नई दुनिया का मतलब राष्ट्रपति भवन का भोंपू !
लेखक: जनतंत्र डेस्क | September 25, 2009 | पहरेदार | Comments Off
संबंध निजी होते हैं और संबंधों को हर कोई निभाता है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति किसी संस्थान के शीर्ष पर बैठा हो और वो उस संस्थान को निजी संबंधों को साधने का जरिया मात्र बना दे तो यह किसी के लिए अच्छा नहीं। न खुद उस व्यक्ति के लिए और न ही संस्थान के लिए। लेकिन लगता है कि नई दुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहता इन दिनों कुछ ऐसी ही मुहिम में जुटे हैं, जिससे उनके प्रति सम्मान पूरी तरह ख़त्म हो रहा है। उन्होंने नई दुनिया को राष्ट्रपति भवन का भोंपू जैसा बना दिया है। अमूमन हर दूसरे दिन पहले पन्ने पर राष्ट्रपति और उनके परिवार से जुड़ी कोई न कोई ख़बर या फिर तस्वीर ज़रूर होती है।
नई दुनिया में गुरुवार को भी यही तमाशा हुआ। देश के ज़्यादातर अंग्रेजी-हिंदी अख़बारों ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बेटे राजेंद्र सिंह शेखावत को कांग्रेस की तरफ से टिकट दिए जाने की ख़बर पहले पन्ने पर छापी है। कुछ ने उस ख़बर को भीतरी पन्नों पर जगह दी है। ख़बर की जगह भले ही अलग-अलग है, लेकिन उस रिपोर्ट को पूरी तरह बैलेंस बनाने की कोशिश की गई है।

नई दुनिया में छपी रिपोर्ट
नई दुनिया के पहले पन्ने पर कांग्रेस की लिस्ट से जुड़ी दो ख़बरें छापी गई हैं। पहली ख़बर में बताया गया है कि महाराष्ट्र और हरियाणा के लिए कांग्रेस ने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। उसमें राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पुत्र राजेंद्र सिंह शेखावत को टिकट दिये जाने का जिक्र है। उस रिपोर्ट में सुनील देशमुख के बारे में बस एक पंक्ति है। कहा गया है कि इससे नाराज़ अमरावती के विधायक सुनील देशमुख ने बग़ावत कर दी है। ग्यारवें पन्ने पर महाराष्ट्र की सूची के बारे में अलग से एक विस्तृत रिपोर्ट छापी गई है। लेकिन वहां भी सुनील देशमुख के बस एक आरोप जिक्र है। वह यह कि देवी सिंह शेखावत बस अपने बच्चे के बारे में सोच रहे हैं। इसके अलावा देशमुख की दूसरी बातें गोल कर दी गई हैं।
हो सकता है कि यह नई दुनिया की रिपोर्टिंग का तरीका हो। लेकिन पहले पन्ने पर मौजूद इसी मुद्दे पर एक और रिपोर्ट कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। विनोद अग्निहोत्री की इस रिपोर्ट का शीर्षक है – राष्ट्रपति गिरि के पुत्र भी लड़ चुके हैं चुनाव। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि राष्ट्रपति वीवी गिरि के पुत्र वी शंकर गिरि भी उनके कार्यकाल के दौरान ही 1971 में चुनाव लड़ चुके हैं। फिर प्रतिभा पाटिल के बेटे को टिकट दिया गया है तो मीडिया इतना हंगामा क्यों मचा रहा है? वह रिपोर्ट वी शंकर गिरि के पुत्र अमरनाथ गिरि से बातचीत के आधार पर तैयार की गई है। उसमें अमरनाथ गिरि के हवाले से कहा गया है कि राष्ट्रपति के बच्चे भी इसी देश के नागरिक हैं और उन्हें भी पूरा हक़ है कि वो चुनाव लड़ें।
यहां आलोक मेहता से पूछना चाहिए कि अगर प्रतिभा पाटिल के बेटे के समर्थन में इतना अधिक स्पेस दिया जा सकता है तो फिर सुनील देशमुख के आरोप क्यों नहीं छापे गए? कायदे से होना तो यह चाहिए था कि अमरनाथ गिरि के इंटरव्यू के बगल में सुनील देशमुख का भी इंटरव्यू छापा जाता। लेकिन सुनील देशमुख की बातों पर सेंसर की कैंची चला दी गई। ऐसा करके आलोक मेहता ने पत्रकारिता का कौन सा धर्म निभाया है? आलोक मेहता से यह भी पूछना चाहिए कि जिस तरह उन्होंने प्रतिभा पाटिल के बेटे के समर्थन में हवा बनाने की कोशिश की है, क्या उनका यह अख़बार कांग्रेस से लेकर तमाम छोटे-बड़े दलों में चल रहे वंशवाद को ठीक उसी तरह जायज ठहराएगा? जब दूसरे नेताओं और पार्टियों के वंशवाद पर सवाल उठेंगे तो क्या नई दुनिया में इसी तरह ख़बरें प्रकाशित की जाएंगी?
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