क्या बचेगी हिंदी? जानिए संपादकों की राय

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  September 25, 2009  |  देश-दुनिया   |   1 Comment

नई दिल्ली, 24 सितंबर।

हिंदी के भविष्य को लेकर देश के कुछ संपादक चिंतित हैं तो कुछ उम्मीदों से भरे हुए हैं. संपादकों की राय में हिंदी के भविष्य को लेकर रुदन करने के बजाय उन चुनौतियों से निपटने और मौजूदा समय की ज़रूरतों के अनुसार हिंदी को तैयार करने की आवश्यकता है. ये राय भारतीय जनसंचार संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में ‘हिंदी का भविष्य बनाम भविष्य की हिंदी’ विषय पर हुई गोष्ठी में सामने आई. गोष्ठी में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के वरिष्ठ संपादकों ने हिस्सा लिया.

गोष्ठी का बीज वक्तव्य रखते हुए सीएनईबी के सीईओ और प्रधान संपादक राहुल देव ने हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं के भविष्य को लेकर गहरी चिंता जताई। उनका कहना था कि 2050 तक सारा भारत लिखने, पढ़ने जैसे सारे गंभीर काम अंग्रेज़ी में कर रहा होगा। इससे देसी भाषाओं का अस्तित्व ख़तरे में पड़ जाएगा और भारत की सांस्कृतिक पहचान भी नहीं बचेगी. राहुल देव के मुताबिक़ ऐसे हालात में हम सिर्फ़ अमेरिकन क्लोन बनकर रह जाएंगे.

नई दुनिया के राष्ट्रीय संपादक मधुसूदन आनंद ने राहुल देव की राय को निराशाजनक बताते हुए कहा कि हिंदी समेत दूसरी भारतीय भाषाओं के अख़बार और समाचार चैनलों के पाठक-दर्शक लगातार बढ़ रहे हैं. बदलते समय और तकनीक के साथ हिंदी को भी बदलना होगा. उन्होंने कहा कि कोई भी भाषा बदलते हुए समय के साथ नहीं बदलती है तो उसे मरने से कोई नहीं बचा सकता है. मधुसूदन आनंद ने कहा कि अच्छी बात ये है कि हिंदी लगातार बदल रही है और बिना किसी दुराव के सभी भाषाओँ से शब्द लेकर अपने को समृद्ध कर रही है.

इस अवसर पर दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग ने कहा कि भविष्य में सरल और समझ में आने वाली हिंदी ही चलेगी। उन्होंने कहा कि कुछ शब्द ख़त्म होंगे और उनकी जगह नए शब्द आएंगे लेकिन हमारे यहां अंग्रेजी का वर्चस्व नहीं हो पाएगा। श्रवण गर्ग ने कहा कि भारत जैसे बहुभाषी देश में हर व्यक्ति को कई भाषाएं आनी चाहिए और भाषाओं के बीच आदान-प्रदान से उनकी ताक़त बढ़ती है.

आजतक के समाचार निदेशक क़मर वहीद नक़वी ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि भाषाओं में बदलाव और शब्दों का लेन-देन स्वाभाविक है। हर भाषा किसी समाज और उसके संस्कारों से गहराई से जुड़ी होती है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इसीलिए भाषा में बदलाव ऐसे नहीं होने चाहिए जो उसके बुनियादी संस्कारों को ही ख़त्म कर दें। उन्होंने अच्छी भाषा की ख़ासियत बताते हुए कहा कि वह पानी की तरह होनी चाहिए, जिसे जिस बर्तन में रखा जाए, उसी का रूप ले ले. उन्होंने कहा कि भाषा को सामयिक बनाने के नाम पर उसमें दूसरी भाषाओं के शब्दों को ठूंसना किसी तरह से ठीक नहीं है. क़मर वहीद नक़वी ने “हिंग्लिश” की चर्चा करते हुए कहा कि इससे भाषा की आत्मा मर जाती है.

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रो. के एम श्रीवास्तव ने कहा कि हिंदी के भविष्य को लेकर सभी तरह के विचार हमारे सामने हैं, निर्णय हमें करना है. गोष्ठी का संचालन हिंदी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. आनंद प्रधान ने किया।

((आईआईएमसी की तरफ़ से जारी प्रेस रिलीज))

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Comments

One Response to “क्या बचेगी हिंदी? जानिए संपादकों की राय”
  1. Prakash says:

    राहुल देव सठिया गए हैं… जरा गौर से सुनिए उनकी हिंदी .. जिस तरीके से वो हिंदी का इस्तेमाल करते हैं उससे तो वाकई हिंदी मर जाएगी… भाषा का विस्तार तभी हो सकता है जब उसमें दूसरी भाषाओं के शब्दों को समाहित करें, और जहां तक बात राहुल देव की है तो वो खुद अंग्रेजी के पत्रकार रहे हैं… वहां जब दाल नहीं गली तो हिंदी का दामन थाम लिया और अब बजाए हिंदी को विकसित करने के उसे गरिया रहे हैं… ऐसे छद्मवेशी पत्रकारों से आपलोग लोगों को बचाइए भाई … मधुसूदन आनंद का कहना बिल्कुल सही है हमें चिंतित होने की बिल्कुल जरुरत नहीं है … कुछ लोग सिर्फ इस नाम पर अपनी दुकान चला रहे हैं कि हिंदी खत्म हो रही है.. हिंदी कोई बुलबुला है… घबराने की कोई जरुरत नहीं…