“प्रभात ख़बर सरयू राय का मुखपत्र है”
लेखक: जनतंत्र डेस्क | November 18, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment
दो दिन पहले जनतंत्र के पास एक चिट्ठी आई। जमशेदपुर से एक पाठक ने झारखंड के नंबर वन अख़बार प्रभात ख़बर पर अनैतिक होने का आरोप लगाया। हमने उस चिट्ठी की ख़बर “तथागत” को दी और कहा कि ज़रा सच्चाई का पता लगाइए। “तथागत” ने पता लगाने का वादा किया। इधर जनतंत्र की टीम ने भी प्रभात ख़बर के ई-पेपर के जरिए थोड़ी बहुत छानबीन की। और तथागत को उसका ब्योरा भी दिया। अब तथागत ने एक रिपोर्ट भेजी है। उसके मुताबिक तो जनतंत्र के पाठक की बात में दम है। हो सकता है कि यहां कुछ लोग कहें कि यह प्रभात ख़बर की रिपोर्टिंग का तरीका है। ऐसे में उन लोगों से हमें सिर्फ़ यही कहना है कि रिपोर्टिंग का यह तरीका बेहद ख़तरनाक है। इससे लेन-देन की भनक भले ही नहीं लगे लेकिन एक गठजोड़ का एहसास ज़रूर होता है। और एक सचेत पाठक को हर हाल में इसका विरोध करना चाहिए। - मॉडरेटर
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पाठक की चिट्ठी
चुनाव के पहले ही प्रभात खबर ने सरयू राय को जीत दिला दी है. आंदोलन के बड़े बड़े दावे करने वाला यह अखबार और इसके प्रधान संपादक शायद अपने यहां कर्मचारियों को घुट्टी पिलाना भूल गए. बड़े बड़े वादे करने वाला मैनेजमेंट अपनी संपादकीय टीम को सबक सीखना भुला बैठा. तभी तो बीते कुछ धिनों से प्रभात खबर में सरयू राय से जुड़ी ख़बरें ऐसे छापी जा रही हैं जैसे वो चुनाव से पहले ही जीत चुके हों.
कुछ दिन से प्रभात ख़बर के जमशेदपुर संस्करण पर नज़र डालने के बाद ऐसा लगता है कि जनता को जगाने और पैसे लेकर खबर नहीं छापने का नारा बुलंद करने का मकसद एक भ्रामक स्थिति पैदा करना था। जिसकी आड़ में ख़बरों का धंधा किया जा सके। ऐसे में अख़बार के संपादक हरिवंश से पूछा जाना चाहिए कि आखिर उनकी आचार संहिता का क्या हुआ? वो आचार संहिता जो उनके अख़बार ने बड़े जोर-शोर से छापी थी और खुद ही अपनी पीठ थपथपाई थी।
प्रभात खबर का एक दावा यह भी है कि सीमित संसाधन में भी वो नंबर वन है। मगर झारखण्ड के लोग जानते है की अखबार ने अपनी प्रतिबद्धता और ईमानदारी का जो चोला पहना है वो एक भ्रम से अधिक कुछ नहीं। खासकर जमशेदपुर की जनता जानती है कि प्रभात खबर सरयू राय का मुखपत्र है। हो सकता है कि यह ग़लत हो लेकिन पिछले एक सप्ताह मे इस अख़बार ने सरयू राय को इतनी बार छपा है कि अख़बार की विश्वसनीयता घट चुकी है।
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