क्या मुंबई हमले में आईएसआई का हाथ नहीं था?
लेखक: प्रभात शुंगलू | August 6, 2009 | ब्लॉग | 3 Comments
संसद में शर्म अल-शेख के ज्वाइंट स्टेटमेंट पर जवाब देते हुये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि उन्हें विपक्षी पार्टियों से विदेश नीति चलाने का पाठ नहीं पढ़ना है। लेकिन जो पिछले साठ साल में भारत-पाक विदेश नीति में कभी नहीं हुआ, वो गिलानी के साथ चंद मिनटों की मुलाकात में मनमोहन सिंह ने कर दिखाया। 26 नवंबर को मुंबई में आतंकवादी हमले के बाद पहला मौका था जब दोनो देश ज्वाइंट स्टेटमेंट पर राजी हुए। मगर ज्वाइंट स्टेटमेंट के प्रारूप से ये लगा मानो मुंबई पर हमला आईएसआई और मुजाहिद्दीनों की मिलीभगत से नहीं बल्कि रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ ने करवाया हो जिसके लिये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गिलानी को सबूत देने शर्म अल-शेख में मिले हों।
मनमोहन सिंह की माने तो जब गिलानी ने उन्हें मुंबई हमले की जांच की कार्रवाई को लेकर शर्म अल-शेख में डोसियर सौंपा तो उनका दिल पसीज गया। उन्होंने तभी मन बना लिया कि चाहे आतंकवादियों को सजा मिले या न मिले… चाहे हफीज सईद को पाकिस्तान सरकार जेल से रिहा करवा दे… चाहे मुंबई हमले की जांच में कोताही बरती जाये… चाहे पाकिस्तान अपने ज़मीन पर आतंकवादियों के ट्रेनिंग कैंप बंद करने के कोई ठोस सबूत दे या न दे… वो तो पाकिस्तान से बात ज़रूर करेंगे। मनमोहन का पाकिस्तानी हुक्मरानों पर अचानक भरोसा बढ़ गया। इसकी वजह पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन हैं। उन्हीं से प्रेरित होकर मनमोहन ने कहा कि भरोसा करो पर साथ में जांचो परखो भी। जिस रीगन ने अफगानिस्तान में रूस के ख़िलाफ़ मुजाहिद्दीनों को अस्त्र-शस्त्र सप्लाई करने का ठेका पाकिस्तान को सौंपा था, जिस अमेरिकी प्रशासन ने तालिबानियों को चमकाया, जिस अमेरिका ने 911 से पहले अलकायदा और ओसामा की करतूतों को अपने फायदे के लिये नज़रअंदाज किया, वो रीगन और वही अमेरिकी प्रशासन हिंदुस्तान की फॉरेन पॉलिसी तय करने में डॉक्टर मनमोहन सिंह की मदद कर रहे हैं। इसीलिये शायद मनमोहन सिंह पड़ोसी होने के नाते पाकिस्तान से दोस्ती की मिसाल कायम करने में इतनी दूर चले गये कि जहां से लौटना उनकी सरकार और पूरे हिंदुस्तान के लिये एम्बैरेस्मेंट (शर्मिंदगी) का सबब बन गया।
ज्वाइंट स्टेटमेंट केवल बातचीत दोबारा शुरू करने तक ही सीमित रहती तो भी मनमोहन को उनके और उनकी सरकार के पुराने वक्तव्यों का हवाला देते हुए, थोड़ा मीन-मेक निकालते हुये, थोड़ा सावधान करने हुये, विदेश नीति के मूल मंत्रों का हवाला देते हुए, लीक पर बने रहने की गुजारिश की जा सकती थी। लेकिन फिर गिलानी साहब की गुजारिश का क्या होता? जो उन्होने मनमोहन सिंह से शर्म अल-शेख में की। मनमोहन के ही मुताबिक गिलानी ने उनसे बलूचिस्तान का जिक्र किया। और बताया कि बलूचिस्तान को लेकर पाकिस्तान में भारत के मंसूबों को शक की निगाहों से देखा जा रहा है। बस इतना कहना था कि मनमोहन सिंह पिघल गये। इसलिये कह आये गिलानी जी आप की प्राब्लम यानी हमारी प्राब्लम। नो प्रॉब्लम, इस पर भी बात हो जायेगी। इतना सुन कर गिलानी धन्य हो गये। चौड़े होकर इस्लामाबाद लौटे जहां जनता और सेना ने उनकी दूरंदेशी के लिये उनका इस्तेकबाल किया। उधर गिलानी पाकिस्तानी जनता की वाहवाही लूट रहे थे इधर मनमोहन सिंह के लिये प्रॉब्लम ही प्रॉब्लम खड़ी हो गयी हैं। कांग्रेस पार्टी ने भी मनमोहन और उनके ‘विजनरी’ सोच से विजनरी दूरी बना ली। सोनिया गांधी मनमोहन के साथ खड़ी थीं भी और नहीं भी। विदेश सचिव शिव शंकर मेनन को ये ज्वाइंट स्टेटमेंट महज ‘बैड ड्राफ्टिंग’ लगा मगर कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में सोनिया गांधी ने बलूचिस्तान शब्द का जिक्र तक न करके मनमोहन सिंह को ओवरड्राफ्टिंग का जिम्मेदार ज़रूर ठहरा दिया।
प्रधानमंत्री को इसका जवाब देते नहीं बन रहा। संसद में अपने भाषण के दौरान उन्होंने कई बार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जिक्र किया। पाकिस्तान को लेकर उनकी दूरंदेशी की सराहना की। अपने डिफेन्स में ये भी कहा कि करगिल और कंधार हाईजैकिंग के बावजूद वाजपेयी ने जनरल मुशर्रफ को बातचीत के लिये आगरा बुलाया। उन्हीं की तर्ज पर अगर वो भी पाकिस्तान से बातचीत का रास्ता बना रहे तो इसमें ग़लत क्या है। लेकिन करगिल एक सैनिक कार्यवाही थी। जिसका जवाब भारत ने ऑपरेशन विजय के जरिये दिया और उसे विजय भी मिली। इंडियन एयरलाइंस विमान आईसी 814 की हाईजैकिंग तालिबानी चाल थी जिसका पटाक्षेप अफगानिस्तान के कंधार शहर में हुया। जिसमें बातचीत तालिबानियों और मुल्ला उमर से की जा रही थी। सवाल था यात्रियों के बदले कुछ खूंखार आतंकवादियों को रिहा करने का। इस हाइजैकिंग में भी तालिबानियों को पाकिस्तानी आईएसआई का पूरा समर्थन था। लेकिन मुंबई हमला करगिल और कंधार से बिल्कुल अलग था। ये भारत की सुरक्षा प्रणाली पर हमला नहीं था बल्कि भारत को विखंडित करने की सोची समझी साजिश थी। हिंदुस्तान के मुंह पर करारा तमाचा था। आतंकवादी पाकिस्तानी थे। सबूत के तौर पर अजमल कसाब हिंदुस्तान के कब्जे में है। पाकिस्तान भले इस आतंकवादी हमले को नॉन-स्टेट एक्टर्स (यानी हुक्मरानों के समर्थन के बिना) की कार्रवाई बता कर अंतर्राष्ट्रीय दबाव पर लगाम लगाने की कोशिश करे मगर इस बात के साफ़ संकेत मिलते हैं कि इतनी बड़ी साजिश बिना आईएसआई के समर्थन के मुमकिन नहीं थी। जिस तैयारी के साथ वो दस आतंकवादी भारत और मुंबई पहुंचे, जिस बड़े पैमाने पर उन्होंने बम, हथगोलों और गोलियों का जखीरा बना कर तीन दिन तक मुंबई में कोहराम मचाया और निर्दोष लोगों के खून से होली खेली उससे साफ़ था कि महज नॉन-स्टेट एक्टर्स के भरोसे इतने बड़े आतंकवादी कार्यवाही को अंजाम नहीं दिया जा सकता। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में पाकिस्तान की दी हुई लाइन भी खरीद ली कि मुंबई हमला दरअसल नॉन-स्टेट एक्टर्स ने अंजाम दिया था। यानी मनमोहन सिंह चाहते हैं कि हिंदुस्तान की जनता ये माने की 26 नवंबर के मुंबई हमले में आईएसआई का कोई रोल नहीं था।
युद्ध न हो इसके लिये बातचीत जरूरी होती है। लेकिन ताली एक हाथ से नहीं बजती। जब कोई पड़ोसी मुल्क अपनी गलतियों को न स्वीकारे और उस पर पर्दा डालने की कोशिश करे तो बातचीत का आगाज करने की इतनी जल्दबाजी समझ नहीं आती। और वो भी अपने एजेंडे से कॉम्प्रोमाइज करने के बाद। ज्वाइंट स्टेटमेंट में बलूचिस्तान एक बहुत बड़ा कॉम्प्रोमाइज था। कोई दूसरा देश होता तो बलूचिस्तान में गड़बड़ियां फैलाने के बावजूद झूठ बोल देता कि हमें उससे कोई सरोकार नहीं। मगर हिंदुस्तान ऐसा देश है जहां राजा हरीशचंद्र की परंपरा अब भी निभायी जा रही। झूठ बोलना आता नहीं। और न ही सच को अपनी ढाल बनाने का हुनर ही पता है। बस एक प्यार में घायल हुए नवयुवक की तरह इमोशनल होकर सुइसाइड करने की ठान ली। ऊपर से तुर्रा ये कि इन्हें विदेश नीति का पाठ किसी से नहीं सीखना। ज्वाइंट स्टेटमेंट का जब खुलासा हुआ तो उसके कंटेंट को लेकर विदेश सचिव से लेकर इस महकमे से जुड़े सभी लोग शक़ के घेरे में थे। लेकिन मनमोहन के संसद में दिये बयान के बाद साफ़ है कि ज्वाइंट स्टेटमेंट के हर एक लफ़्ज के पीछे उन्हीं की ही ‘विजनरी’ सोच थी।
शिमला समझौते के जरिये कश्मीर समस्या को हमेशा के लिये ख़त्म करने का सुनहरा मौका इंदिरा गांधी के पास था। पाकिस्तान के 90 हज़ार से भी ज़्यादा सैनिक और उसका 15000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भी हिंदुस्तान के कब्जे में था। लेकिन राष्ट्रपति निक्सन को मुंह चिढ़ाने का माद्दा रखने वाली इंदिरा गांधी ने शिमला समझौते के तहत दरियादिली दिखायी और ये सब जुल्फी भुट्टो को वापस कर दिया। कश्मीर समस्या तो सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती चली गयी। साथ-साथ पाकिस्तान की हिंदुस्तान से बदला लेने की खुन्नस भी कम नहीं हुई। जनरल परवेज मुशर्ऱफ उसी खुन्नसी सोच के प्रोडक्ट निकले। और इसलिए करगिल को अंजाम दिया। उस समय इंदिरा गांधी पर जुल्फी भुट्टो ने जादू कर दिया। मैदान में हिंदुस्तान जीता मगर टेबल पर पाकिस्तान। शर्म अल-शेख में भी वही गलती दोहरायी गयी। दोनों बार हिंदुस्तान जीत कर भी हारा। और पाकिस्तान हार कर भी जीत गया। शिमला से शर्म अल-शेख तक बस यही सबक सीखने को मिलता है।
विपक्षी तेवरों से घबराये विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर यहां तक कह गए कि ज्वाइंट स्टेटमेंट की कोई कानूनी वैद्यता नहीं है। कल पाकिस्तान शिमला समझौते पर भी ऐसे ही सवाल खड़े कर सकता है। शर्म अल-शेख का ज्वाइंट स्टेटमेंट बैड ड्राफ्टिंग नहीं बैड डिप्लोमेसी है।
प्रभात शुंगलू न्यूज़ चैनल आईबीएन 7 के एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं।
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आपकी ज़्यादातर दलीलें तो ठीक हैं, लेकिन ये शिकायत कुछ अजीब है कि झूठ बोलना नहीं आता…राजा हरिश्चंद्र बने हुए हैं..आप भी लगता है कि विश्लेषण करते-करते “प्यार में घायल हुए नवयुवक की तरह इमोशनल” हो गए हैं। आप तो इतने वरिष्ठ पत्रकार हैं, कूटनीति का विश्लेषण इतना भावुक और अतिवादी होकर करना अच्छा नहीं। अच्छा-भला विश्लेषण कुछ भटक सा गया।
एकदम सही बात है। यह एक ऐसी भूल है जो इतिहास में दर्ज हो गई है और आने वाले वक़्त में पूरे देश को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। वैसे भी मनमोहन सिंह का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत बढ़िया रहा है। वो ब्रिटेन जाकर भारत को गुलाम रखने के लिए उनका अहसान जता आते हैं और अब पाकिस्तान के साथ ऐसा साझा बयान जारी कर दिया है।
पहले मैं भी वही सोचता था, जो आपने लिखा है। आपका लेख पढ़ते-पढ़ते लगा कि ज़रा साझा बयान को ध्यान से पढ़ा जाए। पूरा पढ़ने के बाद मेरी राय कुछ बदल गयी है।
साझा बयान का पूरा टेक्स्ट नीचे दिया है, जो The Hindu में छपा था।
“The Prime Minister of India Dr Manmohan Singh and the Prime Minister of Pakistan Syed Yousuf Raza Gilani met in Sharm el-Sheikh on July 16, 2009.
The two Prime Ministers had a cordial and constructive meeting. They considered the entire gamut of bilateral relations with a view to charting the way forward in India-Pakistan relations.
Both leaders agreed that terrorism is the main threat to both countries. Both leaders affirmed their resolve to fight terrorism and to cooperate with each other to this end.
Prime Minister Singh reiterated the need to bring the perpetrators of the Mumbai attacks to justice. Prime Minister Gilani assured that Pakistan will do everything in its power in this regard. He said that Pakistan has provided an updated status dossier on the investigations of the Mumbai attacks and had sought additional information/evidence. Prime Minister Singh said that the dossier is being reviewed.
Both leaders agreed that the two countries will share real time, credible and actionable information on any future terrorist threats.
Prime Minister Gilani mentioned that Pakistan has some information on threats in Balochistan and other areas.”
आखिरी लाइन में बलूचिस्तान का जिक्र है, जिसमें ये कहा गया है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने बातचीत के दौरान कहा कि उनके पास बलूचिस्तान और दूसरे पाकिस्तान इलाकों में मौजूद खतरों से जुड़ी कुछ जानकारियां हैं। इसमें कहीं ये नहीं लिखा कि इस पर भारत का क्या रुख है। जबकि भारत में हुए आतंकवादी हमले की चर्चा पूरे बयान में है। पाकिस्तान ने इस बारे में हर संभव कार्रवाई करने का भरोसा भी दिलाया है। फिर भला इतना भड़कने वाली क्या बात है? साझा बयान में सिर्फ उन मुद्दों का ब्योरा है, जो बातचीत के दौरान उठे थे। इसमें तो वाकई कोई कमिटमेंट वाली बात नहीं है।