राठौर आदरणीय क्यों? मीडिया के भाषाई संस्कार पर सवाल

लेखक: दिलीप मंडल  |  December 24, 2009  |  स्पेशल रिपोर्ट   |   18 Comments

रुचिका के साथ छेड़खानी और उसकी आत्महत्या के मामले में भारतीय न्यायव्यवस्था ने कुछ नया या अजूबा नहीं किया है। न्यायप्रक्रिया में धन और रुतबे के महत्व के बारे में ये केस कोई नई बात नहीं कहता। देश के राष्ट्रपति रहे के आर नारायणन ने जब ये कहा था कि आजादी के बाद जिन लोगों को फांसी की सजा हुई है उनमें से कोई भी अमीर नहीं था, तो वो इसी सच को उद्धाटित कर रहे थे। हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी.एस. राठौर के साथ जो होने वाला है उसका अंदाजा हम इस मुकदमे की सुस्त रफ्तार से लगा सकते हैं। 19 साल में ये केस स्थानीय न्यायालय की सीमा को ही पार कर पाया है। इस रफ्तार से केस चला तो राठौर को जीवन का एक भी दिन शायद ही जेल में काटना होगा।

न्यायपालिका की सुस्त रफ्तार पर खुद सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन ने स्पष्ट शब्दों में चेताया है कि लम्बित मुकदमों का जल्द निपटारा करने के लिए कदम नहीं उठाए गए, तो लोग विद्रोह कर देंगे। इससे न्यायिक ढांचा ध्वस्त हो जाएगा। जाहिर है न्यायपालिका को इस बात का एहसास है कि मुकदमों में देरी एक बड़ी समस्या है। लेकिन आपका ध्यान हम एक और तथ्य की ओर दिलाना चाहता है, जिसका संबंध मीडिया, बल्कि मीडिया की भाषा और उसके चरित्र से है।

आप कृपया नीचे दिए गए कुछ उदाहरणों को देखें। इस लिस्ट को आप और फैला सकते हैं। ये चंद सैंपल हैं।

  • राठौड़ अब सीबीआई अदालत के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं। जोश 18
  • हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी.एस. राठौर को 19 साल पहले एक किशोरी के यौन उत्पीड़न के मामले में सोमवार को दोषी करार दिया गया और एक स्थानीय अदालत ने उन्हें छह महीने के सश्रम कारावास की सजा सुनायी. सीबीआई के विशेष न्यायाधीश जे.एस. सिद्धू ने दोषी पर एक हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया, जिसका भुगतान नहीं होने पर उन्हें एक महीने का कड़ा कारावास और भुगतना होगा. आज तक
  • सज़ा सुनाए जाने के दौरान राठौड़ कोर्ट में मौजूद नहीं थे. उन्होंने दिल के आपरेशन का हवाला देते हुए कोर्ट में उपस्थित नहीं होने की अर्ज़ी दी थी. that’s Hindi
  • चंडीगढ़. टेनिस खिलाड़ी रुचिका के यौन शोषण मामले में सोमवार दोपहर साढ़े चार बजे जिला अदालत की स्पेशल कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया। स्पेशल सीबीआई जज ने इस केस में हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर को दोषी करार देते हुए उसे छह माह की कैद और एक हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना अदा न करने की शर्त पर सजा एक माह बढ़ाने के लिए भी जज ने कहा। हालांकि सजा सुनाने के बाद कोर्ट ने उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया। अब कोर्ट के इस फैसले को पूर्व डीजीपी राठौर हाईकोर्ट में चुनौती देंगे। जिस समय कोर्ट ने यह फैसला सुनाया, उस दौरान पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर कोर्ट रूम में मौजूद थे। उनके साथ उनकी पत्नी व उनकी तरफ केस लड़ रही एडवोकेट आभा राठौर भी उपस्थित थीं। दैनिक भास्कर
  • हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी.एस.राठौर को 19 साल पहले एक किशोरी के यौन उत्पीड़न के मामले में सोमवार को दोषी करार दिया गया और एक स्थानीय अदालत ने उन्हें छह महीने के सश्रम कारावास की सजा सुनाई तथा एक हजार रुपए का जुर्माना लगाया। सीबीआई के विशेष न्यायाधीश जे.एस.सिद्धू ने कहा कि जुर्माने का भुगतान नहीं होने पर उन्हें एक महीने का कड़ा कारावास और भुगतना… वेब दुनिया
  • 19 साल बाद हुए इस इंसाफ में राठौर सस्ते में छूट गए। सोमवार को एक लोकल कोर्ट ने उन्हें छह महीने के सश्रम कारावास की सजा सुनाई और एक हजार रुपये का मामूली जुर्माना भी लगाया, जिसका भुगतान नहीं होने पर उन्हें एक महीने का कड़ा कारावास और भुगतना होगा। नवभारत टाइम्स
  • हरियाणा में 1990 में काफी चर्चित हुए रुचिका गिरहोत्रा बदसलूकी मामले में सोमवार को सीबीआई कोर्ट ने अपने फैसले में हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़ को महज छह महीने की सजा सुनाई है। उन पर एक हजार रुपये का जुर्माना भी किया गया है। एनडीटीवी खबर
  • मामला 1990 का है। तब पूर्व डीजीपी राठौर आईजी हुआ करते थे। आईबीएन खबर
  • चंडीगढ़। पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़ ने इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील दायर करेंगे। राठौड़ के मुताबिक उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। उनकी लड़ाई जारी रहेगी वह सुप्रीम कोर्ट भी जा सकते हैं। राठौड़ का यह भी कहना था कि बीस वर्ष एक लंबा समय है, इसके लिए उन्होंने अपनी पत्‍‌नी को यह कह कर धन्यवाद दिया गया जिनकी वजह से यह मामला जल्दी निपट गया। दैनिक जागरण

आप पाएंगे कि मीडिया ने लगभग आम राय से राठौर के के लिए आदरसूचक सर्वनाम और क्रियापदों का इस्तेमाल किया है। कोई कह सकता है कि ये जानबूझकर नहीं हुआ है। अगर ये जानबूझकर नहीं किया गया है और शायद ये सच भी है तो ये ज्यादा खतरनाक है। राठौर को हम स्वभाव से या आदत से मजबूर होकर आदर दे रहे हैं। क्या ये स्वभाव और चरित्र मीडियाकर्मियों का है या ये मीडिया के ही चरित्र से जुड़ी बात है? ऐसा तो नहीं है कि सजा पाने के बाद भी राठौर को आदर देना इतना स्वाभाविक है कि इस पर सवाल भी नहीं उठते।

राठौर मामले में मीडिया का रुख आम तौर पर पीड़ित के पक्ष में रहा है और राठौर को लेकर मीडिया में कोई सहानुभूति नहीं है। इसके बावजूद मीडिया के अवचेतन में ऐसा क्या है जो उसे राठौर के लिए आदर की भाषा लिखने बोलने को मजबूर कर रहा है। राठौर के लिए उसे, उसने, है, था, उसकी यानी बिना आदर का भाव लाए शब्दों का इस्तेमाल करने से हमें कौन रोकता है?

ऐसे मामलों में अगर आरोपी प्रभावशाली या अमीर न हो तो मीडिया चार्जशीट या एफआईआर का इंतजार किए बगैर सारी मीमांसा खुद ही कर देने और फैसला सुना देने के लिए कुख्यात रहा है। निठारी केस में (चार्जशीट दाखिल होने से पहले भी) कोली के बारे में लिखी गई भाषा को याद कीजिए और उसकी तुलना राठौर के लिए की गई भाषा से कीजिए। चोरी के आरोप में पकड़े गए नौकरों के लिए केस दर्ज होने के दिन इस्तेमाल की गई भाषा की तुलना राठौर के लिए इस्तेमाल की गई भाषा से कीजिए, जिसके बारे में एक अदालत फैसला सुना चुकी है। बिना रसूख वाले आरोपियों के लिए मीडिया कितनी आसानी से वहशी दरिंदा, खूनी, बलात्कारी, खूंखार, कातिल जैसे भारी भरकम शब्दों का इस्तेमाल करता है। क्या इसलिए कि ऐसे लोग मानहानि का मुकदमा नहीं दायर कर सकते हैं? जबकि राठौर ऐसा कर सकता है। क्या कॉमन मैन आदर का हकदार नहीं है? या फिर मीडिया के भाषाई संस्कार एलीट की ओर झुके हुए हैं और जाने-अनजाने में मीडियाकर्मी इसी बात के शिकार बन जाते हैं।

इस मामले में न्यायपालिका पर आरोप लगाने के साथ ही (इन आरोपों में तथ्य है) मीडिया को आत्मालोचना भी करनी चाहिए। कहते हैं ना अपने गिरेबां में झांककर देखो। प्रभावशाली लोगों के साथ मीडिया भी शायद वैसा ही बर्ताव कर रहा है जिसका आरोप मीडिया न्यायपालिका पर लगा रहा है।

(मुझे जो अखबार नेट पर मिले, उनमें सिर्फ दैनिक भास्कर ने राठौर के लिए उसे शब्द का इस्तेमाल किया है। लेकिन उसी समाचार में आगे चलकर राठौर उन्हें बन जाते हैं। फिर भी भास्कर को बधाई। ऐसा कोई और उदाहरण आपकी नजरों से गुजरा हो तो आप उसे कृपया जरूर शेयर करें।)

((वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल  इन दिनों  आईआईएमसी में पढ़ा रहे हैं।))

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Comments

18 Responses to “राठौर आदरणीय क्यों? मीडिया के भाषाई संस्कार पर सवाल”
  1. ajit anjum says:

    दिलीप जी , आप जो कह रहे हैं उससे मैं पूरी तरह असहमत होने का जोखिम मोल लेते हुए अपनी बात रख रहा हूं . रूचिक के मामले में मीडिया ने पूरी जिम्मेदारी से खबरें छापी है और दिखाई है . आप जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल न करने पर शोक वयक्त कर रहे हैं , उस भाषा के लिए आप जैसे सुधि चिंतकों ने ही कभी मीडिया की निंदा की थी .मीडिया को कठघरे में खड़ा किया गया था . आपके हिसाब से इस मामले में राठौर के लिए तू तड़ाक की भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया , इसी पर आपको एतराज है . अब सवाल उठता है कि क्या तू तड़ाक की भाषा का इस्तेमाल किए बगैर राठौर की पोल नहीं खोली गई . राठौर की करतूतों का कच्चा चिट्ठा आज के अखबारों में भी है और चनलों पर भी . जैसे आप राठौर के प्रति नरमी वरतने की कुछ मिसालें दे रहे हैं , उसी तरह सैकड़ों उदाहरण मैं बता सकता हूं कि मीडिया ने कैसे राठौर को नंगा किया है .लेकिन समस्या ये है कि आप मीडिया को एक ही चश्मे से देखना चाहते हैं . वो ये कि मीडिया ने कहां -कहां नरमी वरती . अरे भाई साहब आपने या तो सभी न्यूज चैनल नहीं देखे या सभी अखबार नहीं पढ़े . पढ़े तो सिर्फ इसलिए ताकि मीडिया की खामियां और नरमी खोजने के लिए कुछ नमूने तलाशने के लिए .
    पहली बात तो ये कि जिस दिन ये फैसला आया , उस दिन पूरी तरह खबर सामने नहीं आई थी . देर शाम होते होते या कहें अगले दिन पूरा मामला बैकग्राउंड के साथ सामने आया और लगातार नई जानकारियां आती जा रही हैं. अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि जिस दिन फैसला आया , उसी दिन देश के सभी अखबारों और चैनलों के न्यूज रूम में एक मीटिंग होती और एलान होता कि आज वो वक्त आ गया है जब एक डीजीपी हमारे जाल में फंसा और हम सबको मिलकर उसकी मां बहन करनी है . जो बोले सो निहाल का जयकारा लगाकर सभी मिडिया वाले उसकी ऐसी तैसी करने लगने . इस दरिंदे डीजीपी की खाल उतार लो टाइप की खबरें देने लगते . अगले दिन के अखबारों को देखिए तो आपको कवरेज में फर्क नजर आएगा . मेल टुडे से लेकर टाइम्स और एक्सप्रेस तक में औऱ न्यूज चैनलों तक में . तू तड़ाक की भाषा के बगैर किसी ने एक हाल नहीं छोड़ा राठौर का . टाइम्स नाऊ के कवरेज के लिए अरनव को वाकई सैल्यूट करना चाहिए . पहले ही दिन न्यूज आवर में अरनव ने डीजीपी की चमड़ी उधेड़ दी थी . न्यूज चैनल्स ने भी हंसते हुए राठौर की तस्वीरों को मुद्दा बनाकर उसकी जितनी खिंचाई कर सकते थी , उतनी की .
    चार दिन से रूचिका मीडिया में छायी है . मीडिया ने राठौर को बख्शा नहीं है . आज के एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया को देख लीजिए . कुछ अखबारों में अगर बहुत उग्र तेवर नहीं दिखाए तो इसका मतलब ये नहीं हुआ कि मीडिया ने राठौर के प्रति नरमी वरती . मुझे लगता है कि अगर मीडिया ने इतना कवरेज नहीं दिया होता तो आपको और पूरे देश को पता भी नहीं चलता कि पूरा मामला है क्या . समस्या ये है कि आप जैसे चिंतक और मीडिया आलोचक सिर्फ आलोचना करने के लिए मीडिया पर नजर रखते हैं . अगर कभी खुले दिमाग से कुछ अच्छे काम का जिक्र हो ताकि कुछ हौसला भी बढ़े . आप चंद उदाहरण देकर पूरी मीडिया को उस पैमाने पर कसने लगते हैं . मीडिया में हजार खामियां हैं लेकिन रुचिका के मामले में कुछ शाबासी भी दी जानी चाहिए .

  2. ajit anjum says:

    मीडिया आलोचक दरअसल चित्त भी मेरी पट भी मेरी की तर्ज पर काम करते हैं . अगर किसी मामले में तू -तूड़ाक की भाषा का इस्तेमाल हुआ तो कहेंगे गलत हुआ . अगर नहीं हुआ तो कहेंगे राठौर को तू तड़ाक क्यों नहीं किया . दिलीप मंडल मेरे पुराने दोस्त हैं . संजीदा किस्म के पत्रकार हैं लेकिन उनके विचारों से साफ लग रहा है कि उन्होंने तय कर लिया है कि रूचिका के मामले में मीडिया की खामियां खोजकर सामने रखेंगे .रखिए , लेकिन
    पूर्वग्रह से ग्रस्त होकर नहीं . पता नहीं दिलीप जी ने रूचिका की खबरों को टीवी पर कितना देखा है , अगर देखा है तो मुझे ताज्जुब है कि उन्हें तेवर क्यों नहीं दिखे . अगर नहीं देखा है तो आज से भी देखना शुरू करें .

  3. ajit anjum says:

    समरेन्द्र , इस मुद्दे पर किसी को बहस करनी हो तो अपने नाम के साथ करे . तथागत , कबीर , आम आदमी , प्रथम पुरूष , चितिंत आत्मा , परेशान आत्मा , भूतनाथ बगैरह बनकर नहीं . बहस गुमनामों से नहीं हो सकती . अनामी से बहस नहीं हो सकती . मैं सिर्फ रूचिका के मामले में बात कर रहा हूं . इस मुद्दे पर मैं मीडिया का पक्ष किसी बहसबाज और तर्कशास्त्री के सामने रखने को तैयार हूं .

  4. braj mohan says:

    मुझे लगता है कि बिना गाली दिए भी आप अपनी बात को उसी मजबूती के साथ कह सकते हैं और उसका असर भी होगा….


    braj mohan

  5. aam admi says:

    ajit anjum ji,

    bahas ke liye mudda jaroori hai ya mudde par baat karne wale ka naam. agar koi kabir ya xyz tarkik baat kahta hai to uski baat kyon nahin suni jaani chahiye?kya kisi tarkik baat ko sirf isliye kharij kar dena chahiye ki kisi benami ne yah baat kahi hai?

    yah sahi hai ki media me Rathod ka mudda abhi garam hai. media ka yahi asli kaam hai aur use hamesha isi tewar me rahna chahiye. lekin kya yah sach nahin hai ki paise aur rasukh wale aadmi ke samne media se lekar vyavastha ka har ang sahme hue lahje me rahta hai? kya democracy, jiska jaap hum hardum karte rahte hain, is attitude ke rahte sahi disha me jaa sakta hai?

    ke baat aur, aap jaise senior patrakar jab “अनामी से बहस नहीं हो सकती” type bhasha bolte hain to behad nirasha hoti hai.

  6. ajit anjum says:

    आखिर वही हुआ , जिसका मुझे अंदेशा था . आम आदमी सामने आ गए हैं . पता नहीं आम आदमी के चोले के पीछे जो खास आदमी हैं , उन्हें कैसे संबोधित करूं , लेकिन बहस कभी निराकार से नहीं होती . निराकार से बहस का कोई अर्थ नहीं रह जाता . आम आदमी के रुप में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले भाई साहब ,मेरे कहने का सिर्फ ये मतलब था कि कई बार अनामी बनकर आदमी बहस को भड़ास में तब्दील कर देता है . दुनिया के किसी भी फोरम पर निराकार प्राणी से बहस करके कुछ हासिल नहीं किया जा सकता . इसलिए मैंने अपनी बात कही है . कई बार होता ये है कि एक ही आदमी कई -कई काल्पनिक नामों से प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहता है . कई बार ये प्रतिक्रिया दूसरे के मुंह पर कालिख पोतने के लिए भी जाहिर होती रहती है .इसलिए मैंने ऐसा कहा था . जाहिर है अगर मैं किसी का जवाब दूं तो जानना चाहूंगा कि किसे जवाब दे रहा हूं. बस मेरे कहने का इतना ही मतलब था . आप अन्यथा न लें . अगर आपको तकलीफ पहुंची है तो माफी चाहूंगा .

    • aam admi says:

      ajit anjum ji,

      sawal maafi ka nahin hai. sawal hai mudde ka. aur mudda yah hai ki paise aur rasukh wale aadmi ke samne media se lekar vyavastha ka har ang sahme hue lahje me kyon rahta hai? kyon ek sadharan admi, jo democracy ki jaan hota hai, ke samne vyavastha (media sahit) ka yahi rawiaya nahin hota? kyon kisi high-profile muzrim ko ab tak phansi ki sakht saza nahin hui is desh me aur kyon koi channel ya akhbar iski padtal nahin karta? kya democracy is kism ke attitude ke rahte sahi disha me jaa sakta hai?

      ye chand sawal hain jise mere jaisa (aapki bhasha me ‘nirakar’ benami)admi samajhna chahta hai. Ummid hai ki ’sakar’-'nirakar’ ke chakkar me pade bina in muddon par aap apni baat rakhenge.

  7. ajit anjum says:

    आम आदमी महोदय, हो सकता है कभी ऐसा होता हो जो आप कह रहे हैं , लेकिन अगर पैसे और रसूख के सामने मीडिया हमेशा सहमा और डरा हुआ होता तो डीपी यादव , चौटाला , लालू यादव , मनु शर्मा के कारनामे समय समय पर उजागर नहीं हुए होते . डीपी यादव और विनोद शर्मा जैसे लोग धनबल और बाहुबल से होकर भी मीडिया को झुका और डरा नहीं सके . ऐसे सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं , जहां पैसा और रसूख के सामने मीडिया भारी पड़ा है . फिर मैं यही कहूंगा जनरलाइजेशन करना ठीक नहीं . शिवराज पाटिल , आर आर पाटिल और विलास राव देशमुख को क्या जाना पड़ा , आपको इतना तो पता ही होगा . विलास राव देशमुख की तस्वीरें दिन भर में तीस बार चैनल्स ने दिखा दिखाकर उनकी विदाई तय कर दी थी . यही हाल दोनों पाटिलों का हुआ . देश के गृहमंत्री से ज्यादा ताकतवर कौन होता है . शिवराज पाटिल को मीडिया ने जितना निशाने पर रखा , वो अपने आपमें मिसाल है . अब रहा सवाल कि किसी को फांसी क्यों नहीं हुई तो आप क्या चाहते हैं मीडिया ही जज और जल्लाद का काम भी करने लगे . कुछ काम सरकार का है आम आदमी महोदय . और ये जो आम आदमी है न इस देश का , वो भी अपना फर्ज निभाता तो मधु कोड़ा की बीवी जीत कर नहीं आ जाती . सारे दागी आम आदमी की कृपा से जीतकर आ गए हैं . समस्या है कि हर मर्ज की दवा आप मीडिया से ही चाहते हैं . बाकी लोग भी तो अपना – अपना काम करें . मैंने आजतक किसी आलोचक को मीडिया के पक्ष में कुछ लिखते – कहते नहीं देखा है .
    मुझे ये भी पता है ये बहस अंतहीन है . मैं पक्ष में एक तर्क दूंगा तो आपके पास कई जवाब होंगे . आप मीडिया के अच्छे काम को छोड़कर खामियों का पुलिंदा लिए तर्क करेंगे . तमाम खामियों के बाद भी मीडिया कई बार अपनी जिम्मेदारी निभाता है . इसे भी तो कभी मानिए.

  8. dilip mandal says:

    मैंने जो टिप्पणी लिखी है उसमें भी साफ कहा गया है कि “राठौर को लेकर मीडिया में कोई सहानुभूति नहीं है।“ इसलिए अगर कोई विवाद है तो उसका प्रस्थान बिंदु ये नहीं हो सकता कि मीडिया ने इस कांड का कवरेज कैसे किया है। कवरेज अच्छा है,जोरदार है, इसपर विवाद कहां है? रुचिका कांड में मीडिया की आक्रामकता प्रशंसनीय है। वैसे इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि मीडिया को इस कांड के लिए सक्रिय होते समय वर्गीय, सामाजिक और ऐसे जटिल प्रश्नों से नहीं जूझना पड़ा। ऐसे में सच और सही के पक्ष में खड़ा होने में असुविधा कम होती है। बहरहाल ये एक और ही बहस है।

    सवाल तो यही है कि राठौर के खिलाफ आक्रामक होते हुए भी मीडिया की भाषा में वो तीखापन क्यों नहीं है जो ऐसे ही दूसरे मामलों में होता है और वैसे मामलों में भी, जिनमें एफआईआर या चार्जशीट तक दाखिल न हो। वो कौन सी बाधा है जो हमें राठौर को “उसे” या “उसने” या “अपील दायर करेगा” आदि लिखने से रोकती है।

    भाषा में अगर तू-तड़ाक नहीं होनी चाहिए तो ऐसा ही भाषाई संस्कार हम बाकी मामलों में क्यों नहीं बरत पाते? मिसाल के तौर पर चोरियां तो हर दिन होती है। किस चोर को हमने “उन्हें”, “उन्होंने” लिखा है? कितनी बार किसी छेड़खानी करने वाले या बलात्कार के मामले में पकड़े गए या सजा पाए शख्स के लिए हम वैसी आदर वाली भाषा लिखते हैं, जैसी भाषा राठौर के लिए लिखी गई?

    क्या ये ऐसी बात है जिसपर चर्चा नहीं होनी चाहिए? क्या ये बिल्कुल स्वाभाविक है?

    ये सवाल किसी एक राठौर मामले के कवरेज से बड़ा है और स्थायी किस्म का भी है। संचार माध्यमों की भाषा के ऐसे सवाल तब भी होंगे, जब रुचिका-राठौर प्रकरण की सनसनी नहीं होगी। इस सवाल और ऐसे ही सवालों से मीडिया को अमूमन हर दिन टकराना होता है। सचेत और संवेदनशील हैं तो इस टकराव को महसूस करेंगे/कर पाएंगे, वरना तो सब कुशल मंगल है, मौसम सुहाना है और चराचर जगत में शांति है।

  9. ajit anjum says:

    तो दिलीप जी आपके कहने का मतलब ये हुआ कि चूंकि मीडिया ने राठौर के लिए उसने की उन्होंने का इस्तेमाल किया है , इसलिए सब किया धरा बेकार है . उन्होंने की जगह उसने कह देते तो सब ठीक हो जाता . वैसे आपकी जानकारी के लिए उसने भी कहा जा रहा है . लेकिन क्या मीडिया की जिम्मेदारी और भूमिका उसने और उन्होंने जैसे शब्दों के बीच तय होनी है ? अगर आपके पास फुर्सत हो तो आज शाम से न्यूज चैनल देखना शुरू कीजिए . देर से ही सही . आपके सवालों का जवाब मिल जाएगा . हमारे चैनल पर भी और सीएनएन आईबीएन से लेकर आईबीएन -7 और बाकी चैनलों पर भी . मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आप किस तीखापन की उम्मीद मीडिया से कर रहे हैं . मिर्ची लेकर राठौर को दिखाने से तीखापन तो नहीं आने वाला है . आप लोग जिस तरह की भाषा इस्तेमाल करने के लिए मीडिया की आलोचना करते रहे हैं , वही भाषा इस्तेमाल करने की सलाह दे रहे हैं . चलिए आप अपनी बात कहते रहिए , हम तो यही कहेंगे कम से कम रूचिका के मामले में मीडिया ने अपना काम जरूर किया और बेहतर ढंग से किया . आगे भी करेगा , इसी उम्मीद के साथ कि रूचिका को इंसाफ मिले और राठौर के सख्त से सख्त सजा .

  10. Vibha rani says:

    बहुत अच्छे, धान से चावल निकल जाने के बाद भी भूसे को पीटते रहने की हमारी आदत ज़िन्दाबाद! कभी मौका लगे तो http://chhammakchhallokahis.blogspot.com/2009/08/blog-post_11.html भी पढ लें. आदर देना तो हमारे खून में है. सुना नहीं है- एक संत जा रहे थे, एक मुसाफिर आ रहा था. यही तो है खास और आम का फर्क़. और दिलीप जी के आशय पर जाएं, ना कि विषयांतर हों.

  11. dilip mandal says:

    भाषा हमेशा सत्ता संरचना का हिस्सा होती है। इसका असर मीडिया पर भी दिखता है, हमारी बातचीत में भी और हमारी गालियों तक में(ज्यादातर गालियां महिलाओं और उनके अंगों को लक्षित कर यूं ही नहीं दी जाती)। मैंने एक बार किसी जगह एक उदाहरण देते हुए कहा था कि पत्नी बाजार से सब्जी लेकर आई और पति ने खाना पकाया तो पूरा सभागृह ठठाकर हंस पड़ा। दफ्तर में किसी खास चपरासी को जी और किसी को नाम से क्यों बुलाया जाता है, जैसी गुत्थियां भारतीय समाज की विशिष्टताओं को रेखांकित करती हैं। कोड़ा और सुखराम के लिए हम एक भाषा का इस्तेमाल नहीं कर पाते। मायावती और अटल बिहारी वाजपेयी भाषा की तराजू पर बराबर नहीं तुलते।

    कल्पना कीजिए कि देश की राजधानी का नाम दरभंगा होता तो भी क्या बिहारी उच्चारण के लिए लोगों को गालियां सुननी पड़ती?

    भाषा में जटिलताओं की बहुलता है। पंजाब के अखबारों में मैंने ऐसे प्रयोग देखे हैं कि लुटेरे अच्छी हिंदी बोल रहे थे। बिहारी और पूरबिया लोगों को नापने का ये भाषाई शिष्टाचार अद्भुत है। इस बारे में बातचीत शुरू करने के लिए मेरी तैयारी शायद नाकाफी हैं। ये कदाचित बड़े शोध का विषय है जिसे फास्टफूड अंदाज में निबटाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। राठौर मामला सिर्फ एक ट्रिगर था, इस चर्चा के लिए। बात न यहां शुरू हुई है और न उसे यहां खत्म होना चाहिए।

  12. संजय कुमार सिंह says:

    हिन्दी अखबारों और चैनलों की भी भाषा को लेकर वैसे ही कम रोना नहीं है। उसपर आप चोर के बारे में लिखवाना चाहते हैं कि – चोर जी से चूक हो गई इसलिए बेचारे पकड़े गए वरना चोरी का उनका अनुभव तो ऐसा था कि रहने वाले भले बिहार के थे पर पंजाब में चोरी करते थे तो अंग्रेजी बोलते थे और चेन्नई में किसी की जेब काट रहे हों तो पंजाबी बोलते थे ताकि पकड़े न जाएं और कोई सबूत न छूटे।

    चोर श्री फलाने महाराज एक बार गुजरात में चोरी करके मौके पर वाशिंगटन पोस्ट का इंटरनेट से निकाला प्रिंट आउट छोड़ आए तो वहां कि पुलिस ऐसे चकराई कि जांच के लिए एक टीम वाशिंगटन पोस्ट के दफ्तर में और दूसरी जेके पेपर मिल में पहुंच गई। चोर जी ने खुद कोई पढ़ाई नहीं की और पढ़ी लिखी ढिमकाना कुमारी से विवाह कर लिया। श्रीमती कुमारी ने अपने पति की रोज-रोज की गैर कानूनी कार्रवाइयों से खुश होकर उनकी पैरवी खुद ही करने का फैसला किया और वकील बन गई।

    श्री फलाने महाराज को चोरी के आरोप में गिरफ्तार किए जाने के मौके पर उनकी पत्नी और वकील श्रीमती ढिमकाना कुमारी ने कहा है कि वे नालायक और निकम्मी पुलिस की पोल खोल कर रहेंगी और अपने योग्य व काबिल चोर पति के हक में सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगी।

    दूसरी ओर, आप चाहतें हैं कि रिटायर आईपीएस अधिकारी पर छेड़छाड़ और बदसलूकी का आरोप साबित हो गया है या अदालत ने उन्हें सजा दे दी है तो उनके बारे में खबर इस तरह छपे – पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़ इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील दायर करेगा। राठौर ने कहा कि उसे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। उसकी लड़ाई जारी रहेगी और वह सुप्रीम कोर्ट भी जा सकता है।

    बताइए कौन चोर सुप्रीम कोर्ट गया है जिसे अखबारों ने सम्मान दिया है। किस चोर ने न्यायपालिका पर भरोसा जताया है, छेड़खानी के कितने अभियुक्त आईपीएस हैं, कितने अभियुक्तों की पत्नी वकील हैं। मेरे ख्याल में इस टक्कर के अपराधी चार्ल्स शोभराज और नटरवाल ही हैं। और इनके लिए मीडिया ने सम्मान सूचक शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया है। पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़ अभियुक्त हैं पर वे पूर्व डीजीपी भी हैं और जिस समाज ने करीब 30 साल के उनके कैरियर के दौरान उन्हें सम्मान दिया है वो एक दिन में खत्म नहीं हो जाएगा। आपने जितने उदाहरण दिए हैं उससे भी यह लगता है कि जो हुआ वह सामान्य है। वरना आपको इतने उदाहरण नहीं मिलते।

  13. अनिकेत तिवारी says:

    इस शानदार बहस के लिए जनतंत्र, दिलीप मंडल और अजीत अंजुम को बधाई। सबसे दिलचस्प है दिलीप मंडल और अजीत अंजुम की बहस। दोनों की मुख्य स्थापनाएं अपनी-अपनी जगह ठीक हैं। लेकिन बहस में लगता है “पुराने दोस्त” होने का भी असर है। या फिर अजीत अपने संपादकत्व के बोझ से बाहर नहीं आ पा रहे। वरना दिलीप ने तो लिख ही दिया है कि उन्हें चैनलों के तेवर से कोई शिकायत नहीं है। वो तो इसी बहाने भाषाई संस्कारों का शाश्वत मुद्दा उठाना चाहते हैं। मुझे लगता है कि दिलीप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। उनकी बात कितनी वाजिब है और भाषाई संस्कारों का पूर्वाग्रह कितना गहरा होता है वो इस लेख पर आयी संजय कुमार सिंह की टिप्पणी से साफ है। अगर अजीत इस टिप्पणी को पढ़ें और फिर अपनी संपादक और मीडिया के प्रवक्ता वाली भूमिका को थोड़ी देर के लिए छोड़कर सोचें, तो बात पूरी तरह साफ हो जाएगी। हां, इसे यूं भी कह सकते हैं कि बात सिर्फ मीडिया के नहीं, हमारे पूरे समाज के संस्कारों की है। ये संस्कार सिर्फ अपराध की खबरों में ही नहीं, वैसे भी दिखाई देता है। जैसे, हम लालू प्रसाद यादव के लिए सिर्फ “लालू” नीतीश कुमार के लिए सिर्फ नीतीश बड़ी आसानी से लिखते-बोलते हैं। लेकिन मुरली मनोहर जोशी के लिए सिर्फ मुरली या नारायण दत्त तिवारी के लिए सिर्फ नारायण या लाल कृष्ण आडवाणी के लिए सिर्फ लाल या लालकृष्ण यहां तक कि नरेंद्र मोदी के लिए नरेंद्र नहीं लिखते – इनके नाम छोटे में लिखने हों तो टाइटल लिखने की पुरानी स्थापित परंपरा का ही पालन किया जाता है – मसलन जोशी, तिवारी, आडवाणी या मोदी वगैरह…हां अटल बिहारी वाजपेयी के नाम का पहला शब्द एक अपवाद की तरह ज़रूर इस्तेमाल किया जाता है। यहां बात सिर्फ सवर्ण या अवर्ण की नहीं है, बात दरअसल “आभिजात्य” को लेकर हमारे दिलो-दिमाग में गहरे बैठी ग्रंथियों की है। मीडिया में लिखने-बोलने वाले लोग भी इन्हीं संस्कारों से आते हैं, इसलिए वहां भी इसकी झलक मिलती है। ये कोई सायास प्रक्रिया नहीं है…सब-कांशस माइंड में बैठा संस्कार है।
    शानदार लेख के लिए दिलीप मंडल को बधाई।
    अजीत अंजुम ने मीडिया की रुचिका मुहिम के बचाव में जो कहा वो भी मोटे तौर पर सही है।
    लेकिन बात इससे कहीं दूर तक जाती है।
    उस बात को पकड़िए।

  14. ajit anjum says:

    अनिकेत तिवारी जी , पहले तो आप दिमाग से निकाल दें कि मैं संपादकत्व के बोझ से निकल नहीं पा रहा हूं या फिर मीडिया के प्रवक्ता के तौर पर बोल रहा हूं . यही आप जैसे लोगों का पूर्वग्रह है . अगर मीडिया को दिन रात पानी पी पीकर कोसने वाले और खामियां गिनाने वाले लोग पूरी दुनिया का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं , अपनी निजी राय ( जो कभी – कभी भड़ास और कुंठाओं में तब्दील हो जाती है ) को पूरे देश , समाज और दर्शकों की राय मान लेते हैं , तो फिर मैं तो इस मीडिया का हिस्सा हूं . मैं अपनी बात कह रहा हूं तो आप कैसे मेरी बात को प्रवक्ता के तौर पर मान रहे हैं . इस देश की जनता और दर्शक के कितने स्वयंभू प्रवक्ता अपनी बात कह रहे हैं , हमने कहा तो क्यों एतराज . मैं खुद को कभी संपादक मानता ही नहीं हूं , एक पत्रकार हूं , जो वक्ती तौर पर हो सकता है संपादक की भूमिका में हो , ये आप मान रहे हैं . रही बात लालू और नीतीश लिखने वाली मीडिया लाल , मुरली या नरेन्द्र क्यों नहीं लिखता . ये बड़ा अबूझ सा सवाल है . क्या लाल कहने से पूरा देश समझ जाएगा कि किसी बात हो रही है ?क्या नरेन्द्र कहने से पूरा देश समझ जाएगा कि मोदी की बात हो रही है?
    आपकी अपनी फिलॉसफी हो सकती है कि अभिजात्य को लेकर हमारे दिलो दिमाग में बैठी ग्रंथियों की है , उसका कोई जवाब नहीं है . इंदिरा को इंदिरा कहा गया . आपको इतना तो पता ही होगा . फिरोज गांधी को फिरोज कहा गया . मोती लाल नेहरू को मोती लाल कहा गया . जेपी या जयप्रकाश कहा गया , बीजू पटनायक को बीजू कहा गया . ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं भाई साहब . सरनेम या नाम का इस्तेमाल ये भी तय करता है कि दुनिया समझ पाए कि बात किसकी हो रही है . आपने एक जजमेंट दे दिया कि मीडिया में लिखने बोलने वाले लोग भी इन्ही अभिजात्य संस्कारों से आते हैं , इसलिए वहां भी झलक मिलती है . ये आपकी राय हो सकती है लेकिन तर्क की कसौटी पर सही नहीं . मुलायम , विलास राव , शिवराज , वसुंधरा , राजनाथ , वेंकैया , सोनिया, सुषमा …किस किसके नाम गिनाऊं . ये वो लोग हैं जिनके सरनेम के बगैर मीडिया इन्हें संबोधित करता है औऱ दुनिया समझ लेती है . लेकिन अगर कोई कई लोगों के नाम ऐसे हैं कि सरनेम छोड़ दें तो अधूरा हो जाएगा . जैसे सीताराम ( बगैर यचूरी के ) प्रकाश ( बगैर करात के ) हरकिशन ( बगैर सुरजीत के ) ज्योति ( बगैर )बाल ( बगैर ठाकरे के ) …अब इसका क्या कहेंगे . मैं संजय का लेख भी पढ़ चुका हूं लेकिन उसे आप अपने संदर्भ के साथ देख रहे हैं . आपने व्यंग्य का साथ कहा है कि बहस में पुराने दोस्त होने का भी असर है . पता नहीं आप कहना क्या चाह रहे हैं . लेकिन इतना तो मुझे समझ में आ रहा है कि आप उसी पूर्वग्रही श्रेणी के हैं , जिन्हें वही नजर आता है , जो देखना चाहते हैं . बात कहां दूर तक जाती है , कहां से उसे पकड़ना है , इस पर आप विचार करें लेकिन थोड़ा खुलेपन के साथ .

  15. अजय रघुवंशी says:

    अजीत जी की बात बिलकुल ठीक है। आप लोग मीडिया को बेवजह कोसना बंद कीजिए। अगर मीडिया न होता तो राठौड़ जैसे बड़े रसूख वाले शख्स पर खुलेआम उंगली उठाने और उसे कोसने का साहस कितने लोग कर पाते? और आपकी ये वेबसाइट भी तो मीडिया का ही अंग है। रहा सवाल भाषाई संस्कारों का, तो ये तो जाते-जाते जाएगा। ठीक है कि एक आम चोर को जिस तरह संबोधित करते हैं, वैसे शायद राठौड़ को नहीं किया गया। लेकिन क्या सिर्फ इसी वजह से मीडिया की सकारात्मक भूमिका को पूरी तरह खारिज कर देंगे? संजय कुमार सिंह की टिप्पणी तो ज़रूर एक पिछड़े सोच वाली दलील पेश करती है, लेकिन उसे पूरे मीडिया का दिमाग तो नहीं मान सकते। किसी बड़े अफसर, नेता या किसी भी बड़ी शख्सियत के दोषी साबित होने के बाद अचानक उसे तू-तड़ाक से संबोधित करना ही क्या सबसे ज़रूरी है?
    दिलीप जी से एक सवाल है –
    आप क्या चाहते हैं, चोरों को भी आप कहकर संबोधित किया जाए या चोरों की तरह ही राठौड़ का नाम भी तू-तड़ाक वाले अंदाज़ में लिया जाए? टिप्पणियों को पढ़कर ऐसा लगा कि लोग इस मसले पर कनफ्यूज़ हो रहे हैं।

  16. रंगनाथ सिंह says:

    अभी जरूरत थी कि राठौर और उस सिस्टम के खिलाफ लिखा जाए जो ऐसे गुनाहगारों के लिए कवच का काम करता है। मीडिया की भाषा का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करने के लिए आप लोगों ने गलत वक्त चुना है। कुल मिला कर यहां पर अजीत अंजुम का पक्ष ही वजनी लग रहा है। मौके की नजाकत को ध्यान रखे बिना कोई बहस छेड़ देना सिनिसिज्म का लक्षण है। दिलीप जी तो सदैव सिस्टम के खिलाफ धारदार लेख लिखते रहे हैं। फिलवक्त वो न्यायपालिका या पुलिसिया उत्पीड़न या फिर अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण पर लिखते तो उनका लेख ज्यादा समीचीन होता।

  17. Lalit Bansal says:

    sabse pehle hamara system hi kharab hai, wo police wali ko fansi di jaani chahiye jo isme doshi hai, chautala, bhajanlal ko black list kar dena chahiye