सूचना अधिकार की किरण नहीं निकलेगी
लेखक: प्रभात शुंगलू | November 9, 2009 | ब्लॉग | 2 Comments
किरण बेदी चीफ इन्फॉर्मेशन कमिश्नर नहीं बन पायेंगी। उन्हें फिर वो नहीं मिलेगा जिसे वो डिज़र्व करती हैं। या फिर उनकी तरह के कर्मठ, जुझारू और निडर आईपीएस अफसर या ब्यूरोक्रैट डिजर्व करते हैं। सवाल यह नहीं कि किरण बेदी को सीआईसी नियुक्त किया जायेगा या नहीं। अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे, इन्फोसिस मेन्टर नारायणमूर्ति, आमिर खान भी ये नहीं चाहते। वो तो सरकार से इतनी इल्तजा कर रहे जिसे भी सीआईसी बनाओ उनमें बेदी जैसी खूबियां हों। वो निडर हो। वो कानून को बिना किसी भेदभाव के इम्पलिमेंट कर सके। उसे कोई प्रलोभन कभी डगमगा न सके। वो निष्पक्ष हो। वो आम आदमी की तरफ से सभी सरकारी तंत्र पर गिद्ध की तरह नज़र रखे। ताकि कोई अपनी जिम्मेदारी से बच न पाये। ताकि ऐसे संस्थानों में लोगों की आस्था बनी रहे।
आरटीआई कानून ने पिछले 2 सालों से सरकारी मशीनरी में हड़कंप पैदा कर दिया है। अब जिस भी आदमी के मकान का नक्शा नगर निगम में बेवजह कारणों से रूका है तो वो जानना चाहता है क्यों। किसी सीनीयर सिटिज़न की पेंशन दिये जाने के एवज़ में उसे घूस देनी पड़ रही हो वो भी अब आरटीआई का सहारा लेकर सरकारी अफसरों की पोल खोलना चाहता है। कुछ साल पहले तक ये सारे काम देश की विभिन्न अदालतें कर रहीं थीं। क्योंकि सरकारी तंत्र तो पूरी तरह से ठप्प हो चुका था।
लेकिन जब हाई कोर्ट के एक जज के पास लिफाफे में करारे नोट पहुंचते हैं तो ऐसे जज आम आदमी को क्या इंसाफ देंगे। हाल ही हाई कोर्ट के एक जज पर अकूत संपत्ति अर्जित करने के आरोप लगे। ये तब हुया जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट में लाने की कवायद चल रही थी। लेकिन देश के कुछ चुनिंदा कानूनविदों ने जब इस पर सवाल उठाया तो सुप्रीम कोर्ट को भी उनके जायज गुस्से के सामने झुकना पड़ा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के यही जज आरटीआई के तहत अपनी संपत्ति का ब्योरा देने से हिचकिचा रहे हैं। या शायद उन सवालों से घबरा रहे हैं जो उनकी संपत्ति का खुलासा होने के बाद उनसे जनता पूछ सकती है। ऐसे में अगर आम आदमी का ज्यूडिशियरी पर भरोसा डगमगाये तो फिर वो कहां पनाह मांगे।
सीबीआई जैसी संस्था की छवि धूमिल होती जा रही। वो अब सत्ताधारी पार्टी की कठपुतली बन कर रह गयी है। सवाल फिर जस का तस – आम आदमी इंसाफ की गुहार कहां लगाए। ले-देकर चुनाव आयोग एक ऐसी संस्था बची है जो पिछले कुछ सालों में निष्पक्ष दिखी है। हांलाकि सभी सरकारों ने पूरी कोशिश की कि उनका कोई ‘लॉयल’ आदमी ही सीईसी यानी मुख्य चुनाव आयुक्त बने। लेकिन पिछले कुछ सालों में आयोग ने निष्पक्ष चुनाव कराया और आम आदमी के मन से पोलिंग बूथ तक पहुंचने का ख़ौफ़ ख़त्म किया है उसे नकारा नहीं जा सकता।
अब सवाल यही उठता है कि क्या आरटीआई को हम सीबीआई की तर्ज पर देखना चाहते हैं या चुनाव आयोग की तर्ज पर। सवाल ये है कि आरटीआई को हम मजबूती देना चाहते हैं या उसे दूसरे ऐसे संस्थानों की तरह उसे टूथलैस टाइगर बनाना चाहते हैं। पिछले साल का ही आंकड़ा लें तो सूचना के अधिकार के तहत अर्जी लगाने वालों में केवल 27 फीसदी लोगों को ही आरटीआई के तहत सूचना मिली। 61 फीसदी मामलों में सूचना आयोग के फैसलों का पालन नहीं हुया। और केवल 2 फीसदी मामलों में ही पेनाल्टी लगायी गयी। यानी राज्यों में सूचना आयुक्तों को कानून के तहत दिये गये अधिकारों का इल्म नहीं या फिर वो उसे बेख़ौफ़ होकर इस्तेमाल नहीं कर पा रहे।
मतलब न सिस्टम बदलेगा और न ही सूचना अधिकार कानून का फायदा आम आदमी तक पहुंच पायेगा। कानून सही तरीके से इम्प्लीमेंट न हो वो भी कानून न होने के बराबर है। क्या हम इन संस्थानों में ऐसे अधिकारी नहीं चाहते जिनमें कानून को दृढ़ता से इम्प्लीमेंट करने का जज्बा हो। लेकिन अगर ऐसा हुया तो उन तमाम अफसरों का क्या होगा जिन्हे किसी मिनिस्टर या पार्टी विशेष का पिठ्ठू बनने में कोई गुरेज नहीं। आखिर सरकार को भी तो यस मिनिस्टर कहने वाले ‘लॉयल’ अफसर चाहिये।
इसलिये प्रधानमंत्री जी आपसे निवेदन है कि आप अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे, आमिर खान, शबाना आजमी और नारायणमूर्ति जैसे तमाम इंसाफ पसंद लोगों के बेतुके सुझाव पर तनिक भी तवज्जो न दें। ऐसे संस्थानों में अगर कुशल, निडर और ईमानदार अफसर होंगे तो आम आदमी सशक्त होगा। समाज सशक्त होगा। लोकतंत्र मजबूत होगा। लोकतंत्र मजबूत होगा तो जनता सवाल पूछेगी। अफसरों और नेताओं की जवाबदेही बढ़ेगी। और जो ये हुया तो पोल खुलेगी। पोल खुलेगी तो सिंहासन डोलेगा। जो सत्ता जायेगी तो फिर क्या बचेगा। आम आदमी की बेहतरी के लिये इतनी बड़ी कुर्बानी जायज नहीं। (दैनिक भास्कर से साभार)
(( लेखक IBN 7 में एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं))
इन्हें भी पढ़ें:
- हुसैन, तुम धर्म के ठेकेदारों से माफ़ी मत मांगना - March 2nd, 2010
- हीरो जीता, विलेन हारा - February 14th, 2010
- अब महानायक पहनेंगे भगवा चश्मा, करेंगे मोदी वंदना - February 4th, 2010
- माया का नया मंत्र - विश करो, ज़िद करो - February 3rd, 2010
- पाक के ख़िलाफ़ जेहाद का आगाज़ भारत की ओर से हो! - January 22nd, 2010





यह व्यवस्था आम आदमी के लिए हैं कहां? इस व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर आम आदमी है और उसके शोषण और दोहन के लिए यह व्यवस्था तैयार की गई है। किसी भी ऊंचे पद ईमानदार लोगों की जगह नहीं। संस्थागत भ्रष्टाचार में ईमानदार हाशिए पर फेंक दिए गए हैं।
भाई विवेक आपने अक्षरशः सही कहा,
व्यवस्था जिन के लिए है वो अपने हिसाब से इसका निर्माण करते हैं, आम जन पिसते हैं तो पिसें.