन ऑफ़ बिहार कहते हैं हर साल तबाह होता है. आपका प्रश्न बिलकुल यथार्थ से सम्बद्ध है. और प्रासंगिक भी. हमारे ऐतिहासिक राज्य में सुशासन के तीन वर्षों के दौरान १५० लोग भूख की भेंट चढ़ गए. किसी भी मीडिया ने यह जहमत नहीं उठाई की इस बारे में कोई भी खबर एक कोलुम में भी छपे. सुन कर आप चौकियेगा जरुर . पर ये कटु सयता हमारे मीडिया का. चलिए आपने कुछ तो शुरू किया बहरहाल आगे भी इस छद्म विकास की परत दर पर आप खोलेंगे ऐसी उमीद है.

  15. सुशान्त जी क्या देश को कई टुकड़े में देखना चाहते है, अभी तो भाषाई, धर्म और जाति के अधार पर या व्यक्तिगत कथित मसीहागिरी के आधार पर नेता इस देश को बांट रहे है……किन्तु कल यही आवाज़े देश को राजनैतिक तौर पर हमारे संघ से अलग होने की मांग करने लगे तब……..

  16. Avinash says:

    sushant je , Apka kehna sahi hai ki Nitish ek alag tarah ke vikash ki bat kar rahe hai aur ispar amal bhi kar rahe hai ?
    Par kisi bhi rajya ka vikas kisi ek chetra ke vikas se nahi hota . Jab aap samaj me ate hai to apko sarvangin vikas ki bat sochni hogi….

  17. RAMAN YADAV says:

    IS LEKH SE UN LOGON KI AANKHEN KHUL JANI CHAHIYE JO MITHILA RAJYA KA VIRODH KARTE HAI.
    MITHIL RAJYA (BHASAI, sanskritik tatha Vikas teeno aadharon se banne yogya hai)

    Mithila Rajya ka nirman jald ho,
    Kyonki badh se hame bachane Koi nahi aata hai.