ये सिस्टम ही सबसे बड़ा इडियट है
लेखक: प्रभात शुंगलू | January 6, 2010 | देश-दुनिया, ब्लॉग | 5 Comments
फिल्म 3 इडियट्स में स्वानंद किरकिरे का ये गीत हमारे बचपन की याद ताजा कर देता है।
कंधों को किताबों के बोझ ने झुकाया
रिश्वत देना खुद पापा ने सिखाया
99 परसेन्ट मार्क्स लाओगे तो घड़ी
वर्ना छड़ी
बचपन में तो हमें पता भी नहीं लग पाया कि रिश्वत के कितने रूप होते हैं। जो हम नहीं पूछ पाए आज के नौजवान ज़रूर पूछते होंगे। मुंबई के तीन अलग-अलग इलाकों में रहने वाली नेहा सावंत, भजनप्रीत और सुशांत ने भी खुदकुशी करने से पहले अपने मां-पापा से जरूर पूछा होगा कि पढ़ाई में अच्छे नंबर नहीं आए तो क्या वो उन्हें अपनी बेटी या बेटा मानना छोड़ देंगे। तो क्या आप मेरा तिरस्कार कर देंगे। इनके अभिभावक अपने बच्चों को शायद तर्कसंगत जवाब नहीं दे पाए। मां-पापा उनका तिरस्कार करते इससे पहले बच्चों ने ही ज़िंदगी का तिरस्कार कर दिया।
इब्राहिम लिंकन, एल्बर्ट आइन्सटाइन, बेन्जामिन फ्रैंकलिन, वॉल्ट डिजनी, थॉमस एडिसन, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ। इन महान विभूतियों में एक समानता थी। और वो ये कि ये सभी स्कूली शिक्षा से महरूम रहे। या तो पूरी नहीं कर पाए या उसका अवसर नहीं मिला। जो शिक्षा मिली वो घर में। ज़िंदगी ही इनकी शिक्षक बन गयी। और फिर इन्होंने ज़िंदगी में वो मुकाम हासिल किया कि इनके कारनामें दुनिया को रौशन कर गए। लेकिन वो शायद कोई और दौर रहा होगा। जब किताबी पढ़ाई का महत्व था पर ज़िंदगी की क्लासरूम में ली गयी शिक्षा को भी बराबर की तरजीह दी जाती थी। आज के एज्युकेशन सिस्टम में दूसरे ऑप्शन पर क्रॉस लगा हुआ है।
क्रॉस का ये निशान बच्चे देर से देखते हैं अभिभावक जल्दी समझ लेते हैं। दरअसल अभिभावक भी अपने दर्द और डर को अपने भीतर ही छिपाए रहते हैं। उन्हें ये डर रहता है कि बच्चे पढ़ेंगे-लिखेंगे नहीं तो इन्हें नौकरी कौन देगा। ये अपने पैरों पर खड़े कैसे होंगे। क्योंकि जब ये बड़े होंगे और समाज में निकलेंगे तो यही समाज बच्चों के साथ-साथ इनके मां-बाप को भी कटघरें में खड़ा करेगा। ये अभिभावक दीमक लगे ऐसे सिस्टम के विक्टिम हैं जो इन्हें जीने के दूसरे ऑप्शन नहीं देता। ये सिस्टम अजगर सी पकड़ रखता है। जो इसकी गिरफ़्त में आता है उसका दम घुट कर मरना तय है।
ग्यारह साल की नेहा सावंत को डांस से काफी लगाव था। वो टीवी के रियेल्टी शो में भी अपनी प्रतिभा का हुनर दिखा चुकी थी। फिर अचानक उसके मां-पापा को लगा कि नेहा की पढ़ाई पर असर पढ़ रहा इसलिए डांस एकेडमी से उसका दाखिला कटवा दिया। नेहा अपने अभिभावक की ये बेरूखी बर्दाश्त नहीं कर पायी और उस मासूम नें पंखे से लटक कर अपनी जान दे दी। अब सवाल ये है कि पढ़ाई पर इतना ही ज़ोर था तो बेटी को इस कच्ची उम्र में रियेल्टी शो के लिए क्यों तैयार किया। नेहा ने तो जिद नहीं की होगी कि उसे बूगी-वूगी में हिस्सा लेना है। बेटी के हुनर पर परजीवी बनकर वाहवाही लूटने की तमन्ना तो उसके मां-बाप की होगी। और फिर जब बेटी का हुनर सारा जमाना मान रहा है तो उसे अचानक दूसरी तरफ मोड़ देना तो वही बात हुई कि प्यासे को पानी के लिए तड़पाना।
रही सही कसर ऐसे सरकारी संस्थान पूरी कर देते हैं जिन्हे बच्चों के बचपन को महफूज रखने के लिए ही बनाया गया था। नेश्नल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स की संध्या बजाज का बयान आया कि टीवी एक्सपोजर की खातिर एज्युकेशन से कॉम्प्रोमाइज नहीं किया जा सकता।
लिख लिख कर पढ़ा
पर अल्फा, बीटा, गामा का चला
कॉन्सेन्ट्रेटड H2SO4 ने
पूरा बचपन जला डाला
आज नंबर नहीं ग्रेडिंग सिस्टम की वकालत हो रही। अगले एकेडमिक सेशन से ग्रेडिंग सिस्टम सीबीएसई सिलेबेस फॉलो करने वाले देश के हर स्कूल में लागू हो जाएगा। लेकिन ये तो हाईस्कूल के लेवेल पर होगा। इंटर में फिर वही कमीने नंबर अपना गदर ढाहेंगे। वही तय करेंगे कि बच्चे को अच्छे कॉलेज में दाखिला मिलेगा की नहीं। उसे वो सब्जेक्ट मिलेंगे या नहीं जिसमें उसकी सबसे ज्यादा रूचि है। उस छात्र की दूसरे हुनर को तवज्जो दी जाएगी या नहीं। क्या नेहा सावंत को पांच साल बाद कम नंबरों के बावजूद मुंबई के किसी नामी-गिरामी कॉलेज में इसलिए दाखिला मिल जाता कि वो अव्वल दर्जे की नृत्यांगना है? असंभव। नेहा ने यहां भी बाज़ी मार ली। उसने भी असंभव सा ही कुछ कर डाला।
अमेरिका में डाक्टरी कोर्स में दाखिला पाते समय उस छात्र के दूसरे गुणों को भी खास तवज्जों दी जाती है। अगर उस छात्र में समाज सेवा में अपना कुछ योगदान दिया हो तो ये उसकी खासियत मानते हुए डाक्टरी में दाखिले का आधार बनती है। लेकिन हिंदुस्तान में कोई छात्र समाज सेवा करके नेता तो बन सकता है अच्छे कॉलेज में दाखिला नहीं पा सकता। मेहनत, किस्मत और पैसे के दम पर इंजीनियर और डॉक्टर फिर भी बन सकता है पर अच्छा इंसान बन जाए, ये सिस्टम इसकी कोई गारंटी नहीं लेता। और फिर फेल होना तो सबसे बड़ा कलंक माना जाता है। नाज़ी कैंप में यहूदियों को मार कर हिटलर ने और हिरोशिमा, नागासाकी पर एटम बम गिराकर अमेरिका ने जो पाप किया उससे भी बड़ा कलंक। और कच्ची उम्र में छात्रों को इस ‘कलंक’ से निजात पाने का एकमात्र तरीका खुदकुशी दिखती है।
गिव मी सम सनशाइन
गिव मी सम रेन
गिव मी अनदर चांस
आई वॉन्ना ग्रो अप वन्स अगेन..!

प्रभात शुंगलू
((वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू IBN 7 में एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं))
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प्रभात बधाई, तुम्हारी पोस्ट अच्छीं जा रही हैं
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Rahul Kumar Singh,mobile 9852302996,my blog is http://www.nitishkrekyugpurush.blogspot.com
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Congratulation for your precious post.
बेहतरीन लेख