बीजेपी वालों पहले घर संभालो वरना सुनेगा कौन?
लेखक: प्रभात शुंगलू | October 22, 2009 | देश-दुनिया, ब्लॉग | 2 Comments
महाराष्ट्र और हरियाणा चुनावों के वोटों की गिनती चल ही रही थी कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी का टीवी चैनलों पर बयान आया। नकवी ने पार्टी की हार का ठीकरा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर फोड़ दिया। कहा वो अब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानि ईवीएम नहीं रही बल्कि कांग्रेस वोटिंग मशीन यानि सीवीएम हो गयी है। लेकिन तुरत फुरत पार्टी के हरियाणा प्रभारी विजय गोयल ने भी टीवी पत्रकारों को जमा कर के नकवी की बात काट दी। कहा ईवीएम का हार से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं। इस बार झेंपने की बारी नकवी की थी कि मेरे बयान को गलत तरीके से इन्टरप्रेट किया गया। नकवी तो बस अपने सीनियरों के पुराने बयान को दोहरा रहे थे। आडवाणी और उनके चेलों नें लोकसभा चुनावों के दौरान ईवीएम पर संदेह जताया। इतना कि हास्यासपद लगा। चुनाव आयोग ने भी बीजेपी के इस आरोप को एक सिरे से खारिज कर दिया। और फिर चुनाव के बाद आडवाणी का प्रधानमंत्री बनने का सपना टूट गया। पार्टी की हार इतनी बड़ी थी और पार्टी की अंदरूनी कलह इतनी तगड़ी की ईवीएम के मैनीप्युलेशन किये जाने का आरोप पार्टी को भूलना पड़ा। और फिर ये इल्जाम भी तो लगता कि क्या मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी ईवीएम मेनीप्यूलेट कर के दोबारा चुनाव जीती थी। इसलिये पार्टी चुप मार गयी।
अब महाराष्ट्र में पार्टी ने हार का सामना किया तो ईवीएम की विश्वसनीयता पर फिर सवाल खड़ा किया। यानि पार्टी फिर ईवीएम के कारण हारी। अपनी कमजोरियों के कारण नहीं। लोगों ने महाराष्ट्र में उसे और उसकी पुरानी सहयोगी शिव सेना को सत्ता के लायक नहीं समझा ये समझने के लिये कौन टाइम खोटा करे। विदर्भ में किसानों के आत्महत्या का मुद्दा, बिजली, पानी सड़क जैसे गंभीर मुद्दों के रहते बीजेपी-शिवसेना उसे ठीक से भुना नहीं पायीं पार्टी को यह कमजोरी नहीं दिखी। दस साल के कांग्रेस-एनसीपी शासन के बावजूद बीजेपी-शिवसेना एक परिपक्व गठबंधन और एक सीरियस ऑप्शन के तौर पर नहीं उभर पायी इसका मलाल पार्टी को कतई नहीं था। जिस राज्य में दस साल पहले इसी गठबंधन का शासन था उसकी जमीन को दस साल में कैसे अपने पैरों के नीचे से तिल तिल खिसकती रही इसका एहसास पार्टी को नहीं हुया। बड़ी गंभीरता से बखान रहे थे कि ये ईवीएम नहीं सीवीएम है। तुकबन्दी अच्छी थी मगर एक पुराने मुहावरे से मात खा गयी – नाच न आवै, आंगन टेढ़ा। महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की हार उसी दिन तय हो गयी थी जिस दिन लोकसभा चुनावों के नतीजे आये। राज ठाकरे की एमएनएस ने मुंबई-ठाणे की 48 सीटों पर 20 फीसदी वोट लेकर चचा बालासाहेब के मंसूबों की हवा निकाल दी थी। बीजेपी को अपने पुरान सहयोगी को समझाना चाहिये था कि भतीजे को गले लगा लो वर्ना विधानसभा चुनावों में हम सब मारे जायेंगे। वो 22 मई को नहीं हुया। और जो 22 अक्टूबर को हुया वो भी बीजेपी को स्वीकारना पड़ेगा।
और फिर लोकसभा चुनावों में हार से लेकर अब तक शायद पार्टी को इतना समय ही नहीं मिल पाया कि वो राज्यों के चुनावों के लिये कमर कस ले। पार्टी के पास अपनी ही प्राब्लम जो इतनी सारी थी। पिछले पांच महीनों से पार्टी उसी से तो सुलट रही है। पार्टी में तो वर्चस्व की लड़ाई छिड़ी हुयी है। जो शीर्ष हैं वो झुकना नहीं चाहते। नयी जेनरेशन के लिये जगह नहीं छोड़ना चाहते। और जो युवा हैं वो या तो अपने राज्य के बाहर निकलते डर रहे कि कहीं दिल्ली पहुंचते ही उन्हे नोंच-खसोट के निपटा न दिया जाये इसलिये राज्य में पड़े रहो तो बेहतर। वैसे अगर ये नेता राज्य छोड़ के दिल्ली आ गये तो पार्टी के हाथ से वो राज्य भी जायेंगे जहां वो दोबारा तिबारा जीत के आ चुकी है। और उसकी उस जीत में दिल्ली के शीर्ष नेताओं का न के बराबर योगदान रहा। शिवराज, मोदी और रमन सिंह अपने बलबूते ही पार्टी के नैय्या के खेवनहार बन हुये हैं।
तो सवाल फिर वहीं उठता है। पहले तो अपना घर ठीक किया जाये। तय किया जाये कौन क्या भूमिका अदा करेगा। काम का बंटवारा उसकी अहमियत और नेता के टैलेंट के मुताबिक बांट लिया जाये। कौन बनेगा टीम का कप्तान और कौन रहेगा नॉन प्लेयिंग कैप्टन ये भी तो तय करना होगा। और कैप्टन की भी सुनी या मानी जायेगी या नहीं। उनके अख्तियार में दरअसल होगा क्या। अभी तो पार्टी ये ही नहीं तय कर पा रही कि वसुंधरा राजे से कैसे निबटा जाये। कौन बिल्ली के गले में घंटी बांधे। कौन उनसे इस्तीफा मांगे। स्थित इतना हास्यासपद बन गयी है कि पार्टी वसुंधरा के आगे नतमस्तक है कि हे देवी मां जब जी करे तब इस्तीफा देना। पार्टी आपकी ही है। हम भी आप के है। बस अपनी ममता भरी छांव बनाये रखना।
एक ममता भरी छांव आरएसएस की भी है। उससे कितनी, कब, कैसे और किस रूप में ममता चाहिये ये भी बीजेपी को ही तय करना है। वो काम भी तो पिछले पांच महीने से लटका पड़ा है। आरएसएस तो अपना आंचल फैलाने के लिये हमेशा आतुर रहा। बीच में वाजपेयी जी ने आंचल झिड़क दिया था। सत्ता चलाने के लिये मंदिर मुद्दा ताक पर रख दिया था। बस तभी से संघी भी अकेले पड़े गये थे कि बेटा ही अनसुनी कर रहा। अब वाजपेयी राजनीति से दूर हैं और आडवाणी भी ऑम्बुड्समैन की भूमिका में आने वाले हैं तो भागवत जी ने ममता का आंचल फिर पार्टी की ओर फेंका है। डूबते को तिनके का सहारा। पार्टी तो तय कर बैठी है कि ममत्व के बिना वो अधूरी है। लेकिन फिर गठबंधन राजनीति का जिक्र छिड़ता है तो फिर वही पुरानी एनडीए काल वाला संशय घर कर लेता है। नफा नुकसान सब याद आने लगता है। पार्टी को पहले इस ऊहापोह से बाहर निकलना पड़ेगा। आरएसएस को लेकर अपनी नीती स्पष्ट करनी पड़ेगी।
राजे से उबरे तो राहुल की सोंचनी पड़ेगी। मिलन के लिये व्याकुल बावरे हिरण की तरह बालक बहुत कुंलाचे मार रहा। नये नये वोट बैंक ढूंढ रहा। उसने तो दलितों में भी मायावती से अलग अपने दलित ढूंढ़ लिये है। आजकल उन्ही के साथ उठता बैठता है। हमउम्र युवा लीडरशिप तैयार कर रहा। नये भारत की खोज करने का दंभ भर रहा। इस बालक से भी तो निबटना पड़ेगा। कौन खड़ा होगा इसके सामने। अगर कल सत्ता पर हक जमाया तो बीजेपी से कौन खड़ा होगा इस बालक के मुकाबले। बीजेपी से कौन बनेगा युवाओं का हिमायती। आडवाणी, सुषमा, जेटली, राजनाथ, मोदी और नकवी। फिर कोई और। और ये कोई और कहां छिपा बैठा है। सामने क्यों नहीं आता। है भी या नहीं। नहीं है तो कब प्रकट होगा। ये बात बीजेपी को अब बहुत साल रही होगी। पहले इससे निबटे तब तो राज्य में मजबूत गठबंधन के तौर पर उभरेंगे। या कोई सीरियस विकल्प देंगे।
सीरियस विकल्प तो दूर बीजेपी को अपने नॉन-सीरियस प्लेयर्स पर ज्यादा भरोसा है। जो टेलीविजन पर शक्ल दिखाने के लिये कोई भी बचकाना बयान देने से नहीं हिचकते। और हठ ये कि हमें भी सुनो। हमें भी चुनो। मगर क्यों..। अब तो तुम वो भी नहीं रहे जो क्लेम करते थे। पार्टी विद अ डिफ्रेन्स बनने चले थे। पार्टी विद सीरियस डिफ्रेन्सेस बन के रह गये हैं।
((वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू न्यूज़ चैनल आईबीएन 7 के एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं।))
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बीजेपी की बर्बादी तय है। राजनाथ और आडवाणी… दोनों बीजेपी के भस्मासुर हैं। उसे ख़त्म करके ही दम लेंगे। पूरी पार्टी में जनाधार विहीन नेताओं को भर दिया है। सुषमा स्वराज एक विधानसभा का चुनाव नहीं जीत सकती। अरुण जेटली का हाल भी वैसा ही है। मुख़्तार अब्बास नक़वी भी बहुत बड़े कलाकार हैं। एक ऐसी माहिर टीम है जो पंचायत के चुनाव में मिल कर काम करे तो हार जाए। ऊपर से अहंकार इतना कि पूछो मत।
जैसी करनी वैसी भरनी