राज्यसभा की रेस में हैं कई दिग्गज पत्रकार!

राज्यसभा से बीते हफ़्ते मनोनीत सदस्यों की विदाई हो गई। विदा होने वालों में चंदन मित्रा भी रहे। राज्यसभा से जिस दिन विदाई हुई बताया जाता है कि चंदन मित्रा भावुक हो गए। सत्ता और भावुकता के बीच रिश्ता ही कुछ ऐसा है। जो कोई भी सत्ता से जाता है वो भावुक हो जाता है। लेकिन यहां मुद्दा भावुकता का नहीं है। मुद्दा है कि फिर से कुछ नामी गिरामी चेहरे राज्यसभा के लिए मनोनीत होने वाले हैं। चंदन मित्रा के जाने से जो स्थान खाली हुआ है उसे भरने के लिए कई बड़े पत्रकारों के नाम चर्चा में हैं। सत्ता के गलियारों से छन छन कर जो ख़बर आ रही है, उसके मुताबिक शेखर गुप्ता, आलोक मेहता, वीर सांघवी, विनोद मेहता , पंकज वोहरा और मृणाल पांडे राज्यसभा की रेस में हैं।

शेखर गुप्ता इंडियन एक्सप्रेस के संपादक हैं। एनडीटीवी पर वॉक द टॉक भी करते हैं। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री के घर और दफ़्तर में उनकी डायरेक्ट एंट्री है। वो कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के करीबी हैं। यही नहीं बीते कुछ साल से बहुत मुखर हो कर यूपीए सरकार का बचाव कर रहे हैं। हाल ही उन्होंने बलूचिस्तान मुद्दे पर सरकार की खुलकर तारीफ़ की। मनमोहन सिंह की लाइन वी हैव नथिंग टू हाइड के फलसफे पर काफी कागद कारे किए। पिछले कार्यकाल में भी जब भी लेफ्ट फ्रंट ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम को लेकर दबाव बढ़ाया था तो शेखर गुप्ता ने मनमोहन के समर्थन में धारदार तर्क दिए। एक बार तो उन्होंने लिखा कि जनता ने 24 पन्नों के न्यूनतम साझा कार्यक्रम के लिए वोट नहीं दिया था। तब एक पाठक ने शेखर गुप्ता को बताया था कि इस देश की जनता ने मनमोहन सिंह के लिए वोट नहीं दिया था। इस बार तो कांग्रेस ने मनमोहन सिंह को ही आगे रख कर चुनाव लड़ा। जीत हासिल हुई और शेखर गुप्ता को कहने के लिए यह मुद्दा भी मिल गया है कि जनता ने मनमोहन सिंह के लिए वोट किया है। इसलिए वो सरकार का बचाव कुछ ज्यादा ही खुल कर कर रहे हैं। दावेदारी पुख़्ता है।

राज्यसभा की दौड़ में दूसरे दावेदार हैं आलोक मेहता। हिंदी के कुछ पत्रकार तो यहां तक कह रहे हैं कि उनकी सीट तय है। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से उनके रिश्ते बहुत अच्छे हैं। राष्ट्रपति पद के लिए जब प्रतिभा पाटिल का मुक़ाबला बीजेपी के भैरों सिंह शेखावत से हो रहा था तब आलोक मेहता ने प्रतिभा पाटिल के पक्ष में जोरदार हवा बनाई थी। आम चुनाव में भी उन्होंने खुल कर कांग्रेस का समर्थन किया। यही नहीं अब तो वो सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे अरुंधति रॉय जैसे लोगों को भी ठिकाने लगाने में जुटे हैं। साफ है कि आलोक मेहता में एक “अच्छे कांग्रेसी” के सारे लक्षण हैं। लिहाजा उनकी भी दावेदारी पुख़्ता है।

इस दौड़ में तीसरे पत्रकार हैं वीर सांघवी। वीर सांघवी हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक रह चुके हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की नीति के बारे में तो सब जानते हैं। वो मध्यमार्गी नीति है। न लेफ्ट न राइट। ठीक सेंटर में। वीर सांघवी की विचारधारा भी कांग्रेस से मेल खाती है। कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक वो भी राज्यसभा की रेस में आगे चल रहे हैं।

चौथे धावक हैं आउटलुक के विनोद मेहता। आउटलुक ने हमेशा से साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की है। बीजेपी को निशाने पर रखा है। ये बात कौन नहीं जानता कि आउटलुक के इस तेवर के पीछे विनोद मेहता हैं। विनोद मेहता के यही तेवर उन्हें कांग्रेस के करीब लाते हैं। कुछ लोग राज्यसभा के लिए उनका नाम भी आगे बढ़ा रहे हैं।

पंकज वोहरा हिंदुस्तान टाइम्स के राजनीतिक संपादक हैं। घाट घाट का पानी पी चुके पंकज का भी नाम कुछ लोग उछाल रहे हैं। राजनीतिक हलके में उनकी भी अच्छी पैठ है। कांग्रेस में उनके समर्थकों की भी कमी नहीं है। हालांकि अभी वो रेस में पीछे नज़र आ रहे हैं।

मृणाल पांडे को कौन नहीं जानता। हिंदुस्तान का कांग्रेस प्रेम जग जाहिर है। लेकिन इन दिनों सरकार की तारीफ़ कुछ ज़्यादा ही हो रही है। मेट्रो हादसे के वक़्त हमने देखा कि कैसे शीला दीक्षित और श्रीधरन दोनों का बचाव किया गया। बलूचिस्तान मसले पर कांग्रेस के पक्ष के अलावा शायद ही कुछ छपा। उन्हीं जानकारों की राय छापी गई जिनकी राय सरकार से मेल खाती थी। विपक्ष के बयानों को भी दस फ़ीसदी से अधिक जगह नहीं मिली। कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि ऐसा करके मृणाल पांडे ने कई बड़े नेताओं का दिल जीत लिया है। लेकिन वो ये भी कहते हैं कि तमाम कोशिशों के बावजूद अभी उनकी दावेदारी गंभीर नहीं मानी जा रही।

जाते-जाते एक सूचना यह भी दे दें कि कई अख़बारों और पत्रिकाओं में सरकार विरोधी ख़बरें रोक दी गई हैं। इंतज़ार है राज्यसभा के लिए मनोनीत लोगों की सूची सार्वजनिक होने का। उसके बाद कुछ अख़बारों और कुछ न्यूज़ चैनलों के तेवर में तीखा बदलाव आ सकता है। जनतंत्र की तो इस पर पैनी नज़र रहेगी। आप भी अपनी तरफ़ से नज़र रखिएगा। यह भी कि इन दिनों किस पत्रकार की कलम सरकार की तरफ़ कितनी झुकी है।

इन छह पत्रकारों में आप किन दो पत्रकारों को पसंद करेंगे। इनके अलावा भी अगर कोई आपकी पसंद हो तो उसके बारे में बताएं। राज्यसभा जाने योग्य कोई सातवां पत्रकार!

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Comments

18 Responses to “राज्यसभा की रेस में हैं कई दिग्गज पत्रकार!”
  1. Sanjay Kumar Singh says:

    वीर सांघवी मैदान में हैं तो पंकज वोहरा और मृणाल पांडे वैसे ही कमजोर हैं। सत्ता विरोधी माने जाने वाले प्रतिष्ठान -एक्सप्रेस समूह के कर्ता-धर्ता शेखर गुप्ता सफल रहे तो यह संस्थान की साख पर धब्बा ही होगा। उनकी साख चाहे जैसी हो एक्सप्रेस की साख उन्हें कामयाब होने देगी इसपर शक है। आउटलुक के संपादक चाहे जितने कांग्रेस भक्त हों, लगता नहीं है कि कांग्रेस की गलतियों को कुतर्कों के सहारे ठीक ठहराने का काम करेंगे या कर पाएंगे। ऐसे में बचते हैं आलोक मेहता और वीर सांघवी। देश की राजनीति हिन्दी पट्टी से चलती है। राज्य सभा के सदस्य सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति मनोनित करेंगी और आलोक मेहता उनके करीबी है। सेटिंग-गेटिंग में भी आलोक मेहता के मुकाबले आपके कोई दावेदार कहीं नहीं टिकेंगे। मेरे हिसाब से आलोक मेहता। आपकी पूरी खबर का संक्षेपन (मैंने संपादन नहीं लिखा है) कर दिया जाए तो यही बचता है। बताइए आपकी राय क्या है ?

    • सुधीर शर्मा says:

      संजय जी,
      जैसे चंदन मित्रा हिंदी बेल्ट के थे, वैसे ही शेखर गुप्ता और वीर सांघवी भी हिंदी बेल्ट के ही हैं।

  2. संजय कुमार सिंह says:

    राज्यसभा जाने योग्य सातवें नहीं पहले पत्रकार निश्चित रूप से प्रभाश जोशी हैं। पर इस बारे में ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है। सवाल हमारी पसंद का नहीं, राजनीति का है।

  3. सुधीर शर्मा says:

    बेस्ट नाम तो रजत शर्मा हैं। अकेले उन्होंने ख़बरों की दिशा बदल दी। उनके फैशन को सब फॉलो कर रहे हैं। मुद्दों की बात कोई नहीं करता। सरकार के लिए इससे अधिक अच्छी बात क्या हो सकती है। मुद्दों की बात होती तो किरकिरी हो सकती थी। लेकिन सब भूतनाथ और अंधविश्वास में ऐसे उलझे हैं कि बाकी समस्याएं गौण हो गई हैं। जय बाबा भूत नाथ की… जय बाबा रजत शर्मा की… सरकार को चाहिए कि उन्हें राज्यसभा भेज कर उनके अहसानों का कर्ज चुकाए।

  4. राजेश पांडे says:

    इनमें से शेखर गुप्ता और वैसे प्रभाष जोशी

  5. विद्रोही says:

    हिंदी भाषी और हिंदी पाठक होने के नाते मुझे लगता है कि आलोक मेहता या मृणाल पांडे में किसी एक को भेजना चाहिए। इन दोनों के घटिया लेखन-संपादन से निजात मिलेगी।

  6. आई एम नागार्जुन says:

    काबिलियत, निष्पक्षता और ईमानदारी ही वो शर्तें हैं जिनके आधार पर किसी पत्रकार को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया जा सकता है। लेकिन बीते कुछ साल में पत्रकारों को संसद भेजने की इकलौती शर्त हो गई है सियासी आस्था। जिस पत्रकार की सियासी आस्था सत्ताधारी पार्टी या गठबंधन से जुड़ी होती है उसे राज्यसभा के लिए मनोनित कर दिया जाता है। चंदन मित्रा भी लाख यह कहें कि उन्होंने कोई समझौता नहीं किया था, लेकिन ये तो सब जानते हैं कि वो भगवा रंग में रंगे हैं और इसलिए वाजपेयी सरकार के दौरान राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए। ऐसे में अब तो यही सवाल उठता है कि जब पत्रकारों को सियासी कार्यकर्ता और नेता की तरह ही व्यवहार करना है तो भी मनोनीत करके संसद भेजने की क्या जरूरत? उन्हें संसद में बैठने का इतना ही शौक है तो लोकसभा या राज्यसभा का चुनाव लड़वा कर संसद भेजिए।

    यहां पर कुछ लोग हिंदी बेल्ट का हवाला दे रहे हैं। हिंदी बेल्ट क्या होता है और हिंदी पत्रकार क्या? पत्रकारिता को आप क्षेत्र, जाति, धर्म और भाषा के बंधन से मुक्त कीजिए। पत्रकार किस भाषा, क्षेत्र, धर्म और जाति से है इससे उसकी नागरिकता पर क्या फर्क पड़ता है? वो कोई भी और कहीं का भी हो अगर उसकी कलम में दम है, ईमानदार है और वरिष्ठ भी तो उसे संसद के लिए मनोनीत किया जा सकता है।

    अगर पत्रकारिता के क्षेत्र में काम को एक पैमाना बनाया जाए तो जितने भी पत्रकारों का नाम दिया गया है उनमें से शेखर गुप्ता, विनोद मेहता और वीर सांघवी की दावेदारी बनती है। रही बात प्रभाष जोशी जी की तो उन्हें बहुत पहले ही राज्यसभा के लिए मनोनित कर देना चाहिए था। लेकिन तब ऐसा नहीं हुआ और अब प्रभाष जोशी ऐसा कोई काम नहीं कर रहे हैं कि उन्हें संसद भेजा जाए।

  7. यदि खांटी पत्रकारीय काबिलियत के आधार पर मनोनयन के लिए लिए मेरी पसंद पूछें तो मैं राम बहादुर राय का नाम लूंगा। लेकिन जैसा कि सभी जानते हैं मैंने आधार ही गलत चुना है लिहाजा मेरी ये पसंद बेमानी हो जाती है। वैसे एक और नाम मैं सुझाना चाहूंगा लेकिन प्रिंट नहीं टीवी की दुनिया से। वही यथार्थ (पत्रकारिता) नहीं गल्प (टीवी सीरियल) की दुनिया से… जी हां आपने ठीक समझा… मैं टीवी की क्रांतिकारी एकता कपूर की ही बात कर रहा हूं।

    सास-बहू झगड़ा लगाऊ, देश की सबसे बड़ी घर फोड़क-जोड़क टेलीविजन फिक्शन की दुनिया की महारानी एकता कपूर पर के नाम पर देश की महारानी को गौर कर करना चाहिये। बदले में एकता देश की समस्याओं से जनता का ध्यान हटाने के लिए सास-बहू दीखाती रहेंगी और सरकार बिना हील-हुज्जत के अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी।

  8. Ganesh Prasad Jha says:

    किसी भी पत्रकार को लोकसभा या राज्यसभा या फिर राज्यों की विधानसभाओं में नहीं जाना चाहिए. पत्रकारों को तो राजनीति से हमेशा अलग रहकर पत्रकारिता के जरिए ही देश और समाज की सेवा करनी चाहिए. क्योंकि राजनीति में जाकर पत्रकार अपना पत्रकारीय धर्म भूल जाता है. सांसद रहते हुए अखबारों में कुछेक लेख लिख देना पत्रकारीय दायित्वों का निर्वाह नहीं है. क्योंकि राजनीति में जाने के बाद कलम से निकलनेवाले अक्षर निष्पक्ष नहीं रह जाते. अव्वल तो पत्रकारों के लिए राजनीतिक महत्वाकांक्षा पालना ही सर्वथा अनुचित है. मेरा अपना अनुभव है कि मेरे जनसत्ताई मित्र संजय निरूपम जब से राजनीति में गए (पहले राज्यसभा में और अब लोकसभा में) हैं, बदल गए हैं. उनके सरोकार भी बदल गए हैं. पत्रकारिता से भी उनका अब कोई सरोकार नहीं रहा. साथी पत्रकारों को वे भूल चुके हैं. उनकी नई दुनिया है जो पत्रकार नित्रों की नहीं, राजनैतिक मित्रों की है. जाहिर है उनकी चिंतन की दिशा भी कब की करवट ले चुकी होगी. एसा भी इतने सालों में अब तक कभी नहीं सुना कि उन्होंने संसद में कभी देश में पत्रकारों की दुर्दशा या फिर उनकी स्थितियों और मूलभूत समस्याओं पर कोई बहस छेड़ने की कोई कोशिश की हो. इस तरह तो यह बात भी नहीं हुई न कि अपना कोई पत्रकार साथी संसद जाएगा तो वहां हमारी समस्याओं को सरकार के सामने लाने की कोशिश करेगा. एसी कोशिश संसद गए कभी किसी पत्रकार ने आज तक नहीं की चाहे वो अपने लंगोटिया संजय निरूपम हों या फिर बड़े पत्रकार अरुण शौरी, चंदन मित्रा या कोई और.

  9. vicky says:

    deepak chourasia

  10. Ranjeet says:

    Alok mehta jaisa bada naam Hindi Media me is samay koi yaad nahin aata. Ye bekar ke chhutbhaiye sadak chhap tathakathit patrakar jo khali baithey huye hai, unka kaam hi hai dusaro per keechad uchhalna. Alok Mehta yadi Rajyasabha ke liye chune jaatey hain to ek tarah se Hindi patrakarita sammanit hogi. Jis adami ke paas lagbhag 40 saal ka patrakrita ka anubhav ho, usey aap youn hi nahin nakar saktey. Mera manana hai ki Hindi Patrakarita me Alok Mehta ke aas-pas bhi koi nahin thaharta.

  11. Sukesh bandhu says:

    Hindi Sampadako me Rajendra Mathur ke baad agar koi naam juban per aata hai to vah hai Alok Mehta ka. Mathurji ke jaane ke baad hindi patrakarita me jo khalipan aa gaya tha, kafi had tak Alok Mehta ne use bhar diya hai. Aisey vidwan Sampadak ko Rajya Sabha me jana hi chahiye. Itna bada naam to hindi patrakarita me nazar nahi aata.

  12. राजेश पांडे says:

    लगता है कि सुकेश बंधु और रंजीत दोनों की आंखे पथरा गईं हैं। या फिर आलोक मेहता से कोई बेहद निजी स्वार्थ जुड़ा है। वरना कोई भांटगीरी की सीमा इस कदर नहीं लांघता। आलोक मेहता “कितने बड़े” “क्या” हैं ये तो पूरी दुनिया जानती है और कुछ दिन में जो नहीं जानते हैं वो भी जानने लगेंगे।

  13. रंगनाथ सिंह says:

    मैं जनहित में अपना नाम इस पद के लिए प्रस्तावित करता हूँ। उम्मिद करता हूँ कि सभी युवा पत्रकार राग-द्वेष से ऊपर उठकर मेरे नाम का अनुमोदन करेंगे।

    इस प्रस्ताव के साथ ही मैं जनतंत्र से माँग करता हूँ कि वो इस मंच से राज्य सभा जाने की न्यूनतम आयु सीमा घटाने की माँग करे जिससे मेरा संसद जाना संभव हो सके।

    • रंगनाथ जी की उम्मीदवारी को मेरे पूरा समर्थन है और शुभकामना भी। रही बात आपकी बाली उमर की… तो मुझे उम्मीद है कि जनतंत्र इस मुद्दे को भी पूरी शिद्दत से उठायेगा।

      • रंगनाथ सिंह says:

        शशि जी मैं आपका बहुत आभारी हूँ। आपके समर्थन के बाद मेरा लोकतंत्र में विश्वास बढ़ा है। उम्र वाले मामले में मेरे पास पुरजोर दलील है जनतंत्र उसे आगे बढ़ाए तो कुछ भला हो। कानूनी तौर पर राज्य सभा जाने की जैविक उम्र तीस साल है। लेकिन जैविक उम्र जैसी क्षणिक चीज के बजाए मैं चंदन मित्रा की ही तरह ग्रे हेयर वाले पक्ष पर जोर देना चाहुँगा। ग्रे हेयर के आधार पर मैं इन सभी को कड़ी टक्कर दे सकता हूँ। उम्मीद करता हूँ सभी साथी अपना सहयोग देंगे।

  14. आशुतोष says:

    समरेंद्र भाई अपना नाम भी तो आगे लाओ. लोगों को गरियाने से लेकर तीन-पाँच करने के सारे नेताओं वाले गुण तो आपमें है ही. फिर बातों में मिर्च मसाला की कला भी आती है…. आप क्यों नहीं ट्राई मारते.

  15. birendra says:

    Babhan aur Baniya ke dayare se nikaliye

    aapne jin patrakaron ke nam ginayen hai sab ke sab babhan & baniya hi hain. is dayare se bahar nikal kar bhi sochiye. aur bahut sare nam mil jayenge. ye sab baniya ke tukadon par palane valen hain. inka koi samajik sarokar nahin hain. A/C me baith kar duniya ko dekhaten hain. main kisi nam ka sujhan nahin de raha hun, par yogendra yadav jaise patrakar & samikshak hi rajya sabha ke yogya hain. jantantra ko bhia aise nam par bahas ki shuruat karani chahiye.
    dhanyabad.