तो “हिंदुस्तान” को चाहिए अलग “रुहेलखंड”

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  October 10, 2009  |  पहरेदार   |   Comments Off

आज से हिंदुस्तान का बरेली संस्करण शुरू हो गया है। आज के दौर में अख़बारों से आंदोलन की उम्मीद नहीं की जाती। वो सूचना देने से अधिक मनोरंजन के साधन हैं। कोई भी अख़बार अपना नया संस्करण विस्तार की योजना और मुनाफ़े को ध्यान में रख कर शुरू करता है। लेकिन हिंदुस्तान के प्रधान संपादक की माने तो बरेली संस्करण को लॉन्च करने के पीछे एक और लक्ष्य है। उत्तर प्रदेश में अलग रुहेलखंड के स्वरों को मजबूती देने का लक्ष्य। हो सकता है कि मार्केटिंग स्ट्रेटेजी के तहत पाठकों की संवेदनाओं के साथ खुद को जोड़ने के लिए यह नारा बुलंद किया गया हो, लेकिन इससे कई सवाल उठते हैं। आप हिंदुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर का लेख पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। - मॉडरेटर

सवाल उठता है – बरेली से क्यों? एक राष्ट्रीय माने जाने वाले अखबार को यहां से अपना समूचा संस्करण निकालने की जरूरत क्यों महसूस हुई? मैं इसे सवाल नहीं बल्कि भ्रांति कहना चाहूंगा। “हिन्दुस्तान” ऐसा अखबार है जो खांटी हिन्दी भाषी लोगों की जिन्दगी में रचता-रमता रहा है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि असली भारत आज भी छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में बसता है। यहीं से हमारी आदिम आकांक्षाएं हमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चमकने और चहकने का रास्ता सुझाती हैं। पूरी दुनिया में अपना डंका बजाने वाली तमाम हस्तियों पर इस माटी के दूध और पानी का कर्ज है। उनके विचारों ने यहीं से अंगड़ाई लेनी शुरू की थी। हिंदी बोलने-समझने वालों को संख्या और समझ के मामले में किसी से कमतर आंकना नादानी होगी। बरेली से अखबार निकालने का फ़ैसला करते वक़्त हमारे मन में पहला ख़्याल यही था कि रुहेलों की इस सरजमीं की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यहां पर देश की गंगा-यमुनी तहजीब सच्चे अर्थों में सांसें लेती है। पूरे देश में हिन्दू-मुस्लिम-सिखों के गांव इतनी सहजता से कहीं और नहीं बसते। हिमालय से निकलने वाली नदियां रुहेलखण्ड में आकर अपना गर्जन-तर्जन छोड़कर शांत और जीवनदायिनी स्वरूप शायद इसीलिए धारण कर लेती हैं।

पर सिर्फ़ सहअस्तित्व, शांति, धीरता और वीरता से ही हम 21वीं शताब्दी की जरूरतों पर खरा नहीं उतरते। यह समय बहुत तेजी से बढ़ने का है। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि रुहेलखण्ड को वह दर्जा हासिल नहीं हुआ जो होना चाहिए था। इसकी तमाम वजहें हैं। उत्तर प्रदेश की विशालता में तीन अंतरधाराएं हमेशा बहती थीं। कभी पूरब का नारा तो कभी पश्चिम का उदघोष तो कभी पहाड़ को न्याय का निनाद। बीच-बीच में अलग रुहेलखण्ड की मांग उठी, पर सियासी नक्कारखाने में उसकी स्थिति तूती से ज्यादा कभी नहीं बनी। “हिन्दुस्तान” का मकसद रहा है, अपने पाठकों को अपना हक पाने में मदद देना। हम वादा करते हैं कि आज से आपके साथ एक ऐसा अखबार होगा जिसके पास पूरी दुनिया में हो रहे बदलाव की नब्ज होगी और “ग्लोबल विलेज” में आपको पूरी ताकत से प्रतिष्ठापित करने की प्रतिज्ञापूर्ण जिम्मेदारी भी। भरोसा रखें इस देश के दस शीर्षस्थ अखबारों में सबसे तेजी से बढ़ते समाचारपत्र का आपसे यह वादा है।

बिहार, झारखण्ड, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और उत्तराखण्ड के बाद “हिन्दुस्तान” ने उत्तर प्रदेश की सरजमीं की सेवा का जो संकल्प लिया है उसके परिणाम आशातीत रहे हैं। “हिन्दुस्तान” के भरे-पूरे परिवार में हर रोज केवल उत्तर प्रदेश से 13,666 नए सदस्यों का इजाफा हो रहा है। ऐसा तभी होता है जब अखबार आम आदमी की जिंदगी का कभी जुदा न होने वाला हिस्सा बन जाए।

एक बात और। “हिन्दुस्तान” का मकसद उमंगों से उबलते किशोरों और युवाओं को उनकी मंजिल तक पहुंचाना है। यह हिन्दी का अकेला अखबार है जो खुद को नई पीढ़ी की तैयारी का प्लेटफार्म मानता है। “तैयारी” एक शिक्षित और समृद्ध भारत की नींव रख रही है। यह अखबार सपने नहीं दिखाता बल्कि सपने देखने वालों को मंजिल पाने के लिए रास्ता दिखाने और बनाने का काम करता है। यही वजह है कि बरेली में अखबार के लोकार्पण के लिए हमने राजनेताओं, ग्लैमरस लोगों या महानुभावों की फौज नहीं बुलाई। हमने उन बच्चों को यह जिम्मेदारी सौंपी जिन पर आने वाले दिनों का दायित्व है। चीन की कहावत है, हजार मील की यात्रा की शुरुआत एक नन्हें कदम से होती है। हमारे आपके साझे सफर का यह शुरुआती शुभ दिन है।

इन्हें भी पढ़ें:

  • Share/Save/Bookmark

और ये कुछ मिलता-जुलता:

Comments are closed.