मुझे नश्तर से छील दो, सुंदर बना दो!
लेखक: दिलीप मंडल | December 10, 2009 | देश-दुनिया, ब्लॉग | 2 Comments
वो अपने देश की सबसे खूबसूरत लड़की थी। 1994 में उसने मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में अपने देश का प्रतिनिधित्व किया था। सुंदरता के तय स्टैंडर्ड्स पर वो हर तरह से फिट थी। लेकिन 15 साल बाद, सुंदरता के उन्हीं तय स्टैंडर्ड्स पर फिट बने रहने की चाहत ने आखिरकार उसकी जिंदगी ले ली। बात हो रही है सोलांगे मैगनानो की। 1994 की मिस अर्जेंटिना। इस खिताब को जीतने के 15 साल बाद वो एक शादीशुदा महिला थीं। आठ साल पहले उसे जुड़वा बच्चे हुए थे।
सोलांगे मैगनानो को जमाने ने सुंदर माना। जमाने की नजरों में वो उसी तरह सुंदर बने रहना चाहती थी। इसके लिए वो समय यानी उम्र से भी लड़ ही थी। 38 साल की उम्र में वो सुंदरता के उन स्टैंडर्ड्स पर फिर से खरा उतरना चाहती थी, जो जमाने ने, जमाने के प्रभुत्वशाली लोगों ने और पुरुषों ने तय किए थे। वो अपनी हिप यानी कूल्हे को सुंदर बनाना चाहती थीं। इसके लिए उसने कॉस्मैटिक सर्जरी की शरण ली। इस सर्जरी के लिए वो देश की राजधानी ब्यूनस आयर्स आईं। वहां के अस्पताल में उनकी सर्जरी की गई। ग्लूटेयोप्लास्टी नाम की इस सर्जरी में उनके कूल्हे में इंप्लांट डाले गए। लेकिन सर्जरी के दौरान हीं उन्हें सांस की तकलीफ शुरू हो गई और तीन दिन तक मौत से जुझने के बाद आखिरकार जिंदगी हार गई।
इस तरह के ट्रीटमेंट तमाम दूसरे ब्यूटी ट्रीटमेंट के दौरान मौत की घटनाएं पहले भी हुई हैं। दूसरे तरह के साइड इफेक्ट और कॉम्प्लिकेशन भी होते ही रहते हैं। लेकिन सोलांगे मैगनानो की ये दर्दनाक कहानी सिर्फ कॉस्मैटिक सर्जरी के खतरों को उजागर नहीं करती। ये सुंदरता के लेकर स्टैंडर्ट्स के लगातार सख्त होने, इसको लेकर बढ़ते दबाव और उसके कारण पैदा होने वालों तनावों की दास्तान है। सोलांगे का ही उदाहरण लें तो कच्ची उम्र में एक लड़की देश की सबसे सुंदर युवती चुनी जाती है। इसके बाद उसके कदमों में तो मानों सारी दुनिया होती है। दुनिया भर में वो चेहरा पहचाना जाने लगता है। विज्ञापनों से लेकर तमाम तरह के दूसरे प्रमोशन ऑफर्स की सोलांगे मैगनानो के सामने लाइन लग जाती है। पेरिस के रैंप में उसका जलवा सर चढ़कर बोलता है। लेकिन सुंदरता की दुनिया भी बहुत जल्द ही नए को पुराना करार देकर फिर उसे खारिज कर देती है। रैंप पर मॉडलों की जिंदगी वैसे भी बेहद छोटी होती है। सोलांगे मैगनानो पेरिस के रैंप वर्ल्ड से लौटकर अपने मुल्क अर्जेंटिना आती हैं। शादी रचाती हैं और जुड़वा बच्चों की मां बनती हैं। लेकिन रैंप और मॉडलिंग की चाहत खत्म नहीं होती। लेकिन यहां लौटने की उनसे कीमत मांगी जाती है। वो अपने ब्रैस्ट की सर्जरी करा कर उसे वो रूप देती है, जिसे खूबसूरत माना जाता है और अब वो अपने कूल्हे को पुरुषों की चाहत के मुताबिक सजाना चाहती हैं। मॉडलिंग में लौटने की ये बेहद क्रूर शर्त थी, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया और ये उनकी जिंदगी का सबसे खतरनाक फैसला साबित हुआ।
ये सब तो अर्जेंटिना में हुआ लेकिन इस समस्या के कई रूप हमारे आस पास और कई बार हमारे घरों के अंदर मौजूद रहते हैं। गोरा बनने के लिए क्रीम का इस्तेमाल तो पुराना है और ब्लीच कराने की बात भी अब नई नहीं रही। अब तो लोग स्किन ग्राफ्टिंग यानी नई चमड़ी लगाने जैसे अतिवादी तरीके तक अपना रहे हैं। प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचने के बाद माइकल जैक्सन के लिए गोरी चमड़ी वाला बनने और दिखने की क्या मजबूरी रही होगी, इसका आप अंदाजा लगा सकते हैँ। भारत जैसे गर्म जलवायु वाले देश में, जहां चमड़ी का रंग सांवला होना बेहद आम है, वहां करोड़ों लड़कियों और अब लड़कों के मन में बाजार गोरा होने की चाहत जगा रहा है। फिल्मों की हीरोइनों और मॉडल्स के लिए सांवला या काला दिखने का विकल्प ही नहीं है।
सुंदरता का मापदंड कैसे और कौन तय कर रहा है, ये भी बहुत महत्वपूर्ण बात है। क्या आपने इस बात पर गौर किया है कि भारत में जो भी मिस इंडिया प्रतियोगिता में चुनी जाती है या इस प्रतियोगिता के फाइनल राउंड तक पहुंचती है, उन सभी में कुछ बातें अक्सर समान होती हैं। वो सभी गोरी होती हैं। लंबी होती हैं। छरहरी होती हैं। उनकी नांक चपटी नहीं हो सकती, होठ मोटे नहीं हो सकते। कमर-कूल्हे और सीने का एक खास अनुपात हासिल करना इनके लिए मजबूरी है। लंबाई और वजन का एक खास अनुपात भी होना चाहिए। यानी इन प्रतियोगिताओं में भारत की एथनिक, इलाकाई और सामाजिक विविधता के मुताबिक, सुंदरता के अलग अलग मापदंडों का महत्व नहीं है। इन मापदंडों के रहते कोई आदिवासी लड़की कभी मिस इंडिया नहीं चुनी जाएगी। किसी द्रविड़ लड़की के लिए भी इस प्रतियोगिता में कोई गुंजाइश नहीं है। दरअसल भारत में सुंदरता के सदियों पुराने प्रतिमानों पर खरी उतरने वाली हर लड़की इस प्रतियोगिता में ओवरवेट करार दी जाएगी। जिस तरह की लड़कियां इन प्रतियोगिताओं में जीतती हैं और जिन्हें फिर पूरे देश की लड़कियों के लिए सुंदरता का पैमाना बना दिया जाता है वो प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार कतई सुंदर नहीं कही जाएंगी।
दरअसल यहीं पर ये सवाल आता है कि आखिर कौन है जो किसी का सुंदर या असुंदर होना तय करता है? हर देश काल परिस्थिति में वो हमेशा प्रभुत्वशाली ही होता है जो बताता है कि सुंदर कौन है और सुंदरता क्या है। विश्व के स्तर पर देखें तो इस समय यूरोप से निकल कर दुनिया में छा गए एंग्लो सैक्सन लोग तय कर रहे हैं कि सुंदर होना क्या होता है। आज दुनिया में अमेरिका और यूरोप से लेकर ऑस्ट्रेलिया में छाए इस नस्ल के लोग अपने सौंदर्यबोध के अनुसार सारी दुनिया को बता रहे हैं कि सुंदर होना क्या होता है। कल्पना कीजिए कि अगर दुनिया का बड़ा हिस्सा अफ्रीका के किन्हीं मुल्कों का गुलाम होता तो भी क्या गोरा होना ही सुंदरता का पर्यायवाची होता। भारत की इलाकाई विविधता के अनुसार भी सुंदरता के कई मापदंड होने चाहिए लेकिन अब इसमें में एकांगता आ रही है। बाजार और मीडिया भारतीय सुंदरता की जो छवि बना रहा है उसमें देश की विविधता गायब है। इसके अलावा खासकर लड़कियों और महिलाओं की सुंदरता के स्टैंडर्ड तय करने में पुरुषों की निर्णायक भूमिका है। उनका सीना कैसा हो, उनके कूल्हे कैसे दिखें, टांगें कैसी हों, वजन कैसा हो इन सबका निर्धारण करने वाला पुरुष हैं। और इन मापदंडों के आधार पर बनी एकरूप यानी स्टीरियोटाइप छवि को इतनी मजबूती से स्थापित कर दिया जाता है कि इस स्टीरियोटाइप को हासिल करना महिलाओं के जीवन का एक लक्ष्य बना दिया जाता है।
जमाना चाहता था कि 38 साल की सोलांगे मैगनानो चिरयौवना वाली देहयष्टि बनाए रखें। सोलांगे भी इसी मरीचिका के पीछे भाग रही थीं। सुंदरता को लेकर जमाने की चाहत को अपनी चाहत बनाने के लिए सोलांगे ने भारी कीमत चुकाई। लेकिन ये समस्या सालांगे की नहीं है। कहीं आपके घर या पड़ोस में भी ऐसी ही समस्या तो नहीं पैदा हो रही है? (राष्ट्रीय सहारा से उधार)
((प्रिंट, टेलीविजन और वेब तीनों क्षेत्रों में लंबे समय तक काम करने के बाद वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल इन दिनों आईआईएमसी में पढ़ा रहे हैं।))
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