अमेरिका में निकलेगी “टीआरपी” की हवा!
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 17, 2009 | देश-दुनिया, मुद्दा | Comments Off
टीआरपी का लफड़ा सिर्फ़ भारत में नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में है। हर जगह इस टीआरपी ने टेलीविजन चैनलों में काम करने वालों की ज़िंदगी में चरस बो दिया है। अमेरिका में तो मीडिया कंपनियां इतनी परेशान हैं कि उन्होंने टीआरपी मापने वाली कंपनी नील्सन मीडिया रिसर्च को चुनौती देने का मन बना लिया है।
अमेरिकी अख़बारों में छपी ख़बरों के मुताबिक नील्सन मीडिया रिसर्च के ख़िलाफ़ मीडिया कंपनियों ने एक बड़ा संघ तैयार किया है। इस संघ में एनबीसी, वायाकॉम, न्यूज़ कॉर्प, डिस्कवरी और डिजनी समेत कई बड़ी कंपनियां शामिल हो गईं हैं। उनकी इस मुहिम में प्रॉक्टर एंड गैंबल, एटीएंडटी, यूनिलीवर जैसी कई बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं जो विज्ञापन पर अरबों रुपया खर्च करती हैं। एक सर्वे के मुताबिक अमेरिका में हर साल 70 अरब डॉलर विज्ञापन पर खर्च होते हैं। अमेरिका की दो सबसे बड़ी विज्ञापन कंपनियां ग्रुप एम और स्टारकॉम मीडिया वेस्ट ग्रुप भी उनके साथ है।
यह संघ अभी नील्सन मीडिया रिसर्च को चुनौती देने की रणनीति पर विचार कर रहा है। संघ की कोशिश है कि वो ऑडियंस रिसर्च सर्विस देने वाले एक कंपनी की स्थापना कर दे। जो मीडिया कंपनियों और विज्ञापन देने वाली कंपनियों की जरूरतों को ध्यान में रख कर रिसर्च करे। जिसके रिसर्च का तरीका ज्यादा वैज्ञानिक हो। न केवल टेलीविजन बल्की मोबाइल और इंटरनेट इस्तेमाल करने वाली ऑडियंस का भी सर्वे किया जाए। इस सेवा के लिए ये संघ जल्दी ही बाहर की कंपनियों से प्रस्ताव मंगाएगा। जिसका प्रस्ताव बेहतर होगा उसे ये ठेका दे दिया जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो नील्सन मीडिया रिसर्च के कारोबार पर कुठाराघात समझिए।
दरअसल, अमेरिकी मीडिया के एक बहुत मजबूत धड़ा ये मानता है कि नील्सन मीडिया रिसर्च का तरीका सही नहीं है। कई बार मीडिया कंपनियों का नील्सन से टकराव हो चुका है। आखिरी टकराव 2003 में हुआ था जब नील्सन ने कहा कि टीवी देखने वाले युवाओं की संख्या में भारी गिरावट आई है। ऐसा क्यों हुआ ये पूछने पर नील्सन मीडिया रिसर्च कोई ठोस जवाब नहीं दे सका। और तो और उसने अपनी कोई गलती भी नहीं मानी। ऐसी ही कुछ वजहे हैं जिनकी वजह से मीडिया कंपनियां उससे ख़फा हैं।
जानकारों के मुताबिक नाराजगी अपनी जगह है और मीडिया रिसर्च का काम अपनी जगह। अगर ये संघ ऐसी कोई संस्था खड़ा करना भी चाहेगा तो भी ये काम उतना आसान नहीं है। सबसे पहले तो उसे यह तय करना होगा कि उस संस्था का ढांचा कैसा होगा। रिसर्च के तरीके पर तो बात बाद में होगी। मतलब चुनौतियां अभी काफी बड़ी हैं और उन्हें पूरा करने में लंबा वक़्त लग सकता है।
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