सामाजिक “प्रभु” वर्ग की सियासी साजिश
लेखक: रजनीश | August 18, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment
इराक युद्ध के दौरान एक शब्द-युग्म खासा चर्चित हुआ था- “इम्बेडेड जर्नलिस्ट।” ये वैसे पत्रकार थे जिन्होंने अमेरिका और उसके मित्र देशों की फौज के साथ जुड़ कर युद्ध की रिपोर्टिंग की थी। इन रिपोर्टरों को अमेरिकी पक्ष के अलावा और कुछ भी दिखाने की छूट नहीं थी। लिहाजा, युद्ध के दौरान दुनिया ने वही देखा जो अमेरिका ने दिखाना चाहा। और यह सब संभव हुआ इन्हीं “आज्ञाकारी” यानी इम्बेडेड पत्रकारों की बदौलत। ठीक ऐसा ही कुछ हो रहा है आजकल हमारे देश में। यहां हाल के वर्षों में “इम्बेडेड जर्नलिज्म” के चलन ने खासा जोर पकड़ा है। अधिकतर अखबार और चैनल सिर्फ वही दिखा और परोस रहे हैं जो केंद्रीय और स्थानीय स्तर के शासकों को रास आती है। और उसे कार्यरूप वैसे संपादक और पत्रकार दे रहे हैं जिनकी रुचि राज्यसत्ता के करीबी बनने की है।
“नई दुनिया” के संपादक आलोक मेहता के “अरुंधती प्रसंग” और “प्रभात खबर” के संपादक हरिवंश के “नीतीश प्रेम प्रकरण” से यह बात और खुल कर सामने आई है। इन दिनों राज्यसभा में जाने वाले “दावेदार” पत्रकारों के बारे में चल रही अटकलबाजियां इस धारणा को यकीन में बदल रही हैं कि “आज्ञाकारी पत्रकारिता” का दौर अब यहां पूरे शबाब पर है। हाल में राज्यसभा की सदस्यता से रिटायर हुए “पायनियर” के संपादक चंदन मित्रा के ताजा वक्तव्य पर अगर गौर करें तो “इम्बेडेड जर्नलिज्म” का एक खास नक्शा हमारे सामने आता है। चंदन लिखते हैं कि विभिन्न संसदीय समितियों में बैठते हुए और सांसद मित्रों से मिलते हुए मिली कई अहम जानकारियों को कई मौकों पर अपने अखबार का स्कूप बनाने के लालच से बचना पड़ा।
यह ठीक है कि सुरक्षा से जुड़े हर मसलों को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। लेकिन क्या ऐसा कभी नहीं हुआ होगा कि चंदन मित्रा की तत्कालीन शासक से जुड़ी प्रतिबद्धताओं ने उन्हें सरकार के किसी जनविरोधी कदम का खुलासा करने से न रोका हो? हाल के वर्षों के अनुभवों के आधार पर अगर कहा जाए तो राज्यसभा का “पुरस्कार” किसी संपादक या पत्रकार को तभी मिला है जब राज्यसत्ता उससे “खुश” हुई हो। राज्यसत्ता को खुश करने का जतन एक संपादक या पत्रकार किस-किस तरीके से कर सकता है, यह आसानी से समझा जा सकता है।
अब सवाल यह है कि राज्यसत्ता और मीडिया के इस गठबंधन के पीछे का असली “खेल” क्या है। इसे समझने के लिए राज्यसत्ता, पूंजीपति, मीडिया और बाजार के बीच के रिश्तों और उनकी बुनावट को बारीकी से खंगालना होगा। ध्यान से देखने पर यह साफ होता है कि राज्यसत्ता और मीडिया पर वास्तविक नियंत्रण समाज के प्रभु वर्ग का है। यह बात अनिल चमड़िया के लेख से तस्दीक की जा सकती है। जिसमें उन्होंने यह तथ्य पेश किया था कि इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट- समाचार के दोनों माध्यमों में, खासतौर पर निर्णय लेने वाले सभी पदों पर किस तरह समाज के प्रभु वर्ग या सवर्ण तबके का कब्जा है। जाहिर है, मीडिया में जो कुछ भी आता रहा है या आ रहा है, उसके पीछे यह समीकरण पूरी तरह अपनी सक्रिय भूमिका निभाता है। इस वर्ग का अंतिम मकसद समाज के वंचित तबकों को “धकिया” कर संसाधनों पर ज्यादा से ज्यादा कब्जा जमा कर अपने वर्चस्व को लगातार मजबूत करते जाना है। और, ऐसा करते हुए लोकतंत्र के भ्रमजाल को भी बनाए रखना है, ताकि “बगावत” की “आशंका” को भरसक दूर रखा जा सके। यह तभी संभव है जब वंचित जमात का ध्यान मूल मुद्दों से भटकाए रखा जा सके, ताकि उन्हें अपनी हीन स्थिति का भान तक न होने पाए।
बस यहीं से शुरू होता है राज्ससत्ता और मीडिया का जुड़ाव। मीडिया को (संपादक-पत्रकार की शक्ल में) नियंत्रित करने वाला प्रभु वर्ग वास्तविक मसलों को दरकिनार कर खबर के नाम पर “गड्ढे में गिरे प्रिंस” की स्टोरी और मनोरंजन के नाम पर “राखी सांवत का स्वंयवर” और “सच का सामना” जैसे सतही कार्यक्रम परोसने लगता है। खबर और मनोरंजन के नाम पर दिनोंदिन बढ़ते “स्वर्ग की सीढ़ियां” और “बिग बॉस” सरीखे कार्यक्रमों के पीछे असली मकसद आम आदमी के ध्यान को ज्यादा से ज्यादा देर तक भटकाए रखना है।
यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि असली “कंट्रोल” तो पूंजीपति और बाजार के हाथ में है। लेकिन बारीकी से देखने पर साफ हो जाता है कि यहां पूंजी के मालिक वही हैं, जिनकी सामाजिक पृष्ठभूमि प्रभु वर्ग की है। और बाजार उनके लिए एक तर्क का काम करता है, जिसकी ओट में वे संसाधनों पर कब्जा जमाए रखने या नया कब्जा करने का काम बिना किसी रोक-टोक के जारी रखते हैं और आम आदमी को भरमाए रखते हैं।
(रजनीश एक अंग्रेजी पाक्षिक पत्रिका के संपादक हैं )
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रजनीश बाजार, पूंजी और सामाजिक सत्ता की साजिशों की उन तहों तक ले जाते हैं जिसका सामना करने या जिस पर बात करने से भी हम घबराने लगते हैं।