“मोदी”गान के जरिए आलोक मेहता बना रहे हैं “नई दुनिया”!
लेखक: जनतंत्र डेस्क | September 21, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 5 Comments
बड़ा पत्रकार होने के लिए बड़ा दिल चाहिए। आलोक मेहता के जितना बड़ा दिल। वो एक ही साथ कांग्रेस और बीजेपी दोनों की तारीफ कर सकते हैं। प्रतिभा पाटिल की शान में कसीदे पढ़ने के साथ नरेंद्र मोदी को भी साध सकते हैं। यह बहुत बड़ा हुनर हैं। और आलोक मेहता जैसे कई बड़े पत्रकार इस हुनर में माहिर हैं। आलोक मेहता ने अपने इसी हुनर का ताज़ा उदाहरण एक दिन पहले दिया है। उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को उदारवादी और अल्पसंख्यक प्रेमी करार दिया है।
रविवार को नई दुनिया में छपे अपने स्तंभ में आलोक मेहता ने बताया है कि हाल में गुजरात विधानसभा की सात सीटों पर हुए उपचुनाव में पांच पर बीजेपी को कामयाबी नरेंद्र मोदी की उदार नीतियों के कारण मिली है। उनके अल्पसंख्यक प्रेम ने उनकी छवि बदल दी है और अब गुजरात के मुसलमान भी नए नरेंद्र मोदी को गले लगा रहे हैं। आगे बढ़ने से पहले आप आलोक मेहता उवाच पर एक नज़र डालें। –
“हिंदुत्व का उदार-व्यावहारिक रास्ता अपनाए बिना भारत में कोई दल, संगठन या नेता सफलता नहीं पा सकता। गुजरात में पिछले दिनों हुए उपचुनावों में सफलता के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या विश्व हिंदू परिषद अपने कट्टर हिंदुत्व को स्वीकारने की गलतफहमी पाल सकते हैं लेकिन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं मान सकते। उन्हें समझ में आ गया है कि उदार दृष्टिकोण और अल्पसंख्यकों के बीच विश्वास अर्जित करने से ही बहुसंख्यक प्रसन्न और संतुष्ट होंगे। आडवाणी या जसवंत सिंह के “जिन्ना प्रेम” से अल्पसंख्यक कतई प्रभावित नहीं हो सकते। लेकिन नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद सहित गुजरात के अन्य शहरों में पिछले एक वर्ष में अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा की मुहिम चलाई जिससे चुनावों में उन्हें अनुकूल समर्थन मिला। महाराष्ट्र में शिवसेना के कट्टर हिंदुत्व और संकीर्ण क्षेत्रवाद को व्यापक जन-समर्थन नहीं मिल सकता। नफ़रत के बीज बोकर कोई संगठन फहलाद वृश्र नहीं लगा सकता। गंगा या यमुना के जल में ज़हर मिलाने या विशाल नागराज उतार देने को भोली-भाली लेकिन उदार जनता कभी बर्दाश्त नहीं करती।”
आपने आलोक मेहता का मोदी गान पढ़ा। इसका मतलब यही निकलता है कि आडवाणी और जसवंत से नरेंद्र मोदी अलग हैं। आरएसएस और वीएचपी से भी नरेंद्र मोदी अलग हैं। आडवाणी और जसवंत छद्म धर्मनिरपेक्ष बने हैं। आरएसएस और वीएचपी कट्टरपंथी हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी का हृदय परिवर्तित हो गया है। जिसके कार्यकाल में मुसलमानों का नरसंहार किया गया… हजारों बेकसूरों के क़त्लेआम के बाद जिसका राज तिलक किया गया। गुजरात का वही मुखिया अब बहुजन हिताय का नारा बुलंद कर रहा है!! अंगुलीमार से बुद्ध की राह पर चल पड़ा है!! आज गुजरात के मुसलमानों ने उसे स्वीकार किया है कल पूरे देश की जनता उसे स्वीकारेगी!!
नरेंद्र मोदी को महान साबित करने का यह कमाल आलोक मेहता जैसा पत्रकार ही कर सकता है। इसके लिए गजब की फ्लैक्सिबिलिटी (लचीलापन) चाहिए। वैचारिक धरातल पर लिजलिजापन चाहिए। वरना कोई भी संवेदनशील और निष्ठावान शख़्स इस तरह के बेतुके तर्कों से एक घोर साम्प्रदायिक शख़्स को धर्मनिरपेक्ष नहीं ठहरा सकता। अख़बारों में तमाम रिपोर्ट यही बता रहे हैं कि गुजरात के उपचुनाव में बीजेपी की जीत के पीछे कांग्रेस के कमजोर उम्मीदवार रहे हैं। साथ ही इशरत की फर्जी मुठभेड़ पर हुई राजनीति से हिंदू वोट पोलराइज हो गए। बीजेपी की तरफ मुड़ गए। मतलब एक बार फिर नफ़रत की राजनीति खेली गई है। बीजेपी नेता अरुण जेटली अपने शब्दों में यह बात कबूल कर चुके हैं। कांग्रेस के नेता भी खराब उम्मीदवारों के चयन और इशरत मुद्दे पर हुई राजनीति को हार की वजह बता रहे हैं। लेकिन आलोक मेहता को इसके पीछे मोदी का अल्पसंख्यक प्रेम नज़र आ रहा है। धन्य हैं आलोक मेहता। धन्य हैं उनकी पत्रकारिता। धन्य है उनकी संस्कृति और धन्य है उनका “गणित”।
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लगता है कि राज्य सभा के लिए आलोक मेहता का दांव कुछ उल्टा पड़ गया है। तभी अब वो मोदी की तारीफ़ कर रहे हैं। यह भी बताया जाता है कि आलोक मेहता बीजेपी में एक कैंप के करीबी रहे हैं। वैसे मोदी के प्रति अचानक हृदय परिवर्तन के पीछे असली वजह क्या है यह तो आलोक मेहता ही बता सकते हैं।
जय हो!
आलोक मेहता लिखते हैं कि “हिंदुत्व का उदार-व्यावहारिक रास्ता अपनाए बिना भारत में कोई दल, संगठन या नेता सफलता नहीं पा सकता।” लेकिन मैं पूछता हूँ कि “हिंदुत्व” कि अवधारणा में उदार और व्यावहारिक होने की कोई गुंजाइश भी है है क्या आलोक जी? श्रीराम मंदिर बनाने के लिए “जान की बाजी” लगा देने वाला यह ” हिंदुत्व” अब मंदिरों के दरवाजे दलितों के लिए खोलने को तैयार हो गया है क्या? क्या अब यह ” हिंदुत्व” अवर्णों को भी सवर्णों जैसी इज्जत और अधिकार देने को राजी हो गया है? क्या मुसलमानों के लिए चंद कल्याणकारी कदम, जोकि इस देश का नागरिक होने के नाते उनका बुनियादी हक़ है, उठाकर कोई उदार और व्यावहारिक होने का तमगा पा लेगा? यदि ऐसा है, तो इस किस्म की समझ और पत्रकारिता पर तरस ही खाया जा सकता है.
हम सिर्फ टिप्पणी कर सकते हैं… ऐसे पहुंचे हुए और करोड़ों रुपये सालाना आय वाले पत्रकारों का कुछ नहीं बिगार सकते… फिर क्यों मगजमारी कर रहे हैं… समरेंद्र सर… लगता है आपको आखबार में नौकरी नहीं दिया था क्या…
Alok Mehtaji kash ki juhapura, Vejalpur, Naoda, Vatva ka dora karte kyoki hindu, muslim border line hay jise par karna asambhav hay. hall he may muslim samuday kay logo nei Gujarat kay nami builders ko makan khaidane kay kei liye sampark kiya tha lekin jaha hind rah rahe hay way waha makan kharid nahi sakte modi ka gungan karne wale Alok Mehta kash un muslimo say milkar unke dard ko jante.