क्या यही आपकी परंपरा है प्रभाष जी?
लेखक: रजनीश | August 20, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 7 Comments
रविवार डॉट कॉम पर छपे प्रभाष जोशी के इंटरव्यू ने एक झटके में वह सब सामने ला दिया है जो अब तक पर्दे की ओट में था। एक गांधीवादी, अहिंसावादी, सेक्यूलर और जनपक्षीय संपादक-पत्रकार का यह असली सच जितना चौंकाता है, इससे कहीं अधिक आक्रोश पैदा करता है। लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाले इस वरिष्ठ पत्रकार-लेखक ने इस इंटरव्यू में परंपरा, ट्रेनिंग और कौशल के बहाने न केवल लोकतंत्र की आत्मा को घायल किया है, बल्कि उन लोगों को भी अपमानित किया है, जिनकी सामाजिक पृष्ठभूमि प्रभु वर्ग की नहीं है।
अपने साक्षात्कार में जोशी जी ने कहा है “विनोद कांबली का एटीट्यूड बना कर रखने और लेकर जाने का नहीं है। कुछ कर दिखाने का है।” अब जोशी जी को क्या यह बताना पड़ेगा कि कांबली जिस सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं, वहां सम्मान के साथ जीने की एकमात्र शर्त है- कुछ कर दिखाने का जज्बा। कभी-कभी तो कुछ कर दिखाने का जज्बा भी उनके जी का जंजाल बन जाता है। यकीन न आए तो खैरलांजी की घटनाओं को फिर से याद कर लीजिए। तस्वीर साफ हो जाएगी।
जोशी जी, बना कर और सहेज कर रखने का शऊर उन लोगों में ही पाया जाता है, जो धन-धान्य से परिपूर्ण होते हैं। ये “बनाने” और “सहेजने” का खेल ही है, जिसकी वजह से इस देश के करोड़ों लोग वंचितों में शुमार हैं। यों भी, ये सब आपको क्या बताना। क्योंकि हाल ही में आपने इस मसले पर “कागद कारे” किया था। जिस दयामनी बारला के समर्थन में लिखा-गरजा है आपने हाल में, उन्हें इसी “सहेजने-बनाने” की साजिश ने सड़क पर आने को मजबूर किया है।
खैर, इसी इंटरव्यू में जोशी जी ने एक जगह कहा है “जिन लोगों को सदियों से जिस प्रकार को काम को करने की ट्रेनिंग मिली है, वे उस काम को अच्छा करते हैं।” समाज की एक बड़ी आबादी, जिसे हम दलित-पिछड़ों के रूप में चिन्हित करते हैं, यह मानती है कि सदियों से समाज का प्रभु वर्ग (जिसमें ब्राह्मण सर्वोपरि हैं) उनका शोषण करता आ रहा है। अब जोशी जी, यह बताने का कष्ट करेंगे कि क्या सदियों से प्रभु वर्ग को समाज के एक हिस्से का शोषण करने की ट्रेनिंग मिली है। कहीं यही ट्रेनिंग तो उन्हें गोहाना कांड करने को तो नहीं उकसाती
आज भी देश की हिंदी पट्टी में सैंकड़ों ऐसे गांव हैं जहां ऐसी ही “ट्रेनिंग” पाने वाली जमात ने दलितों-आदिवासियों का जीना मुहाल कर रखा है। कई जगहों पर तो ऐसी जमातों ने बाकायदा “सेना” बना कर अपने हितों का संरक्षण किया है। चर्चा तो यहां तक है कि इन “सेनाओं” को प्रभु वर्ग के “प्रबुद्ध” लोगों का भी नैतिक और भौतिक समर्थन रहा है।
चलिए, आगे बढ़ते हैं। प्रभाष जी का कहना है कि अपने देश की प्रथा को अपने देश की परंपरा में देखना चाहिए। बिल्कुल ठीक, अपने देश की परंपरा कहती है कि छोटी उम्र के लोगों को बड़ी उम्र के लोगों का आदर करना चाहिए। लेकिन इस देश में हजारों ऐसे गांव हैं, जहां तथाकथित सवर्ण तबके के बच्चे को दलित-पिछड़े समुदाय का कोई बुजुर्ग पांव तक छूता तो दिख जाएगा, लेकिन क्या कभी आपने तथाकथित सवर्ण तबके के बच्चे तक को दलित-पिछड़े समुदाय के बूढ़े-बुजुर्गों को कम से कम आदर या सम्मान के साथ बात करते देखा है? तो कौन-सी परंपरा की बात करें हम आखिर?
इतना ही नहीं, इस देश में परंपरा से पुत्र को पिता की जाति का माना जाता है। इस हिसाब से राजीव गांधी ब्राह्मण कैसे हो गए प्रभाष जी। अब किसी को ब्राह्मण बताने के लिए अपनी ही परंपरा को आप कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं?
एक बात और। अपने “कागद कारे” कॉलम में इस देश की बाजारवादी नीतियों को पानी पी-पीकर कोसा है। अब जरा याद कीजिए कि बाजारवादी व्यवस्था की शुरुआत किस नेता के काल में शुरू हुई थी। आप और हम सभी जानते हैं कि इसकी शुरुआत उन्हीं नरसिंह राव के प्रधानमंत्री रहते हुई थी, जिन्हें प्रभाष जी ने अपने इंटरव्यू में एक अच्छा राजनेता इस आधार पर करार दिया कि वे ब्राह्मण थे। ये कैसा विरोधाभास है प्रभाष जी? विद्वानों का कहना है कि विरोधाभासों और पूर्वाग्रहों पर टिके विचारों की नींव बेहद कमजोर होती है। आप क्या कहते हैं प्रभाष जी?
(इस स्टोरी में छपी तस्वीर गोहाना कांड की है। हरियाणा का एक गांव जहां दलितों की बस्ती जला दी गई थी।)
इन्हें भी पढ़ें:
- सामाजिक "प्रभु" वर्ग की सियासी साजिश - August 18th, 2009




जे तूं बांभन बभनी का जाया।
आन द्वार काहे नहीं आया ।।
dear brethren,
i have asked many such type of question to you around 1500 years ago but you damn lazy hypocrite people have not replied yet. do reply as soon as possible.
here are some panda who have forcefully encroached alot of space in SVARG inspite of the originally being the resident of NARAK. let me tell you they have not left their habit of illegal encrochement pursued by them on the earth. these people told me that still their kins are spreading ugly casteism on the earth. if this true then plz gift all those stupid hollow minded a KABIR GRANTHAVALI…
sorry for promoting my own writing, but what you people say in hindi…इसी का जमाना है ??
dont forget to give answer of my such age old questions !!
i m eagerly waiting……
c u soon guys,
bba bi…
Dear Samrendra,
i was just passing through MOHALLA which has become LIVE (by the way i dont know wat it was earlier) !! i saw your name their n got reminded about you….i could not make it earlier coz u know d reason….offf, अरे बाबा, वही पुराना टाइम मैनेजमेंट का लोचा !!
your web portal is too good…. keep it up buddy !!
बहुत खूब रजनीश भाई। और हौर्स-ट्रेंिडंग यानि कि सांसदो की खरीद-फरोख्त शुरु करने का श्रेय भी तीस भाषाओं को जानने वाले विद्वान नरसिम्हा राव को ही जाता है।
पूरे प्रसंग में एक मुश्किल यह है कि मूल मुद्दे को अनदेखा करने की कोशिश की जा रही है। मामला यह है कि प्रभाष जोशी के अंतस से जो बातें निकली हैं, वह किस संस्कृति की बुनियाद पर तैयार होती है। ट्रैजेडी देखिए कि ब्राह्मणवाद एक ऐसे शख्स को भी अपना खोल उतारने के लिए मजबूर कर देती है, जो किसी मौकापरस्ती के कारण प्रगतिशीलता का चोला ओढ़ लेता है। प्रभाष जोशी भी प्रगतिशीलता का चोला ओढ़े एक वैसे ही ब्राह्मण हैं, जो व्यवस्था को हिंदू भी बनाए रखता है, उसके हिंदू बने रहने की कामना करता है, उसके सही होने की मनुवादी मुनादी करता है और “हिंदू होने का धर्म” लिख कर यह वहम पैदा करता है कि वह क्रांति कर रहा है। लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि प्रभाष जोशी ने उन पंडों जैसा काम किया है जो ब्राह्मणवाद के उद्दंड प्रतिनिधि हैं। असली ब्राह्मणवाद सब कुछ करके भी खुद को धवल और महान बनाए रखने में कामयाब होता है। वह दुनिया के इतिहास में सबसे लचीला वाद रहा है। “लचीला वाद” मतलब समझे न बंधुओं…!
achha vishletion
प्रभाष जी के कहे को जिस तरह से पढ़ा जा रहा है, उसे देख कर मुझे आश्चर्य हो रहा है. हिंदी का प्रबुद्ध समाज इस तरह लाठी लेकर उन्हें दौड़ाने पर तुला हुआ है…समाजशास्त्र में इसे ही भीड़ का तंत्र कहते होंगे, जहां जिसे मौका मिला, अपना हाथ साफ करने लग गया. प्रभाष जोशी जी के मामले में भी अधिकांश जगहों में यही हो रहा है. लोग बिना पूरा साक्षात्कार पढ़े गाली-गलौज पर उतर आये हैं.
प्रभाष जी को एक तरफ गुऱु कह रहे हैं, दूसरी ओर उनकी कुटाई की बात हो रही है. आपको किसने कहा था गुरु बनाने के लिए ? प्रभाष जी ने आपको आवेदन दिया था? नहीं न. तो फिर इतना हंगामा क्यों ? मत मानिए, उनको अपना गुरु और बंद करें यह रोना-धोना.
प्रभाष जी के कहे पर आप बहस कर रहे हैं, वह तो ठीक है, जो उन्होंने नहीं कही है, उस पर क्यों बहस कर रहे हैं ? उनके मुंह में शब्द डाल कर क्यों कहलवाना चाह रहे हैं ? इतना भदेसपन मत फैलाइए.
मैंने अपनी टिप्पणी दो और साइटों को भेजी थी, जहां प्रभाष जी बर लगातार बहस हो रही है. लेकिन दोनों ही साइटों ने उसे प्रकाशित नहीं किया. इससे समझ में आता है कि उनके यहां अपनी सुविधानुसार प्रतिक्रियाओं को छापने की चतुराई चल रही है. मैं उम्मीद करती हूं कि आप कम से कम मेरा पत्र जरुर प्रकाशित करेंगे.