एक दिन में “हिंदुस्तान” की कई ग़लतियां
लेखक: जनतंत्र डेस्क | October 21, 2009 | पहरेदार | 5 Comments
20 अक्टूबर को हिंदुस्तान में डेस्क ने एक साथ कई बड़ी ग़लतियां की। सातवें और आठवें पन्ने पर एक ही ख़बर दो अलग-अलग शीर्षक के साथ प्रकाशित की गई। जबकि एक ख़बर का ऐसा हश्र हुआ है कि आप पढ़ कर कुछ भी नहीं समझ सकेंगे।
पहले पन्ने पर पीएफ घोटाले के मुख्य आरोपी आशुतोष अस्थाना की मौत से जुड़ी ख़बर प्रकाशित की गई है। बताया गया है कि डासना जेल में रहस्यमई हालत में हुई मौत की जांच के आदेश दे दिए गए हैं। इसी मामले में एक और ख़बर सातवें पन्ने पर छापी गई है। उसका शीर्षक है “अस्थाना कांड में जेल प्रशासन को क्लीन चिट”। चार कॉलम में छपी उस ख़बर में कई सबहेडिंग हैं। यही ख़बर आठवें पन्ने पर बदले हुए शीर्षक के साथ हू-ब-हू छापी गई है। यहां शीर्षक है “हार्टअटैक से हुई अस्थाना की मौत”।
आमतौर पर हिंदुस्तान के इंटरनेट संस्करण में ये ग़लतियां दूर कर दी जाती हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं किया गया। आप उस पर एक नज़र डालें।
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इसके अलावा 12वें पन्ने पर एक ख़बर छपी है।
हेडर – अंग्रेजी परिवेश के छात्रों का एकाधिकार स्थापित होगा।
नई दिल्ली (वि.सं.)। कपिल सिब्बल का यह अजीब और बेतुका फैसला है। यह ग्रामीण पृष्ठभूमि के प्रतिभाशाली बच्चों को आईआईटी जैसे प्रशिक्षिण संस्थानों से दूर रखने की साजिश है।
बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में हिंदी माध्यम से वहां की बोर्ड परीक्षाएं देने वालों बच्चों के लिए 80 प्रतिशत नंबर लाना आसान नहीं होता।
वहां सीबीएसई की तरह अफरात नंबर नहीं मिलते। गरीब बच्चों को आईआईटी कोचिंग देने के अपने इतने सालों के अनुभव के आधार पर कहता हूं कि द्वितीय और तृतीय श्रेणी से पास होने वाले ग्रामीण बच्चों ने भी आईआईटी की परीक्षाएं पास की हैं।
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इस ख़बर को पढ़ने से इतना समझ में आता है कि किसी रिपोर्टर ने आईआईटी की कोचिंग देने वाले किसी टीचर (पहले पन्ने पर मौजूद इशारे को समझे तो सुपर 30 चलाने वाले आनंद कुमार) से इंटरव्यू के आधार पर रिपोर्ट फाइल की गई है। डेस्क पर मौजूद गुर्गे ने एक तय जगह में फिट करने के लिए उस रिपोर्ट की ऐसी-तैसी कर दी है। अगर कोई पूरा अख़बार नहीं पढ़े और दिमाग पर जोर नहीं डाले तो उसे हिंदुस्तान की यह रिपोर्ट कपिल सिब्बल के फैसले की तरह ही बेतुकी लगेगी।
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शशि शेखर जी के हित में एक धड़ा काम करने लगा है। तर्क ये है कि लगातार ग़लतियां कराकर दिल्ली में बैठी एडोटोरियल टीम को नाकारा साबित कर दिया जाए। इससे एक साथ दो फायदे हो जाएंगे। पहला ये कि पुराने मृणाल ब्रांड लोग साफ हो जाएंगे और दूसरा ये कि शशि जी के लोगों को आने का रास्ता मिल जाएगा। बाबू…………..समझो इशारे
वाह ये हुई न बात। अपनी पूंछ बचाने के लिए नया तर्क गढ़ लिया। वैसे हिंदुस्तान में ग़लतियां दूसरे अख़बारों की तुलना में पहले भी ढेरों होती थी। यकीन नहीं हो तो इसी वेबसाइट पर ढूंढ कर देख लेना। ग़लतियों, साज़िशों के कई सबूत मिल जाएंगे। वैसे तुम हो कौन अमित? अपना थोड़ा परिचय दो।
bhaiya ab to kum ho hai.yahan to page ke page repeat ho jate the aur koi poochhtachh nahin hoti thee.bade dariyadil rahe hain mrinal pande aur pramod joshi kuchh khas logon ke mamle men.hindustan ko gandhari aur dhritrashtra nahin sampadak kee jarurat rahi hai.ab sampadak mile hain to dekhen hindustan kee fitrat badalti hai ya nahin.
ये बहुत गंभीर सब्जेक्ट है। इसलिए भी क्योंकि हिंदी के अखबारों की क्वालिटी शर्मनाक तरीके से खराब हो रही है। सारे अखबारों को लगता है मार्केटिंग से ही अखबार बिकता है। लेकिन नई दुनिया का जो आपके उदाहरण दिया वो आंखे खोल देने वाला है। पर जब सारा देश राम भरोसे हिंदू होटल की तर्ज पर चल रहा है तो मीडिया कैसे पीछे रहेगा।
हिंदूस्तान, नवभारत टाइम्स जैसे अखबार सिर्फ बड़े नाम रह गए हैं, बिना सोच के। सबसे दुखद तो ये है कि भास्कर, नई दुनिया जैसे अखबार भी कुछ नया करने के बजाए लकीर के फकीर बन गए हैं।
मैं आपको एक उदाहरण बताउं। कुछ साल पहले की बात है जबलपुर के दैनिक भास्कर के मशहूर संपादक ने एडिटोरियल लिखा जरा बानगी फरमाएं। हैडर था ‘भारत अमेरिका और ब्रिटेन से आगे निकला। फिर कहा गया कि सरकार की तमाम कोशिशों की वजह से भारत की जनसंख्या ग्रोथ 2.1 परसेंट पहुंच गई है। जबकि अपने आपको विकसित देश कहने वाले अमेरिका और ब्रिटेन एक परसेंट से कम की ग्रोथ के साथ फिसड्डी साबित हुए हैं। पूरे आर्टिकल में भारत की महानता की कहानी कही गई थी। दुर्घटनावश मैंने वो संपादकीय पढा और संपादक जी को बताया कि जनसंख्या ग्रोथ कम होना ही अच्छा पैमाना है। तब जाकर उन्हें समझ आई।
राकेश मेरा परिचय जानने से पहले अपने बारे में कुछ बताओ। वैसे इतना तय है कि तुम इंकलाब का झंडा लेकर आगे चलकर अपना नाम रौशन करने वालों की जमात में शामिल हो।