क्या मीडिया का एक धड़ा एन डी तिवारी का चेला है?

आंध्र प्रदेश में पोल सिर्फ नारायण दत्त तिवारी की ही नहीं खुली बल्कि मीडिया ने भी अपना बहुत कुछ गंवा दिया है। इस मामले में कुछ मीडिया संस्थानों ने जिस तरह की रिपोर्टिंग की है उससे एक बार फिर साफ हुआ है कि अगर किसी के पास ताक़त है और जातिगत औरा है तो बड़े से बड़े अपराध और घिनौने मामले में भी उसके पक्ष में माहौल तैयार किया जा सकता है। यही नहीं ऐसा माहौल भी बनाया जा सकता है कि जिससे उस ताक़तवर शख़्स के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले शख़्स या संस्था को उस दुस्साहस की क़ीमत चुकानी पड़े।

बीते कुछ दिनों से आंध्र प्रदेश के स्थानीय चैनल एबीएन न्यूज़ के ख़िलाफ़ एक धड़ा माहौल बनाने में जुटा है। एबीएन न्यूज़ ने ही स्टिंग को प्रसारित करके तिवारी की पोल खोली थी। लोगों को बताया था कि किस तरह राजभवन में रासलीला चल रही है। यह स्टिंग सही है या ग़लत इसका फ़ैसला अदालत में होगा। लेकिन उस फैसले से पहले ही ज़ी नेटवर्क के निदेशक और इंडियन ब्रॉडकास्टर फेडरेशन के अध्यक्ष जवाहर गोयल ने मांग की है कि तेलुगु न्यूज़ चैनल का लाइसेंस रद्द कर दिया जाना चाहिए। जवाहर गोयल का अपना चैनल कई घरों में सेंध लगा चुका है। कई स्टिंग ऑपरेशन कर चुका है। कई लोगों के बेडरूम तक में दाखिल हो चुका है। चूंकि वो सभी आम लोग थे और उनकी हैसियत एन डी तिवारी जितनी नहीं थी इसलिए न तो तब ज़ी न्यूज़ की नैतिकता जागी और ना ही जवाहर गोयल की। लेकिन एन डी तिवारी मामले में एक दूसरे चैनल के ख़िलाफ़ बोलने का नैतिक बल जरूर आ गया।

नई दुनिया (26 दिसंबर)

नई दुनिया (26 दिसंबर)

यहां जवाहर गोयल से यह भी पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने यह कैसे जान लिया है कि जिस तरीके से स्टिंग किया गया है वह सही नहीं है। और यह भी कि आखिर किस तरह से स्टिंग किया जाना चाहिए? कुछ पत्रकार स्टिंग के नियम बताने में जुटे हैं। उनके मुताबिक जिसके ख़िलाफ़ स्टिंग किया गया है उसके प्रसारण से पहले उससे बात की जानी चाहिए। इनमें से एक बड़े नैतिक चैनल के बड़े पत्रकार हैं। ये वही चैनल है जिसके पास अमर सिंह की सीडी थी। मगर उसे प्रसारित नहीं किया गया, बल्कि अमर सिंह को बता कर पूरा मौका दिया गया ताकि वह सुप्रीम कोर्ट से स्टे ले सकें। हुआ भी यही अमर सिंह ने स्टे ले लिया और सीडी में दर्ज़ साज़िश से पर्दा नहीं उठ सका।

बात सिर्फ़ तथाकथित नैतिक चैनल और ज़ी नेटवर्क की नहीं है। अख़बारों का भी यही हाल है। इसमें सबसे ज़्यादा बेशर्मी नई दुनिया ने की है। एन डी तिवारी से जुड़ा स्टिंग ऑपरेशन तेलुगु चैनल ने 25 दिसंबर को प्रसारित किया। कायदे से अगले दिन यानी 26 दिसंबर को यह ख़बर पहले पन्ने पर छापी जानी चाहिए थी। लेकिन नई दुनिया ने अपने पाठकों को धोखा देते हुए यह ख़बर सातवें पन्ने पर छापी। वह भी सिंगल कॉलम में। कमजोर हेडलाइन के साथ। जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।

26 दिसंबर को ही इस सेक्स स्कैंडल में नारायण दत्त तिवारी को इस्तीफा देना पड़ा। उसके बाद 27 दिसंबर को नई दुनिया ने यह ख़बर पहले पन्ने पर छापी। मगर उसके साथ पहले पन्ने पर ही तीन ख़बरें और भी थीं। पहली, जी नेटवर्क के निदेशक जवाहर गोयल की मांग। जिसमें उन्होंने सेक्स स्कैंडल से जुड़े स्टिंग को प्रसारित करने वाले चैनल का लाइसेंस रद्द करने को कहा है। दूसरी ख़बर में विशेषज्ञों के हवाले से यह बताने की कोशिश की गई कि आपकी भी सीडी बनाई जा सकती है। मतलब एन डी तिवारी की सीडी फर्जी है। अगर नहीं है तो भी इसकी सत्यतता पर सवाल खड़े कर दिए गए। भ्रामक स्थिति पैदा कर दी गई। पाठकों को उलझा दिया गया। और तीसरी ख़बर उनके स्टार रिपोर्ट विनोद अग्निहोत्री की है। इसमें उन्होंने बताया है कि किस तरह से खुफिया एजेंसियां इस मामले की जांच में जुट गई हैं। उसी दिन नई दुनिया ने पांचवे पन्ने पर बताया है कि कैसे संजय जोशी की अश्लील सीडी भी फर्जी साबित हुई थी। इन ख़बरों के जरिए अख़बार की लाइन साफ़ है कि एन डी तिवारी की सीडी दिखा कर तेलुगु चैनल ने बहुत बड़ा गुनाह किया है और उसे इसकी सज़ा हर हाल में मिलनी चाहिए।

नई दुनिया (27 दिसंबर)

नई दुनिया (27 दिसंबर)


28 दिसंबर को नई दुनिया में स्टार रिपोर्टर विनोद अग्निहोत्री की एक और एक्सक्लुसिव ख़बर छापी गई। बताया गया कि एन डी तिवारी के सेक्स स्कैंडल से जुड़ी सीडी बनवाने में आंध्र प्रदेश के सत्ता संघर्ष का हाथ हैं। कांग्रेस के ही एक विरोधी धड़े ने एन डी तिवारी की सीडी बनवा दी। यह भी बताया गया है कि इस पूरी साज़िश में तिवारी के ही कुछ स्वार्थी करीबी शामिल हैं। वो राज्य में खदानों की लीज पाने के लिए तिवारी पर दबाव डाल रहे थे। करोड़ों की काली कमाई करना चाहते थे, लेकिन तिवारी नहीं माने तो उन्हें फंसा दिया।

28 दिसंबर को ही नई दुनिया में एक संपादकीय भी छपा। उस संपादकीय का भी लहजा ऐसा था जैसे वो एन डी तिवारी की वकालत कर रहे हों।

29 दिसंबर को नई दुनिया के पहले पन्ने पर ख़बर छपी। जिसका हेडर था – आरोप बेबुनियाद, संन्यास का कोई इरादा नहीं। हेडर से जाहिर है कि यह एन डी तिवारी के बयान पर आधारित रिपोर्ट थी। और इसमें बयान से इतर कुछ नहीं था।

नई दुनिया (28 दिसंबर)

नई दुनिया (28 दिसंबर)

30 दिसंबर को नई दुनिया ने संत एन डी तिवारी का बयान छापा। हेडर दिया – मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं… सब हेडर – देहरादून में रह कर रचनात्मक कार्यों में योदगान देंगे । ये तमाम बयान और इन बयानों की प्रस्तुति भी बहुत कुछ साफ कर देती है।

यह सही है कि जांच होने से पहले तेलुगु टैनल के स्टिंग ऑपरेशन को पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता और कुछ सवाल तो उठाए ही जा सकते हैं। लेकिन इस स्टिंग ऑपरेशन पर सिर्फ़ और सिर्फ़ सवाल उठाए जाएं और आरोपी एन डी तिवारी के समर्थन में एकतरफा ख़बरें प्रकाशित की जाएं तो ऐसा करने वाले मीडिया संस्थान की नीयत पर भी संदेह होना लाजिमी है। नई दुनिया की भी नीयत पर भी अब सवाल उठने लगे हैं।

नई दुनिया (30 दिसंबर)

नई दुनिया (30 दिसंबर)

… ((जारी))

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Comments

2 Responses to “क्या मीडिया का एक धड़ा एन डी तिवारी का चेला है?”
  1. सुशांत झा says:

    तिवारी अगर सही होते तो अबतक कांग्रेस, उस चैनल और उसके मालिकानों की गर्दन नाप चुकी होती। सिर्फ कांग्रेस ही क्यों सारी पार्टियां मिलकर चैनल के खिलाफ मुहिम छेड़ देते-आखिर हर जगह तो तिवारी जैसे लोग ही हैं।

  2. SUNILPARBHAKAR says:

    tiwari g nirdosh hai ya doshi yae faisla to adalat keregi. lakin jis beshrmi sae kuch media or web sites nae ik tarfa news parkashit ki hai unsey unka cheHra to janta ki adalat mae benakab ho HI GYA.
    SHUKAR HAI JAN TANTAR HAI AAB SAE DAILY JAN TANTAR PADA KARUNGA