सवाल पत्रकारिता का और निजी हमले होने लगे
लेखक: जनतंत्र डेस्क | October 17, 2009 | हक़ की आवाज़ | 4 Comments
वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने एक सवाल उठाया। पत्रकारों के हितों से जुड़ा सवाल। तो लोग व्यक्तिगत हमलों पर उतर आए। हमारा हिंदी समाज ही कुछ ऐसा है। गंभीर से गंभीर सवाल उठाइए… लोग उस पर बहस करने की जगह आपके ही पीछे पड़ जाएंगे। खैर पुण्य प्रसून वाजपेयी ने ऐसे ही कुछ लोगों को जवाब दिया है। हम चाहते हैं कि जनतंत्र के पाठक भी उनके जवाब पर एक नज़र डालें। बॉक्स में वो टिप्पणियां भी छापी जा रही हैं जिन पर प्रसून ने जवाब लिखा है। - मॉडरेटर
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सवाल पत्रकारिता और पत्रकार का था और प्रतिक्रिया में मीडिया संस्थानों पर बात होने लगी। आलोक नंदन जी, आपसे यही आग्रह है कि एक बार पत्रकार हो जाइये तो समझ जायेंगे कि खबरों को पकड़ने की कुलबुलाहट क्या होती है? सवाल ममता बनर्जी का नहीं है। सवाल है उस सत्ता का जिसे ममता चुनौती दे भी रही है और खुद भी उसी सत्ता सरीखा व्यवहार करने लगी हैं। यहां ममता के बदले कोई और होता तो भी किसी पत्रकार के लिये फर्क नहीं पड़ता। और जहां तक रेप शब्द में आपको फिल्मी तत्व दिख रहा है तो यह आपका मानसिक दिवालियापन है। आपको एक बार शोमा और कोमलिका से बात करनी चाहिये……कि हकीकत में और क्या क्या कहा गया…और उन पर भरोसा करना तो सीखना ही होगा।
आलोक नंदन
विरोध ब्लाग पर विमल पांडे लिख रहें हैं—
1. क्या वाजपेयी जी को यह प्रेस की आजादी पर हमला इसलिए नहीं लग रहा है कि वह चैनल जी नेटवर्क की भागीदारी में ही चलता है? आकाश बांग्ला और जी बांग्ला ने मिल कर उस 24 घंटा चैनल की स्थापना की है जिसके पत्रकारों की आजादी पर कथित हमला हुआ है.उसके पत्रकार न तो दूध से धुले हैं और न ही हरिश्चंद्र की संतान.2. ममता के मना करने पर तमाम पत्रकार मौके से लौट गए. लेकिन सरकार और माकपा के भोंपू के तौर पर मशहूर 24 घंटा की ‘प्रखर और उत्साही’ महिला पत्रकार ममता का इंटरव्यू करने के लिए डटी रही. आखिर आधी रात को ऐसा क्या हो गया था जो उसके लिए ममता का इंटरव्यू जरूरी था? क्या कहीं कोई रेल हादसा हो गया था? शायद प्रसून जी ही इसका जवाब दे सकते हैं.
3. पत्रकारों से बात करने या न करने का फैसला संबंघित नेता या मंत्री पर निर्भर है.
वाजपेयी जी कैसे की जाये पत्रकारिता का प्रश्न उठाने के पहले जिन घटनाओं का आप हवाला दे रहे हैं वो विमल जी का काउंटर आलेख पढ़न के बाद गले नहीं उतर रहा है है।….महिला पत्रकार को यहां तक धमकी जा रही है कि तुम भाग जाओ नहीं तो तुम्हारा रेप करा दिया जाएगा, पूरा फिल्मी टाइप का मामला बना दिया है आपने…महिला पत्रकार ममता बनर्जी से प्रभावित थी, बचपन से ही। जब सारे पत्रकार समझाने के बाद चले गये तो यह डटी रही, इंटरव्यू करने के लिए….पत्रकारिता होती क्या है, रिर्पोटर बैठा झक मार रहा है तो इसका यह मतलब थोड़े ही है कि आधी रात को सनक में आकर मना करने के वावजूद व्यक्तिगत सीमाओं को तोड़ते हुये काम करे।
जहां तक व्यक्तिगत सीमा का सवाल है तो मुझे नहीं लगता कि किसी पत्रकार के लिये कोई खबर पकड़ने में कोई सीमा होती है। यहां महिला-पुरुष का अंतर भी नहीं करना चाहिये …पत्रकार पत्रकार होता है। जो बात प्रभाकर मणि तिवारी जी कहते कहते रुक रहे हैं….असल में उस सवाल को बड़े कैनवास पर उठाने की जरुरत है। कहीं मीडिया को पार्टियो में बांट कर पत्रकारिता पर अंकुश लगाने का खेल तो नहीं हो रहा है। तिवारी जी मीडिया सिर्फ बंगाल में ही नहीं बंटी है बल्कि दिल्ली और मुंबई में भी बंटी है….लेकिन वह बंटना संस्थानो या कहें मीडिया हाउसों की जरुरत है..कोई भी दिल्ली के किसी भी राष्ट्रीय न्यूज चैनलों को देखते हुये कह सकता है कि फलां न्यूज चैनल फलां राजनीतिक दल के लिये काम कर रहा है।
यह बंटना अंग्रेजी-हिन्दी दोनों में है। सवाल है कि पत्रकार भी बंटने लगे हैं जो पत्रकारिता के लिये खतरा है। लेकिन आपको यह मानना होगा कि कि न्यूज चैनलों से ज्यादा क्रेडिबिलिटी या विशवसनीयता कुछ एक पत्रकारों की है। और यह पत्रकार किसी भी न्यूज चैनलों की जरुरत हैं। मुद्दा यही है कि पत्रकार रहकर क्या किसी न्यूज चैनल में काम नहीं किया जा सकता है। मुझे लगता है कि किया जा सकता है….हां, मुश्किलें आयेंगी जरुर और यह भी तय हे कि आपके साथ पद का नहीं पत्रकार होने का तमगा जुड़ता चले जाये। लेकिन यह कह बचना कि फलां सीपीएम का है और फलां कांग्रेस या बीजेपी का है तो उसमें काम करने वाले सभी पत्रकार उसी सोच में ढले है…यह कहना बेमानी होगी।
प्रभाकर मणि तिवारी
वाजपेयी जी के लिखे पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. लेकिन मुझे लगता है कि उनको इस मामले की आधी-अधूरी जानकारी दी गई है. 24 घंटा तो सीपीएम का चैनल है ही, उसके पत्रकार को रात के एक बजे ममता के कानवाय का पीछा करने की मेरे ख्याल से कोई जरूरत नहीं थी. कोलकाता में भाषाई मीडिया सीधे तौर पर दो गुटों में बंटा है. या तो आप सीपीएम के साथ हैं या फिर उसके खिलाफ. और 24 घंटा पूरी तरह सीपीएम के साथ है. यहां रह कर ही इसे महसूस किया जा सकता है. जब यह घटना हुई तो मौके पर दूसरा कोई पत्रकार मौजूद नहीं था. इसे क्या मानें. क्या ममता की कथित बैठक की सूचना सिर्फ इसी चैनल के पास थी या फिर उसकी मंशा कुछ और थी. अगर यह हमला प्रेस की आजादी पर है तो कोलकाता में मीडिया चुप क्यों है…..यह समझना मुश्किल है.मुझे तो लगता है कि यह मामला उसे कहीं ज्यादा पेचीदा है जितना नजर आता है.
यहां बात शोमा दास और कोमलिका से आगे निकल रही है। राजनीतिक दल और राजनेताओं के अपने अपने तरीके होते है खुद के फ्रस्ट्रेशन को लेकर। नंदीग्राम के दौर में मैंने कानू सन्याल का इंटरव्यू दिखलाया और वामपंथी सोच के दिवालियेपन पर हमला किया तो सीपीएम माओवादी प्रभावित राजनीति को बल देने का आरोप पत्रकारो पर खुल्लमखुल्ला लगाने लगी और जब सिंगूर को लेकर ममता के विकास पर सवाल लगे तो वह बीजेपी के हाथो बिके होने का आरोप पत्रकारो पर लगाने लगी।
एनडीटीवी की मोनीदीपा से ममता ने कहा कि टाटा ने किसे कितने पैसे दिये हैं। यह अलग बात है कि जब सिंगूर से टाटा ने बोरिया बस्ता समेटा तो एनडीटीवी पर मोनादीपा की रिपोर्ट देखकर ममता खुश भी हुई होगी। लेकिन यहां सवाल उस राजनीति की है जो पहले संस्थानो को मुनाफे या धंधे के आधार पर बांटती है और उसके बाद उसमें काम करने वाला पत्रकार अपनी सारी क्रियटीविटी इसी में लगाना चाहता है कि वह भी संस्थान या मालिक से साथ खड़ा है। और अगर उसने सस्थान की लीक से हटकर स्टोरी कर दी तो या तो उसकी नौकरी चली जायेगी या फिर काम करने को नहीं मिलेगा। मुझे याद नहीं आता कि किसी पत्रकार को किसी संस्थान से बीते एक दशक में जब से न्यूज चैनल आये है, इसलिये निकाल दिया गया हो कि उसने मीडिया हाउस के राजनीतिक लाभ वाली सोच के खिलाफ स्टोरी की हो। जबकि राजनीतिक तौर पर जुडे मीडिया हाउसों में उनकी राजनीति सोच के उलट खबर करने वाले पत्रकारों को मैंने आगे बढ़ते और ज्यादा मान्यता पाते अक्सर देखा है।
दिनेशराय द्विवेदी
इस देश को तानाशाही का लगातार खतरा बना हुआ है उस का मूल वर्तमान पूंजीवाद का संकट है। जनतांत्रिक मूल्यों का लगातार पतन हो रहा है। भाजपा आज सत्ता से बाहर है और कमजोर है। वह सत्ता में होती है तो वह भी यही करती है।
हां, दिनेश राय द्बिवेदी ने जो टिप्पणी कि की जो सत्ता में होता है वही तानाशाह हो जाता है…. इस दौर का यह सच जरुर है इसलिये ममता को अगर लग रहा है कि बंगाल की कुर्सी उस मिल सकती है तो वह भी उसी तानाशाही रुख को अख्तियार कर रही है जो सीपीएम ने कर रखी है। लेकिन इस तानाशाही में पत्रकार अगर एकजुट रहे और ना बंटे तो मुझे नहीं लगता कि सत्ता की मद किसी में इतना गुमान भर दें कि वह जो चाहे सो कहे या कर लें।
((यह लेख पुण्य प्रसून वाजपेयी के ब्लॉग से साभार लिया गया है। इन दिनों वो देश के पहले न्यूज़ चैनल ज़ी न्यूज़ को बतौर प्राइम टाइम एंकर और एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।))
((ऊपर छपा कार्टून आउटलुक से साभार))
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patrakar ke kalam par jab caste rhega tab samachar nispakch nahi hoga ajj adhiktar patrakaro ke yahi estithi hai samachar patro ya electronic media mai adhiktar forwad cast ke usme brammins sabse adhik inke dwara garibo ki bat ko tarji nahi di jati sirf apne hito ki rakch karta hai jab patrakar apni mul duty se hatega tab unko to khamiaja vugatnaparegahi des ke jantantra bhi khatra mai parega
निहोरा जी, (अगर आपको ठीक पहचान पा रहा हूं तो) आपको यहां देख कर बहुत खुशी हो रही है। आप मुझे नहीं जानते होंगे। लेकिन बिहार के करोडो लोगों की तरह मै आपसे परिचित हूं। आपके इस कमेंट के बारे में मेरे एक साथी ने फोन कर बताया ।
आप जैसे बिहार के एक प्रमुख राजनेता इतनी साफ तौर पर अपनी बात कह रहे हैं तो उम्मीद की जानी चाहिए कि स्थिति जल्दी ही बदलेगी। आपकी स्पष्टवादिता को सलाम ।
लेकिन साथ ही यह भी कहूंगा कि आपकी पार्टी जदयू ने जिस तरह से बिहार में भूमिहार राज ला दिया है, उसका खामियाजा इस चुनाव में तो आप लोग भुगत ही चुके हैं, अगले विधान सभा चुनाव में भी भुगतेंगे।
मैं यह बात आपको नाराज करने के लिए नहीं कह रहा हूं। बल्कि आप ही की बात को आगे बढा रहा हूं। आपने बहुत सही कहा है पत्रकार जब अपनी मूल ड्यूटी से हटेंगे, पत्रकारिता में फारवर्ड कास्ट के लोग भरे रहेंगे तो उनको इसका खामियाजा भुगतना ही पडेगा। जनतंत्र भी खतरे में रहेगा।
यही बात बिहार की राजनीति में पहले लालू प्रसाद पर लागू हुई और अब आपकी पार्टी और नीतीश कुमार की राजनीति पर भी लागू होगी।
जब आप राजद में थे तो आपके आंकडों पर आधारित बयान बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया करते थे। उम्मीद करता हूं अब आपके हस्तक्षेप इंटरनेट के पाठकों को भी बहुत फायदा होगा।
-अमर सहनी, पटना
आदरणीय वाजपेयी जी, पत्रकार और पत्रकारिता को सही तरीके से परभाषित किये बिना एक पत्रकार होने के अर्थ को नहीं समझा जा सकता है। और पिछले कुछ वर्षों में पत्रकार और पत्रकारिता के जो रूप प्रकट हुये हैं उन्हें देखकर तो पत्रकार और पत्रकारिता को लेकर कोई सटीक परिभाषा निकाल पाना शायद एक कठिन और जोखिम भरा कार्य है। आप खबरों को पकड़ पाने की कुलबुलाहट की बात कर रहे हैं, शायद यह एक पत्रकार का अंदरूनी मनोवेग है। यदि इस मनोवेग को ही आधार मानकर पत्रकार और पत्रकारिता की परिभाषा खड़ी करने की कोशिश करते हैं तो निसंदेह यह और भी घातक है। खबरो को पकड़ने की कुलबुलाहट किसी भी पत्रकार को किसी के निजी जिंदगी में घुसने की इजाजत नहीं देता है। यदि आप सार्वजनिक हित के लिए किसी के निजी जीवन में घुस रहे हैं तो यह सिद्ध् करना ही होगा कि वाकई में आप जिसे सार्वजनिक हित समझ रहे हैं वो है भी या नहीं।
यदि ममता बनर्जी आधी रात को किसी पत्रकार से मिलने से इनकार करती हैं तो वह किस सत्ता को चुनौती दे रही हैं ? ममता बनर्जी को नहीं बल्कि इस देश के किसी भी व्यक्ति को पूरा हक है कि वह अपना निजी समय अपने तरीके से बेरोक टोक कहीं भी बिताये। और चूंकि वह एक सार्जनिक व्यक्तित्व हैं, ऐसे में उनके सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाना मशीनरी का एक हिस्सा है। मना करने के बावजूद यदि तथा उम्दा पत्रकारिता के नाम पर कोई व्यक्ति उस सुरक्षा तंत्र को भेदने की कोशिश करता है तो निसंदेह उसके खिलाफ सहज मामला बनता है। पत्रकारिता के नाम पर बहुत मनमानी हो चुका है, और वीआईपी लोगों की हत्याएं भी हुई हैं। रेप के संबंध में महिला पत्रकार जो कह रही हैं वह पूरी तरह से एक तरफा भी तो हो सकता है, यह सहज ज्ञान की बात है कि सिस्टम चलाने वाला कोई भी व्यक्ति किसी महिला पत्रकार को रेप कराने की धमकी नहीं दे सकता है। खबरों की कलुबुलहाट के कारण खुद खबर मे आने के लिए और अपने पक्ष को और मजबूती प्रदान करने के लिए बड़ी सहजता से कोई भी महिला पत्रकार यह बात कह सकती है। और थोड़ा सा इमोशन के साथ कहेगी तो उसका प्रभाव ज्यादा पड़ेगा, और उसमें थोड़ा इमोशन मिला के सधे हुये हाथों से लिखे दिया जाये तो उसकी विश्वसनीयता और बढ़ जाती है। आप शंका को मानसिक दिवालियापन करार दे रहे हैं, लेकिन मुझे लगता है कि असल पत्रकारिता शंका से शुरु होती है। आंख बंद करके किसी पर यकीन करने से पत्रकारिता अंधी हो जाएगी,चाहे वह महिला पत्रकार क्यों न हो। आपने सही कहा कहा है कि पत्रकारिता को लिंग के दायरे में बांधना उचित नहीं है, लेकिन क्या किसी पुरुष पत्रकार को यह धमकी दिया जा सकता है कि उसके साथ रेप करा दिया जाएगा? या फिर कोई पुरुष पत्रकार यह कहानी गढ़ सकता है कि उसे खबरो को कवर करने के दौरान रेप करने की धमकी दी गई है ? खबरों को पकड़ने की कुलबुलाहट अच्छी चीज है, लेकिन खबर पकड़ में न आने पर बिना बात के उसे खबर बनाकर खेलना, और उस नजरिये को स्थापित करना पत्रकार और मीडिया हाउसों के हित में तो सकता है, लेकिन पत्रकारिता के हित में नहीं। संवाद के सिलसिला को आपने आगे बढ़ाया, इससे पत्रकारिता के अच्छे भविष्य के प्रति उम्मीद जरूर जगी है।
आलोक नंदन
माडरेटर जनतंत्र, जिस तरह से आपने इंट्रो में हिंदी समाज की मानसिकता का जिक्र किया है, वह एक बार फिर अप्रत्यक्षरूप से यही सवाल उठा रहा है निजी हित और सार्वजनिक हित के बीच की लकीर क्या है। पत्रकार का ठप्पा लगाकर आप किसी के निजी जीवन में कितना घुस सकते हैं ?? भारतीय संविधान में अलग से पत्र या पत्रकारों को कोई छूट नहीं दिया गया है, लेकिन अपनी प्रखरता से इसने लोकतंत्र के चौथे खंभे का दर्जा पाया है। इस चौथे खंभे को तंदरुस्त रखने के लिए यह जरूरी है कि इसकी मजबूती और टिकाऊपन का मूल्यांकन होता रहे। वैसे आप इंट्रो अच्छा लिख लेते हैं, कभी कोशिश कीजिएगा कि तराजू का बैलेंस बरकार रख के इंट्रो लिखने की।