“हम” टिके हैं और टिके रहेंगे प्रभाष जोशी
लेखक: Samrendra | September 7, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 4 Comments
कुछ दिन पहले एक पत्रकार साथी ने सरसरी तौर पर एक बात कही। उन्होंने बताया कि “बिहार और झारखंड के मीडिया सर्किल के एक ख़ास तबके के बीच एक चर्चा चल रही है। वो यह कि हरिवंश और प्रभाष जोशी की नीतियों पर जो लोग सवाल उठा रहे हैं वो बड़े मीडिया संस्थानों के हाथों में खेल रहे हैं। उन मीडिया संस्थानों के हाथों में जिनके ख़िलाफ़ प्रभाष जोशी ने नाम लेकर लिखा। इसके पीछे पैसे का भी बड़ा खेल है।” तब यह बात आई-गई हो गई। लेकिन प्रभाष जोशी का ताज़ा लेख पढ़ने से संदेह के बादल छंट गए हैं। अब समझ में आने लगा है कि यह बातें किन लोगों ने और किस मकसद से उड़ाई होंगी।
यह एक बहुत महीन रणनीति है। जिसका लक्ष्य है ख़बरों की काली कमाई से जुड़े मुद्दे के नीचे प्रभाष जोशी की ब्राह्मणवादी मानसिकता पर उठे सवालों को दफ़्न कर दो। जिसका लक्ष्य है प्रभाष जोशी की अवर्ण, स्त्री और मुसलमान विरोधी विचारधारा पर सवाल उठाने वालों को बड़े मीडिया संस्थानों की कठपुतली के तौर पर प्रोजेक्ट करके, उनके नैतिक बल को समाप्त कर दो। हम प्रभाष जोशी और उनके गिरोह की इस साज़िश का पुरजोर विरोध करेंगे। हम उन्हें यह हक़ नहीं देंगे कि वो हमारे पैरों से असहमति के नैतिक धरातल को खींच लें। प्रश्नों का उत्तर देने की बजाए प्रश्न करने की नीयत पर सवाल उठाएं।
प्रमोद रंजन ने जनसत्ता के संपादक के नाम अपनी चिट्ठी में साफ तौर पर कहा है कि उनके लेख को प्रभाष जोशी के जवाब के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसके विस्तार के रूप में देखना चाहिए। लेकिन अहंकार में डूबे प्रभाष जोशी को यह समझ में कहां से आएगा? तभी तो वो एलान करते हैं कि “खबरों को बेचने के काले धंधे को रोकने के पुण्य कार्य में फच्चर मत फंसाओ। टिकोगे नहीं!!”
दरअसल, प्रभाष जोशी जैसे लोग दूसरों का हक़ मारने में काफी माहिर होते हैं। इस बार भी उन्होंने यही किया है। उनसे पहले कई लोगों ने ख़बरों के काले धंधे के बारे में लिखा। विदेशी पत्रकार पॉल बैकेट ने प्रभाष जोशी से करीब एक हफ़्ते पहले द वॉल स्ट्रीट जरनल में लिखा था। पॉल बैकेट से पहले भी वेबसाइटों पर कई ख़बरें छपी थी। लेकिन प्रभाष जोशी घूम-घूम कर कहते फिर रहे हैं कि उन्होंने आंदोलन खड़ा कर दिया है। वो भी ऐसा आंदोलन जिस पर किसी भी संस्थान ने जवाब देना जरूरी नहीं समझा। आज तक एक भी अख़बार के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं हुई है। भविष्य में होगी भी तो अकेले उनके बूते नहीं होगी। यह एक सामूहिक प्रयास का नतीजा होगा। जिसमें बहुत से लोग शामिल हैं। इसलिए उस मुहिम को ढाल बना कर प्रभाष जोशी बचने की कोशिश न करें तो वही बेहतर होगा।
अब बात प्रभाष जोशी की नीयत की। प्रभाष जोशी के दिल में पिछड़ों और दलितों के प्रति कितनी नफ़रत भरी हुई है उसका अंदाजा उनके इस कथन से लगा सकते हैं। “मीडिया से दलित-पिछड़ों, वाम आंदोलनों आदि के सरोकार बाहर हुए तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वहां घनघोर बाजारवाद और ब्राह्मणवादी पूंजीवाद आ गया है। चौधरी चरण सिंह से लेकर मायावती तक ने दलित-पिछड़ों के हितों को अपनी सत्ता और धन-लालसा में कैसे बरबाद किया है, पूरा देश जानता है। वंशवाद और धन के लोभ ने लालू, मुलायम, चौटाला, नीतीश कुमार, अजित सिंह और मायावती को मजबूत विपक्ष बनने के बजाय बिन बुलाये कांग्रेस समर्थक क्यों बनाया है? क्योंकि सबके कंकाल सीबीआई के पास हैं। और नंदीग्राम और सिंगूर के बाद वामपंथी किस नैतिक और वैचारिक समर्थन के हकदार हैं?”
मतलब चौधरी चरण सिंह से लेकर लालू, मुलायम, चौटाला, मायावती, नीतीश सभी के सभी बिना पेंदी के लोटे हैं। सभी के सभी भ्रष्ट हैं। चोर हैं और जांच के घेरे में फंसे हैं। सभी के सभी वंशवादी हैं। इसलिए क्योंकि वो पिछड़े और दलितों के नायक हैं। इससे अधिक ख़तरनाक सोच क्या हो सकती है? खुद को सही साबित करने के चक्कर में प्रभाष जशी ने तथ्यात्मक गलती भी कर दी है। उनके साथी हरिवंश कहते हैं कि सरदार पटेल के बाद सबसे अच्छे नेता नीतीश कुमार हैं… इसलिए कि वो वंशवाद नहीं फैलाते और जनता के बारे में सोचते हैं। लेकिन प्रभाष जोशी के मुताबिक नीतीश भी वंशवाद फैलाते हैं और भ्रष्ट हैं और सीबीआई से बचने के लिए कांग्रेस की चाटूकारिता करते हैं।
प्रभाष जोशी जैसे लोगों की मूल बनावट ही यही है। वो घोर जातिवादी और संघी मानसिकता से ग्रस्त रहते हैं। तथ्यों के आधार पर अपनी बात कहने की जगह हर वक़्त दोधारी तलवार भांजते हैं। प्रभाष जोशी ने इस लेख में भी वही किया है। एक तरफ पिछड़े और दलितों के नायकों को भ्रष्ट, सत्ता लोलुप और वंशवादी बताने के साथ पूरे वामपंथी आंदोलनों को भी अपने निशाने पर लिया है। इस लेख का सार यही है कि दलित, पिछड़ी जातियों और वामपंथ से जुड़े सभी आंदोलन भ्रष्टाचार और जनविरोधी अभियानों में तब्दील हो कर रह गए और इसी वजह से मीडिया से उनके सरोकार खत्म हो गए।
प्रभाष जोशी जैसे लोगों को कांग्रेस और बीजेपी का भ्रष्टाचार और वंशवाद नहीं दिखता है। अगर भ्रष्टाचार और वंशवाद ही सरोकारों के ख़त्म होने की एकमात्र पहचान है तो फिर कांग्रेसी और संघी सरोकार ख़त्म क्यों नहीं हुए? कांग्रेस का वंशवाद तो जग जाहिर है। वहां तो एक वंश को छोड़ कर किसी वंश की तूती बोलती ही नहीं। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि उसके एक प्रधानमंत्री तक के ख़िलाफ़ जांच हो चुकी है। बीजेपी के युगपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे तो रिलायंस का ब्रांड एम्बेडर बन गए थे। कहने का आशय सिर्फ इतना ही कि बीजेपी में भ्रष्टाचार और वंशवाद कम नहीं रहा। लेकिन वो नयनसुख प्रभाष जोशी को नहीं दिखेगा क्योंकि वो सभी सवर्ण सरोकार थे।
प्रमोद रंजन के नाम जवाब में प्रभाष जोशी ने बड़ी चतुराई से दो मुद्दों को एक साथ जोड़ दिया है। प्रमोद रंजन ने अपने लेख में कहीं भी जनसत्ता की शुरुआती टीम पर सवाल नहीं खड़ा किया था। यह सवाल जनतंत्र पर चार्वाक सत्य ने उठाया था। चार्वाक सत्य ने ही जनसत्ता की पहली टीम को ब्राह्मणवादी करार दिया गया था। लेकिन प्रमोद रंजन को जवाब देते-देते प्रभाष जोशी ने बगैर नाम लिए उस सवाल का जवाब दिया। उनका जवाब बेहद बेतुका और छिछला है। उनसे ठोस जवाब की उम्मीद थी।
प्रभाष जोशी कहते हैं कि जनसत्ता में भर्ती के लिए एक पैनल बिठाया गया था – “इंटरव्यू के लिए भारतीय संचार संस्थान के संस्थापक निदेशक महेंद्र देसाई, प्रेस इंस्टीट्यूट के भूतपूर्व निदेशक चंचल सरकार, गांधीवादी अर्थशास्त्री एलसी जैन, इंडियन एक्सप्रेस के संपादक जॉर्ज वर्गीज, मैं और एक विशेषज्ञ। कई दिन तक इंटरव्यू चले।” वो दावा कहते हैं कि “इससे ज्यादा वस्तुपरक और तटस्थ कोई प्रक्रिया हो नहीं सकती थी।”
लेकिन अगले ही पैराग्राफ में यह भी बताते हैं कि वो पैनल सिर्फ़ नाम का था। जनसत्ता से लेकर इंडियन एक्सप्रेस तक जितनी भी भर्तियां थी वो खुद उन्होंने की थी और रामनाथ गोयनका के साथ मिल कर सबको रखा था। मतलब वो पैनल हाथी के दांत की तरह दिखावटी था और उनका काम सिर्फ और सिर्फ प्रभाष जोशी के चुने हुए उम्मीदवारों के नाम पर मुहर लगाना था। “कुछ बरस बाद एक अन्नू आनंद ने लिखा कि प्रभाष जोशी देखते नहीं कि इंडियन एक्सप्रेस में कितनी महिलाएं हैं और जनसत्ता में कितनी कम। जब वे मुझे प्रेस इंस्टीट्यूट में मिलीं तो मैंने पूछा – आप जानती हैं कि एक्सप्रेस की महिलाएं भी मेरी रखी हुई हैं? और चंडीगढ़ एक्सप्रेस में तो आधी महिलाएं थीं।”
यही नहीं जाति का घमंड इतना है कि जब ए एल प्रजापति ने जनसत्ता से जाने के बाद जातिवाद का मुद्दा उठाया तो प्रभाष जोशी और उनके गिरोह ने उस पर मजा लिया। “जनसत्ता की पहली टीम में एक अच्छेलाल प्रजापति हुआ करते थे। कुछ ही महीने काम करके वे कोलकाता गये। वहां से खबर आयी कि उनने कहा कि जनसत्ता में तो बड़ा ब्राह्मणवाद चल रहा है। मैं तब डेस्क पर साथियों से मिल कर पहला संस्करण निकाल रहा था। निकल गया तो सबको इकट्ठा करके हमने इस मनोरंजक खबर का मजा लिया”।
अंत में बस इतना ही कि प्रभाष जोशी से लेखन से अब यह बात सार्वजनिक होने लगी है कि वो कट्टर संघी, कट्टर ब्राह्मणवादी और तानाशाह इंसान हैं। उन्हें विरोध में उठे स्वर पसंद नहीं। असहमति की आवाज़ों को वो साज़िश के जरिए दबाने की कोशिश करते हैं। कुछ लोग कहा करते थे कि देवराला सती कांड के दौरान जिन पत्रकारों ने प्रभाष जोशी का विरोध किया था उनमें से बहुतों को दिल्ली में टिकने नहीं दिया गया। पहले यकीन नहीं होता था। लेकिन अब लगता है कि वो बातें सच्ची हैं।
इन्हें भी पढ़ें:
- महिला आरक्षण बिल सवर्णों की क्रूर साज़िश है - March 12th, 2010
- खजुराहो के गर्भ में अटक गए हैं हुसैन के अंध समर्थक - March 6th, 2010
- इतिहास के आईने में पेंटिंग्स की तरह ही नंगे हैं हुसैन - March 3rd, 2010
- कट्टरपंथी हुसैन के जाने से देश पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा - March 2nd, 2010
- सचिन या रेल बजट - मैं तो सचिन के साथ हूं और आप? - February 25th, 2010





प्रमोद रंजन के लेख पर प्रभाष जोशी ने जितनी हिंसक और आक्रामक भाषा में लिखा है वो बताता है कि चोट मर्मस्थल को भेद गई है। बुजुर्ग प्रभाष जोशी की बौद्धिक चमक को इस तरह से उतरते देखना पुरानी पीढ़ी के पत्रकारों के लिए तकलीफदेह हो सकता है। हम पुराने लोगों की तकलीफ को समझ सकते हैं।
जात-जात में जात है, जस केलन के पात,
रैदास न मानुख बन सकै, जब तक जात न जात।
भाई समरेंद्र जी, भारत में जाति-व्यवस्था और उससे निर्मित लोकमानस के ऐतिहासिक कारण रहे हैं और यह एक प्रक्रिया में ही खत्म होगी, झटके से नहीं। ऐसा लग रहा है कि आप भी संसदीय व्यवस्था के भीतर रहकर कबड्डी खेलने के पक्षधर हैं तब फिर किस मुंह से प्रभाष जोशी की खिंचाई करेंगे। दलितों-पिछडों, अल्पसंख्यकों और दूसरी राष्ट्रीयताओं का शोषण-दमन यह पूंजीवादी व्यवस्था कर रही है और प्रभाष जोशी जैसे व्यवस्था को लंबी उम्र देने के पक्षधर लोग चाहते हैं कि चुनाव साफ-सुधरे ढंग से आयोजित किये जाएं ताकि थैलीशाहों के इस जनतंत्र में जनता का यकीन बना रहे। वे अपने विश्वासों के अनुसार अविचल-अकंप रहकर काम कर रहें हैं और आप जैसे बच्चे उन्हें आड़े हाथ लेने के नाम पर पिपिहरी बजा रहे हैं। किसी भी व्यक्ति के कहे की बातों की तस्दीक उसकी निजी जिंदगी से की जाती है। थोड़ी आत्मावलोचना कीजिए और देखिये कि आपने खुद को कितना बदला है। हम आज की तारीख में इतिहास को आगे की ओर गति देने वाले मजदूर वर्ग के बीच होकर और वैज्ञानिक विचारधारा यानि मार्क्सवाद को अपनाकर ही बदल सकते हैं।वरना !!! आप भी माल-मुद्रा पर आधारित सामाजिक हैसियत के कायल हैं और उसे बढ़ाने-चमकाने में यकीन रखते हैं और अगर ऐसा है तो व्यक्तिगत जीवन में प्रभाष जोशी का कद आपके मुकाबले बहुत ऊंचा रहा है। किस जमीन पर खड़े होकर सवाल उठा रहे हैं यह तो देखा ही जाएगा भाई। यह भी देखा जाता है कि किन्ही खास तथ्यों का ही चयन क्यों किया गया है अपनी बात की पुष्टि करने के लिए।
मेरी बातें नागवार लगी हों तो मॉडरेटर के विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए पब्लिश नहीं करना और आर्यवीरों की तरह खुश हो जाना।
आपकी बात कुछ समझ नहीं आयी। क्या कहना चाहते हैं आप?
“ऐसा लग रहा है कि आप भी संसदीय व्यवस्था के भीतर रहकर कबड्डी खेलने के पक्षधर हैं तब फिर किस मुंह से प्रभाष जोशी की खिंचाई करेंगे। दलितों-पिछडों, अल्पसंख्यकों और दूसरी राष्ट्रीयताओं का शोषण-दमन यह पूंजीवादी व्यवस्था कर रही है और प्रभाष जोशी जैसे व्यवस्था को लंबी उम्र देने के पक्षधर लोग चाहते हैं कि चुनाव साफ-सुधरे ढंग से आयोजित किये जाएं ताकि थैलीशाहों के इस जनतंत्र में जनता का यकीन बना रहे। वे अपने विश्वासों के अनुसार अविचल-अकंप रहकर काम कर रहें हैं और आप जैसे बच्चे उन्हें आड़े हाथ लेने के नाम पर पिपिहरी बजा रहे हैं। किसी भी व्यक्ति के कहे की बातों की तस्दीक उसकी निजी जिंदगी से की जाती है। थोड़ी आत्मावलोचना कीजिए और देखिये कि आपने खुद को कितना बदला है। हम आज की तारीख में इतिहास को आगे की ओर गति देने वाले मजदूर वर्ग के बीच होकर और वैज्ञानिक विचारधारा यानि मार्क्सवाद को अपनाकर ही बदल सकते हैं।वरना !!! आप भी माल-मुद्रा पर आधारित सामाजिक हैसियत के कायल हैं और उसे बढ़ाने-चमकाने में यकीन रखते हैं और अगर ऐसा है तो व्यक्तिगत जीवन में प्रभाष जोशी का कद आपके मुकाबले बहुत ऊंचा रहा है। किस जमीन पर खड़े होकर सवाल उठा रहे हैं यह तो देखा ही जाएगा भाई। यह भी देखा जाता है कि किन्ही खास तथ्यों का ही चयन क्यों किया गया है अपनी बात की पुष्टि करने के लिए।”
“..अगर ऐसा है तो…ऐसा लग रहा है…आप जैसे बच्चे…प्रभाष जोशी का कद आपसे बड़ा है…किस मुंह से प्रभाष जोशी की खिंचाई करेंगे…” क्या कहना चाहते हैं आप? अगर मार्क्सवादी हैं, तो आपको इस बहस से, प्रभाष जोशी के प्रभामंडल में छेद होने से खुश होना चाहिए, इस कोशिश में हाथ बंटाना चाहिए..अगर आपके हिसाब से बहस भटक रही है, तो उसे सही दिशा देने की कोशिश करनी चाहिए..लेकिन लगता है आप विचार और पहचान से मार्क्सवादी हैं, लेकिन निजी तौर पर प्रभाष जी के एहसानों से दबे हैं। इसीलिए विचार से जिस पर हमला कर रहे हैं, व्यावहारिक बनकर उसी की तारीफ कर रहे हैं? क्या आप वही हिंदी लेखक कामता प्रसाद हैं, जिनके ग्रंथ का लोकार्पण प्रभाष जी की मौजूदगी में उनके “बड़े भाई” नामवर जी ने किया था और आपकी तारीफों के पुल बांधे थे? मार्क्सवादी नामवर जी आपके हिसाब से पूंजीवादी जोशी जी के सरपरस्त क्यों हैं? और दोनों मिलकर आपको क्यों प्रेमचंद के बरअक्स रखने की कोशिश कर रहे थे? निजी संबंधों के जाल में फंसकर लगता है आपके विचार दम तोड़ रहे हैं। आत्मावलोकन की ज़रूरत आपको भी है..