चुप्पी की यह भाषा बहुत खतरनाक है दोस्तों
लेखक: प्रेमरंजन | August 30, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 2 Comments
इस देश में एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे। नाम था पीवी नरसिंह राव। सुना है बड़े विद्वान थे। कई भाषाओं पर उनका अधिकार था। हिंदी तो वे बोलते ही थे, अंग्रेजी सहित कई और भाषाएं थीं, जिन पर अधिकार होने की मुनादी अक्सर उनके भक्तगण मुदित होकर किया करते थे। वे कई लोगों के लिए बहुत अच्छे प्रधानमंत्री थे। और अच्छे प्रधानमंत्री इसलिए थे क्योंकि वे ब्राह्मण थे। हालांकि विद्वान थे, तो ब्राह्मण होना लाजिमी ही है।
चलिए, यह तो आर्य संस्कृति का शाश्वत सत्य है कि नरसिंह जी इसलिए विद्वान थे क्योंकि ब्राह्मण थे। और तो और, कई भाषाओं के प्रकांड पंडित भी थे। (दोहराव जैसा लग रहा होगा। यह पाठकों पर अत्याचार होता है। लेकिन बात जब प्रकांड पंडितों की हो रही हो, तो धैर्य से सुनना-देखना चाहिए। कोई न कोई बात निकल के आती ही है।) तो उन सभी भाषाओं को उंगली पर गिनाते हुए उनके भक्तों को उस एक भाषा को भी गिना डालने का ध्यान ही नहीं रहता था, जो उनकी विद्वत्ता का असली कारण थी। और सच कहें तो वही एक भाषा उनके विद्वान और धीर-गंभीर होने का सबसे बड़ा सबूत और कारण थी।
दरअसल, प्रधानमंत्री हो जाने के बाद खासतौर पर वे दुनियावी समस्याओं को तुच्छ मानते थे और अगर कोई इन समस्याओं को सवाल के रूप में उनके सामने रख देता तो वे उस पर बोलना भी उतना ही तुच्छ काम मानते थे। इसलिए जैसे ही कोई प्रश्न करता, वे चुप हो जाते थे। (गांव-देहात में बेहोशी की एक स्थिति को दांत लगना भी कहते हैं, जिसमें ऊपर और नीचे के दांत एक दूसरे से पूरी तरह कस जाते हैं और बेहोशी टूटने तक नहीं छूटते) ऐसे कि कोई मजबूत उंगलियों और अंगूठों से पकड़ कर भी उनके होठों को अलग करना चाहे तो अलग नहीं कर सकता था। और तब तक अलग नहीं कर सकता था जब तक पूछे गए प्रश्न अपना असर दिखा कर उसके असर को बेअसर नहीं कर जाते।
(भक्त गणों, कृपया छोटी-मोटी प्रशासनिक-सामाजिक-आर्थिक या राजनीतिक समस्याओं से लेकर बाबरी मस्जिद के ध्वंस तक को सरसरी निगाह से ध्यान में लाइए…)
यह मौन की भाषा थी। और यह इस भाषा की ताकत थी।
और दरअसल यही सदियों की ट्रेनिंग के बाद हासिल की जाती है और यही धारण करने की क्षमता है।
अब प्रभाष जी जोशी जी या हरिवंश जी (जनाब रंगनाथ (आपको जी कहते हुए डर लगता है) का जी-जा-जी) प्रसंग अगर कुछ तल्ख सवाल पैदा कर रहे हैं और इन सवालों का जवाब नरसिंह राव की “चुप-भाषा” में दिया जा रहा है तो यह आश्चर्य का विषय नहीं है प्रियजनों…! यह मुग्ध होने और सीखने का समय है। यह समझने का विषय है कि ब्राह्मणवाद ने अपने तंत्र को कायम रखने के लिए इस सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को किन ऊतकों-कोशिकाओं से लैस किया है। इस व्यवस्था की जड़ों में खाद-पानी डालते वक्त अगर किसी पौधे के कांटे चुभ जाएं तो उससे होने वाले नुकसान से सुरक्षा के लिए एक इम्यून सिस्टम के तहत कौन-कौन से हथियार गढ़े हैं।
प्रभाष जोशी अगर चुप हैं, या तथागत के ब्योरे के बाद (अविनाश जी ने बड़े ही लचर ढंग से हरिवंश जी का बचाव करने की नाकाम कोशिश की) हरिवंश जी (सिंह वाला टाइटिल लगा होता तो भाषाई विनम्रता और प्रवाह के लिहाज से जी कहने से बचने में सुविधा होती) चुप हैं तो उसका अर्थ यही है कि मौजूदा सवालों से बचने का अकेला रास्ता चुप रहने के रूप में मान लिया गया है। प्रभाष जोशी या हरिवंश जी जैसे तमाम लोगों के प्रगतिशीलता की खाल के भीतर ब्राह्मणवाद की पैरोकारी या जातिवाद और अहं निबाहते रहने का एकमात्र कारण यह है कि हमने अब तक सामाजिक भाषा-तंत्र को एक स्वाभाविक परिणति के रूप में अपनी नियति बनाए रखा है।
अव्वल तो हमारे सामने कोई मूर्ति क्यों हो? और दूसरे कि क्या अब भी हमें यह सोचने की जरूरत नहीं है कि कोई प्रभाष जोशी महाराज मनु की तरह समूचे इंसानियत के खिलाफ और उसे शर्मसार कर देने वाले “विचार” जाहिर करते हैं और हम उनके सामने सिर्फ इसलिए अपना सिर झुकाए रखें क्योंकि उन्हें एक मूर्ति के रूप खुद को स्थापित करने में कामयाबी मिली है? क्या यह एक इंसान के रूप में हमारा स्वाभाविक विकास है, कि कोई व्यक्ति दो-चार “अच्छी” बातें कर लेता है और हम उसे अपना देवता बना लेते हैं? क्यों हमने अब तक उस भाषा पर गौर नहीं किया है जो हमें आखिरकार उस “मैज़ोकिज्म” के दर पर लाकर छोड़ देता है, जहां अपना कोई अस्तित्व नहीं होता, और जो होता है, वह स्वघोषित देवताओं, गुरुओं और आइकॉन्स का गुलाम होता है?
चुप्पी की यह भाषा बहुत खतरनाक है दोस्तों…। इस हथियार के काम कर जाने के बाद यही भाषा बुद्ध तक को खा चुकी है। यह भाषा कब चुपचाप अपने खिलाफ होने वाले शोर में घुसपैठ कर उस शोर को खत्म कर डालती है, इसे समझना अब तक बहुत मुश्किल रहा है।
लेकिन यह वक्त से छीना गया हक है कि अब खुद को इंसान समझने वाले बहुत सारे लोग इस पंडा-भाषा के सारे स्वर-वर्ण की संरचना समझने लगे हैं।
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- "इतिहास के कूड़ेदान में जाएंगे प्रभाष जोशी" - August 22nd, 2009





श्रीमान प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,
मेरे करीबी रिश्तेदारों में कई जातियों के लोग हैं। ब्राह्मण से लेकर कायस्थ और नायर से लेकर दलित तक। ये सभी परिवार प्रेम से रह रहे हैं। आपके परिवारों में भी लोगों ने प्रेम किया होगा और कई ने जाति से बाहर शादियां भी की होंगी। अब आप जाति पर अपने शर्मसार करने वाले विचारों को अपने रिश्तेदारों पर लागू करके देखिए और हिसाब लगाइए कि कौन सी बच्ची या बच्चा कवि बनेगा और कौन कहानीकार और कौन आत्मकथा बेहतर लिखेगा (देखिए देशकाल डॉट कॉम पर राजेंद्र यादव की खबर)। या हिसाब लगाइए इस बात का कि कौन बैटिंग करेगा और कौन बॉलिंग और कौन टिक कर खेलेगा और कौन टिककर नहीं खेलेगा या फिर कौन बेहतर नेतृत्व क्षमता दिखाएगा और कौन नहीं दिखाएगा (देखिए रविवार डॉट कॉम पर प्रभाष जोशी का इंटरव्यू)। आपको अपने ही विचारों से शायद नफरत होने लगे और आप अपने बच्चों और पोते-पोतियों से माफी मांगने के अलावा कुछ और नहीं कर पाएं। बड़े कहे जाने वाले लोग जब इस तरह अश्लीलता फैलाएं और समाज में नफरत फैलाने वाली बातें करने लगें तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है।
मैं ये सोचने की कोशिश कर रहा हूं कि ये हमारे ये दोनों बुजुर्ग बीमार क्यों हैं। इसका एक कारण तो मुझे समझ में आ रहा है। इन्हें दुनिया की शायद खबर ही नहीं है। प्रभाष जोशी इंटरनेट नहीं देखते। वो ऑर्कुट पर नहीं हैं। वो फेसबुक में भी नहीं हैं। मुझे नहीं मालूम कि उनके पास ई-मेल आईडी है या नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि मेल आईडी तो हैं पर मेल का प्रिटआउट मंगाकर पढ़ते हैं। कुछ समय पहले तक उनके पास मोबाइल फोन भी नहीं था। एसएमएस पता नहीं वो करते हैं या नहीं। जाहिर है वो ट्विटर पर ट्विट भी नहीं करते होंगे। उनका कोई ब्लॉग भी नहीं है। राजेंद्र यादव का भी कमोबेश यही हाल होगा। वैसे तो इस गरीब देश के ज्यादातर लोगों के प्रोफाइल सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नहीं हैं, वो ईमेल भी नहीं करते, न ही कंप्यूटर से उनका कोई वास्ता है। देश में इस समय लगभग 6 करोड़ लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं (देखें मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी की सालाना रिपोर्ट)। तो अगर राजेंद्र यादव या प्रभाष जोशी देश के छह करोड़ कनेक्टेड लोगों में नहीं हैं तो क्या फर्क पड़ता है?
फर्क पड़ता है। इसलिए क्योंकि ये दोनों कम्युनिकेशन यानी संवाद के धंधे में हैं। और भी ज्यादा फर्क पड़ता है क्योंकि ये अपने धंधे में चोटी के माने जाते हैं। और ऐसे लोग अगर दीन-दुनिया से अपडेट न रहें तो फर्क पड़ता है। ये बात चिंताजनक है कि भारत में संवाद से जुड़े दो बड़े लोगो का दुनिया और भारत में सबसे तेजी से बढ़ते संचार माध्यम (देखिए फिक्की और केपीएमजी की भारत में मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री पर रिपोर्ट) से कोई वास्ता नहीं है। ये बेखबर लोग अगर अपनी बात खुद तक ही रखें तो हमें धेले भर की परवाह नहीं। लेकिन वो बोल रहे हैं और बेहद बेतुका और बेहूदा बोल रहे हैं।
ये दोनों लोग ऐसी बातें बोल रहे हैं जो उनके चेलों के अलावा हर किसी को अखर रही है। मैं एक भी ऐसे आदमी को नहीं जानता जो जातिवाद के समर्थन में उनके विचारों का कम से कम सार्वजनिक तौर पर समर्थन करें। इन दोनों महान लोगों के चेलों के पास भी बचाव में देने को कोई तर्क नहीं हैं। आखिर इनके चेलों में से भी कई ने जाति से बाहर शादी की है। उन्हें मालूम है कि उनकी अगली पीढ़ी क्या करने वाली है। हर जाति के लोगों को ये लेखन आउटडेटेड और सड़ा हुआ लग रहा है। 21वीं सदी के लगभग 10 साल बीतने के बाद ये अज्ञानी लेखन हमारी देवभाषा में ही संभव है। इस समय पश्चिम में आप कल्पना नहीं कर सकते कि कोई जाति या वर्ण या नस्ल या रंग के आधार पर श्रेष्ठता का ऐसा खुल्लमखुल्ला और अश्लील समर्थन करे। उसे पूरा देश दौड़ा लेगा।
बहरहाल ये इस बात का प्रमाण है कि ये दोनों लोग दुनिया में चल रहे आधुनिक विमर्श से वाकिफ ही नहीं हैँ। ये महानगर में रहते है। आर्थिक रूप से समर्थ हैं। लेकिन नेट पर नहीं है। पता नहीं की-बोर्ड पर काम करना इन्हें आता भी है या नहीं। ऐसे में दोनों को पता ही कैसे चलेगा कि नॉम चॉमस्की ने अपने ब्लॉग http://www.zmag.org/blog/noamchomsky पर ताजा क्या लिखा है या फिर फ्रांसिस फुकोयामा के बारे में ब्लॉग में क्या चल रहा है (http://en.wordpress.com/tag/francis-fukuyama/)। उन्हें पता ही नहीं कि दुनिया कितनी बदल गई है। नहीं, ये एलीट होने या जेब में ढेर सारे पैसे होने की बात नहीं है। 10-15 रुपए में कोई भी आदमी आधे से लेकर एक घंटे तक इंटरनेट कैफे में कनेक्ट हो सकता है। प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव भी ये कर सकते हैं। वो ऐसा नहीं करते, इस वजह से उनका अपने पाठकों की दुनिया से जबर्दस्त डिस्कनेक्ट हैं। ये आश्चर्यजनक है कि दुनिया के सबसे तेजी से उभरते संचार माध्यम से उनका परिचय ही नहीं है।
वो ये बात भी भूल जाते हैं कि भारत में इतने हमलावर आए हैं (उनमें से ज्यादातर अपने साथ परिवार लेकर नहीं आए) और समाज व्यवस्था में इतनी उथल पुथल हुई है कि रक्त शुद्धता की बात कोई कूढ़मगज इंसान ही कर सकता है। हिमालय के किसी बेहद दुर्गम गांव में या किसी द्वीप या किसी बीहड़ जंगल में बसी बस्ती के अलावा रक्त अब शायद ही कहीं शुद्ध बचा होगा। ऐसे में कोई ये कहे कि कोई किसी खास काम को करने में इसलिए ज्यादा सक्षम और समर्थ है कि उसका जन्म किसी खास जाति में हुआ है तो इस पर आप हंसने के अलावा क्या कर सकते हैं। आप रो भी सकते हैं कि जिन लोगों को हिंदी भाषा ने नायक कहकर सिर पर बिठाया है, उनकी मेधा का स्तर ये है।
प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव, क्या आपको अपने घरों में नई पीढ़ी की हंसी की आवाज सुनाई दे रही है? पता लगाइए कि कहीं वो आप पर तो नहीं हंस रहे हैं।
प्रभाष जोशी तो खुद को ब्राह्मण ही मानते होंगे। उनमें वो सारे गुण होंगे जिनका जिक्र उन्होंने ब्राह्मणों के बारे में अपने इंटरव्यू में किया है। अगर उनका जन्म मिथिलांचल या मालवा के किसी बेहद गरीब ग्रामीण ब्राह्मण परिवार मं हुआ होता तो भी क्या ये तय था कि वो संपादक ही बनते। और राजेंद्र यादव किस जातीय गुण की वजह से संपादक बन गए?
तो श्रीमान प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,
बात सिर्फ इतनी सी है कि किसी को कितना मौका मिला है। बात अवसर की है। ये न होता तो आप अपने बच्चों को किसी गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाते। फिर हम भी देखते धारण क्षमता का चमत्कार। यादव जी का ये कहना गलत है कि “ब्राम्हणों में कुछ चीज़ें से अभ्यास आई हैं जैसे कि अमूर्तन पर विचार-मनन और इसीलिए कविताई में उनका वर्चस्व है। इन्हीं वजहों से विश्वविद्यालयों और अकादमियों में भी वे काबिज़ हैं। “ वो वहां काबिज इसलिए हैं क्योंकि उन्हें वहां तक पहुंचने का मौका मिला है। पढ़ाई लिखाई को लेकर चेतना अलग अलग जातियों और समूहों में अलग-अलग समय में आई। सामाजिक ढांचे की वजह से शिक्षा संसार में कई समूहों के लिए प्रवेश ही वर्जित था। कुछ जादू नेटवर्किंग का भी है। नरेंद्र जाधव और बीएल मुणगेकर को मौका मिला तो दलित होते हुए भी वो पुणे और मुंबई जैसे बड़े विश्वविद्यालयों में कुलपति बन गए। कोई भी बन सकता है।
किसी जाति में कोई अलग गुण नहीं होता। कुछ पुरानी बातें अब लागू नहीं होतीं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने गीता का भाष्य करते हुए 18वें अध्याय में यही कहा है। पढ़ लीजिएगा। 21वीं सदी में जातीय श्रेष्ठता या जातीय विशिष्टता की बात करेंगे तो घृणा के नहीं, हंसी के पात्र बनेंगे।
अब हरीबंश जी गर्जेंगे तो नहीं चुप ही रहेंगे, गरजते या वरसते तो तब जब नाम के पिछे सिंह लगा रहता। कहा गया है, यह पुँछ व्यकतित्व पर बहुत प्रभाव डालता है।