बड़ी ग़लतियों पर भी माफ़ी नहीं मांगते हिंदी अख़बार
लेखक: जनतंत्र डेस्क | October 7, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 2 Comments
इन दिनों हिंदी अख़बारों में सामूहिक ब्लंडर की बड़ी चर्चा है। मोहल्ला लाइव पर आबकारी बिल के तथ्यों को किस तरह तोड़ मरोड़ कर हिंदी अख़बारों ने पेश किया है। उन्होंने बताया है कि सार्वजनिक जगह पर दारू पीते पकड़े जाने पर 50 हज़ार रुपये का जुर्माना भरना पड़ेगा। जबकि ऐसा है नहीं। यह ग़लती हिंदी के ज़्यादातर बड़े अख़बारों ने की है, जैसे उनके संवाददाताओं ने एक ही जगह बैठ कर रिपोर्ट लिखी हो और बाद में शाब्दिक हेर-फेर के बाद सभी जगह छाप दी गई हो।
यह कोई पहला मौका नहीं है जब हिंदी के बड़े अख़बारों ने सामूहिक ग़लती की हो। इस महीने जनतंत्र पर हमने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। हिंदुस्तान के पहले पन्ने से गोल नरसंहार, पुलिस से 10 हाथ आगे अख़बार। यह रिपोर्ट खगड़िया में अमौसी नरसंहार के अगले दिन हिंदी अख़बारों की कवरेज पर आधारित थी। उसमें बताया गया था कि किस तरह पुलिस की तीन दलीलों में सिर्फ़ एक दलील को अख़बारों ने पकड़ कर रिपोर्टिंग की। दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान समेत ज़्यादातर अख़बारों ने पांच किशोरों समेत 16 लोगों की हत्या के लिए सीधे और सीधे तौर पर नक्सलियों को ज़िम्मेदार ठहरा दिया। दैनिक जागरण ने तो यहां तक लिखा कि “अमौसी की धरती को नक्सलियों ने 16 निर्दोष लोगों के लहू से लाल कर दिया है।”
उसी जातीय नरसंहार की रिपोर्टिंग अंग्रेजी अख़बारों में संतुलित तरीके से की गई थी। सबने जांच एजेंसियों की सही लाइन को पकड़ते हुए बताया था कि इस हमले में नक्सलियों का हाथ हो सकता है। द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस समेत ज़्यादातर अंग्रेजी अख़बारों ने होने और हो सकने के फर्क को समझा और अपनी तरफ से तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर वारदात को अधिक सनसनीखेज बनाने की कोशिश नहीं की।
वारदात के दो दिन बाद राज्य सरकार ने भी यह साफ कर दिया कि उस हमले में नक्सलियों का हाथ नहीं है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद यह बयान जारी किया। फिर भी अख़बारों ने अपनी ग़लती कबूल नहीं की। हिंदी के अख़बार ऐसा अक्सर करते हैं। वो ख़बरों को सनसनीखेज बनाने में लगे रहते हैं। उस कोशिश में ख़बर उलट-पुलट जाए तो भी कोई बात नहीं।

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आज की पत्रकारिता की हकीकत यह है कि कोई काम नहीं करना चाहता है. ज्यादातर रिपोर्टर अपने निर्धारित अड्डों से बाहर निकलना नहीं चाहते सभी एक जगह बैठ कर सेटिंग में व्यस्त रहते हैं. रही बात फील्ड की तो जो न्युकमर होते हैं उन्हें दौड़ा दिया जाता है. वो बेचारे जो देखते समझते हैं उसे बता देते है. जिन्हें ये तथाकथित सीनियर रिपोर्टर सजा देते है. यह खबर सभी रिपोर्टरों को एक साथ मिलती है क्योंकि अखबार का दबाव होता है और मिसिंग पर सुनना पड़ता है इसलिये रिपोर्टरों में गैरलिखित समझौता डेवलप हो गया है कि कोई मिसिंग नहीं होगी इससे खबर गलत या सही सभी अखबारों (हिन्दी के)दिख जाती है. ज्यादातर यह मामले क्राइम बीट पर ही मिलेगे.
हिन्दी के अखबारों में गलत खबरें छपने के कई कारण हैं। इनमें सबसे बड़ा और प्रमुख कारण है अक्षम और अयोग्य लोगों के कंधों पर रिपोर्टिंग की भारी जिम्मेदारी लाद देना और फिर उन्हें साधन-सुविधाएं तो दूर, सामान्य वेतन (न्यूनतम मजदूरी) भी न दिया जाना। अब चूंकि पैसे मिलते ही नहीं हैं या न के बराबर मिलते हैं इसलिए नौकरी जाने का कोई खतरा नहीं रहता है। दूसरी ओर, कार्रवाई करने वाला भी सारी स्थितियों को जानता-समझता है सो क्या करे।
ऐसे में गलती करने वाले की हिम्मत बढ़ती जाती है और वह बेशर्म भी हो जाता है। अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले हिन्दी के अखबारों में जोखिम भी खूब लिए जाते हैं। दूसरी ओर एक्सपर्टीज का ख्याल रखने का रिवाज नहीं के बराबर है। हिन्दी अखबारों में रिपोर्टिंग असाइनमेंट कई बार हंस चुगेगा दाना-तिनका कौवा मोती खाएगा जैसा होता है। ऐसे में जिस रिपोर्टिंग में जिसे भेजा जाना चाहिए उसे नहीं भेजा जाएगा तो भी गलतियां होंगी। इसका एक कारण यह भी है कि हिन्दी के संपादकों के पास देने के लिए कुछ होता है नहीं सो वे चमचों को खुश करने के लिए विरोधियों को पीड़ित, दुखी और कुंठित करके भी काम चलाते हैं।
इसके अलावा गलतियों का एक और कारण है अनुवाद। ज्यादातर हिन्दी अखबारों के रिपोर्टर अनुवाद से भागते हैं, घबड़ाते हैं या उनका हाथ अनुवाद या यूं कहिए अंग्रेजी में ही तंग होता है। बिना पैसे के काम करने वाले कई रिपोर्टर अंग्रेजी की कॉपी को वैसे ही समझते हैं जैसे अंधा हाथी को। ऐसे में मूल रूप में अंग्रेजी में आई खबर का एजेंसी का अनुवाद बहुत मददगार होता है। पर अगर एजेंसी में किसी साथी ने गलत अनुवाद कर दिया है तो सभी अखबारों में गलत ही छपेगा। और ऐसा अक्सर होता है। अब चूंकि गलती सभी ने की है तो माफी कोई एक क्यों मांगे।