“प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव ने शर्मसार किया है”
लेखक: दिलीप मंडल | August 31, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 10 Comments
श्रीमान प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,
मेरे करीबी रिश्तेदारों में कई जातियों के लोग हैं। ब्राह्मण से लेकर कायस्थ और नायर से लेकर दलित तक। ये सभी परिवार प्रेम से रह रहे हैं। आपके परिवारों में भी लोगों ने प्रेम किया होगा और कई ने जाति से बाहर शादियां भी की होंगी। अब आप जाति पर अपने शर्मसार करने वाले विचारों को अपने रिश्तेदारों पर लागू करके देखिए और हिसाब लगाइए कि कौन सी बच्ची या बच्चा कवि बनेगा और कौन कहानीकार और कौन आत्मकथा बेहतर लिखेगा (देखिए देशकाल डॉट कॉम पर राजेंद्र यादव की खबर)। या हिसाब लगाइए इस बात का कि कौन बैटिंग करेगा और कौन बॉलिंग और कौन टिक कर खेलेगा और कौन टिककर नहीं खेलेगा या फिर कौन बेहतर नेतृत्व क्षमता दिखाएगा और कौन नहीं दिखाएगा (देखिए रविवार डॉट कॉम पर प्रभाष जोशी का इंटरव्यू)। आपको अपने ही विचारों से शायद नफरत होने लगे और आप अपने बच्चों और पोते-पोतियों से माफी मांगने के अलावा कुछ और नहीं कर पाएं। बड़े कहे जाने वाले लोग जब इस तरह अश्लीलता फैलाएं और समाज में नफरत फैलाने वाली बातें करने लगें तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। Read more
वीओआई का प्रसारण फिर बंद
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 30, 2009 | पहरेदार | Comments Off
वॉयस ऑफ इंडिया का प्रसारण फिर बंद हो गया है। त्रिवेणी मीडिया के मालिक मधुर मित्तल और सीईओ अमित सिन्हा की बैठक में ही प्रसारण पर अंतिम फ़ैसला होगा। वीओआई का प्रसारण इसी महीने की 21 तारीख को कर्मचारियों की हड़ताल के कारण पहली बार बंद हुआ था। उसके दो दिन बाद कंपनी के एक धड़े ने समूह संपादक किशोर मालवीय की अगुवाई में दिल्ली के जैन स्टूडियो से चैनल का प्रसारण शुरू कर दिया। तब दलील दी गई कि हरियाणा सरकार से विज्ञापन की एक मोटी खेप मिली है और उसके लिए प्रसारण जरूरी है। Read more
“अपनी गलतियों के कारण हुई मृणाल पांडे की विदाई”
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 30, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment
“मेरे इस्तीफे की तात्कालिक वजह हिंदुस्तान में एक जूनियर मोस्ट कर्मचारी को प्रमोशन देकर कई सीनियर संवादाताओं से ऊपर बिठा देना है। ये प्रमोशन एक क्षेत्र विशेष को ध्यान में रख कर दिया गया है और मैं इसका विरोध करता हूं।”
हिंदुस्तान से इस्तीफ़ा देते वक़्त अनूप भटनागर ने कुछ ऐसी ही पंक्तियां लिखीं थी। अनूप इस वक़्त नई दुनिया में लीगल एडिटर हैं। उससे पहले वो हिंदुस्तान में ही सीनियर स्पेशल करस्पॉन्डेंट के तौर पर काम कर चुके हैं। लेकिन जब मृणाल पांडे ने उनसे जूनियर उमाकांत लखेड़ा को उनसे ऊपर बिठाया तो वो बर्दाश्त नहीं कर सके। अनूप बताते हैं कि उसके बाद उन्होंने हिंदुस्तान से इस्तीफ़ा दे दिया। जाने से पहले उनका एग्जिट इंटरव्यू हुआ और उसी इंटरव्यू में मैनेजमेंट के सामने अनूप भटनागर ने ये बात रखी थी। Read more
चुप्पी की यह भाषा बहुत खतरनाक है दोस्तों
लेखक: प्रेमरंजन | August 30, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 2 Comments
इस देश में एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे। नाम था पीवी नरसिंह राव। सुना है बड़े विद्वान थे। कई भाषाओं पर उनका अधिकार था। हिंदी तो वे बोलते ही थे, अंग्रेजी सहित कई और भाषाएं थीं, जिन पर अधिकार होने की मुनादी अक्सर उनके भक्तगण मुदित होकर किया करते थे। वे कई लोगों के लिए बहुत अच्छे प्रधानमंत्री थे। और अच्छे प्रधानमंत्री इसलिए थे क्योंकि वे ब्राह्मण थे। हालांकि विद्वान थे, तो ब्राह्मण होना लाजिमी ही है।
चलिए, यह तो आर्य संस्कृति का शाश्वत सत्य है कि नरसिंह जी इसलिए विद्वान थे क्योंकि ब्राह्मण थे। और तो और, कई भाषाओं के प्रकांड पंडित भी थे। (दोहराव जैसा लग रहा होगा। यह पाठकों पर अत्याचार होता है। लेकिन बात जब प्रकांड पंडितों की हो रही हो, तो धैर्य से सुनना-देखना चाहिए। कोई न कोई बात निकल के आती ही है।) तो उन सभी भाषाओं को उंगली पर गिनाते हुए उनके भक्तों को उस एक भाषा को भी गिना डालने का ध्यान ही नहीं रहता था, जो उनकी विद्वत्ता का असली कारण थी। और सच कहें तो वही एक भाषा उनके विद्वान और धीर-गंभीर होने का सबसे बड़ा सबूत और कारण थी। Read more
कहीं प्रभाष जोशी को निपटा तो नहीं रहे आलोक तोमर?
लेखक: कबीर | August 30, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment
बचपन में एक किस्सा सुनते थे कि एक राजा ने बंदर पाल रखा था। एक दिन सोते वक़्त उसने बंदर से कहा कि किसी को पास मत फटकने देना। आज्ञाकारी बंदर राजा के पैर के पास बैठ कर पंखा हांकने लगा। तभी एक मक्खी भिनभिनाती हुई वहां पहुंच गई और राजा के शरीर पर बैठ गई। आज्ञाकारी बंदर उसे उड़ाने लगा। वो उड़ती और फिर राजा के शरीर पर बैठ जाती। बंदर का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। उसी गुस्से में उसने तलवार उठा ली। मक्खी फिर राजा के शरीर पर बैठी और मक्खी को मारने के इरादे से बंदर ने तलवार भांज दी। मक्खी का तो कुछ नहीं बिगड़ा, राजा हलाल हो गया। Read more
हिंदुस्तान से मृणाल पांडे की विदाई
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 30, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | Comments Off
हिंदुस्तान से प्रमुख संपादक मृणाल पांडे की विदाई हो गई है। अमर उजाला के समूह संपादक शशि शेखर अब हिंदुस्तान के प्रमुख संपादक का कार्यभार संभालेंगे। मृणाल पांडे के इस्तीफ़े की वजह भी शशि शेखर की नियुक्ति बताई जा रही है। शशि शेखर की नियुक्ति मृणाल पांडे को बताए बगैर की गई है, जिससे नाराज़ होकर उन्होंने अपना इस्तीफ़ा मैनेजमेंट को सौंप दिया। बताया जा रहा है कि उनका इस्तीफ़ा मंजूर कर लिया गया है। Read more
सहारा इंडिया टीवी नेटवर्क की तरफ से जनतंत्र को नोटिस
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 30, 2009 | बड़ी ख़बर, हक़ की आवाज़ | 3 Comments
सहारा इंडिया टीवी नेटवर्क ने जनतंत्र को कानूनी नोटिस भेजा है। मानहानि का ये नोटिस 19 अगस्त को सहारा से जुड़ी ख़बरें प्रकाशित करने पर भेजा गया है। नोटिस के मुताबिक सहारा को जनतंत्र पर छपी ख़बरों से धक्का लगा है और हैरानी हुई है। जनतंत्र पर कंपनी से जुड़ी कुल चार ख़बरें छापी गई थीं, जिनमें से तीन का ज़िक्र नोटिस में है। पहली खबर है, “सहारा में सुनामी, 48 कर्मचारियों से मांगा गया इस्तीफ़ा“। दूसरी, “सहारा के कर्मचारी नहीं करेंगे सरेंडर” और तीसरी ख़बर, “कर्मचारियों को टॉप मैनेजमेंट ने दिया फिलहाल “सहारा”।” नोटिस में हमारी ख़बरों को ग़लत बताया गया है। लेकिन हमें जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक हाल में सहारा के कई कर्मचारियों से वाकई इस्तीफा लिया गया है और कई कर्मचारियों का तबादला किया गया है। तबादला उन्हीं कर्मचारियों का हुआ है… जिनका जनतंत्र में नाम छपा था। और उन्हीं ब्यूरो से हुआ है जिनका जनतंत्र में ज़िक्र हुआ था। क्या ये ख़बर के ग़लत होने का संकेत है? अगर कर्मचारियों से इस्तीफ़ा मांगने की ख़बर गलत है तो फिर सहारा के कर्मचारी दूसरी नौकरी मिले बगैर इस्तीफ़ा क्यों दे रहे हैं? क्या वो सभी अचानक इतने अमीर हो गए हैं कि उन्हें नौकरी की ज़रूरत नहीं रही?
सहारा में मची है भगदड़
सहारा समय से इन दिनों बुरी ख़बरें ही आ रही हैं। एक के बाद एक लोग इस्तीफा दे रहे हैं। कुछ दिन पहले मीडिया में ख़बर आई कि सहारा में प्रबंधन ने 48 कर्मचारियों से इस्तीफा मांगा है। सूत्रों के मुताबिक कर्मचारियों ने उसका विरोध किया। अपनी बात रखने के लिए वो लखनऊ भी गए। लखनऊ से छन कर जो ख़बरें आईं उसके मुताबिक टॉप मैनेजमेंट ने कर्मचारियों के हितों का ख्याल रखने का वादा किया और उन सभी को समझा-बुझा कर वापस भेज दिया। लेकिन एक दिन बाद स्थिति बदल गई। वो रिपोर्टिंग के लिए दफ़्तर पहुंचे तो उन्हें बता दिया गया कि मंगलवार (25 अगस्त) तक इंतज़ार …
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नोटिस में इस बात पर एतराज़ किया गया है कि जनतंत्र की रिपोर्ट ने इस सबके पीछे एक “खेल” होने का आरोप लगाया है और इस खेल में सहारा के उच्च अधिकारियों सीईओ सुमित रॉय, मध्य प्रदेश चैनल के हेड राजेश कुमार और बिहार चैनल के हेड संजय मिश्रा के शामिल होने की बात कही गई है। सवाल ये है कि क्या बिना किसी खेल के इतनी बड़ी तादाद में कर्मचारियों की नौकरी ख़तरे में पड़ गई है? अगर कंपनी मंदी के चलते कर्मचारियों की छंटनी करना चाहती है, तो उसका भी एक वाजिब तरीका होना चाहिए। अगर मंदी होगी तो उसका असर हर जगह नज़र आना चाहिए। लेकिन हाल के दिनों में देखा गया है कि मंदी में अधिकारी तो मस्त रहते हैं और निचले पायदान पर तैनात कर्मचारियों पर गाज़ गिरती है। ये खेल नहीं है तो क्या है? सहारा पर जनतंत्र की रिपोर्ट में बताया गया था कि कंपनी ने सीईओ के लिए हाल के दिनों में दो महंगी गाड़ियां खरीदी हैं। मर्सडीज और फोर्ड एनडेवर। यही नहीं सभी चैनल हेड्स के लिए मारुति डिजायर भी खरीदी गई है। ब्लैक बेरी फोन दिये गए हैं। इन सब पर जितने पैसे खर्च हुए होंगे, उसके बहुत से कर्मचारियों को साल भर तक तनख्वाह दी जा सकती थी। कंपनी की ओर से मिले नोटिस में इन तथ्यों को कहीं भी चुनौती नहीं दी गई है। मंदी से जूझ रही एक कंपनी लक्ज़री पर खर्च करती है और कर्मचारियों की छंटनी करती है .. ये खेल नहीं तो क्या है? किसी भी कंपनी को मंदी से उबारने के लिए खर्चों में कटौती करने की ज़िम्मेदारी किनकी होती है? कंपनी के बड़े अधिकारियों की ही ना! लेकिन जब ऐसे अधिकारी खुद ही अपनी सुविधाओं पर पैसे लुटाएं और कर्मचारियों की नौकरियां ख़तरे में पड़ जाएं, तो इसे क्या कहेंगे? Read more
सहारा में मची है भगदड़, इस्तीफ़ा और तबादलों का दौर
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 30, 2009 | हक़ की आवाज़ | 1 Comment
सहारा समय से इन दिनों बुरी ख़बरें ही आ रही हैं। एक के बाद एक लोग इस्तीफा दे रहे हैं। कुछ दिन पहले मीडिया में ख़बर आई कि सहारा में प्रबंधन ने 48 कर्मचारियों से इस्तीफा मांगा है। सूत्रों के मुताबिक कर्मचारियों ने उसका विरोध किया। अपनी बात रखने के लिए वो लखनऊ भी गए। लखनऊ से छन कर जो ख़बरें आईं उसके मुताबिक टॉप मैनेजमेंट ने कर्मचारियों के हितों का ख्याल रखने का वादा किया और उन सभी को समझा-बुझा कर वापस भेज दिया। लेकिन एक दिन बाद स्थिति बदल गई। वो रिपोर्टिंग के लिए दफ़्तर पहुंचे तो उन्हें बता दिया गया कि मंगलवार (25 अगस्त) तक इंतज़ार करें। Read more
सच में बहुत जातिवादी है मीडिया
लेखक: सुशांत झा | August 29, 2009 | स्पेशल रिपोर्ट | Comments Off
एसपी का साक्षात्कार जब छपा था (13 साल पहले) तबसे लेकर अब तक हालात में कोई बड़ी तब्दीली नहीं आई है। मुझे याद है साल 2004 में आईआईएमसी के मेरे बैच में – जब सिर्फ एससी-एसटी को ही आरक्षण मिला हुआ था – बमुश्किल एक ओबीसी लड़का (यादव) जेनेरल कैटेगरी में चुना गया था। ये तब के हालत थे जब देश के कई सूबों में दशक भर से ज्यादा से पिछड़ों की सरकार थी। मुझे आश्चर्य इस बात का था कि दक्षिण के कई सूबों में जहां समाजिक सशक्तिकरण कई दशक पुराना है – वहां के पिछड़े-दलित भी नहीं आ पाए थे। हमने देखा था कि 30 के हमारे बैच में 6 सीटें एससी-एसटी के लिए थी और बचे 24 सीटों पर लगभग 18 ब्राह्मण थे। इसका सीधा मतलब ये था कि महज सत्ता में भागीदारी से किसी समुदाय का सर्वांगीण विकास तत्काल नहीं दिख सकता-खासकर तब जब हजारों सालों की वंचना पृष्ठभूमि में हो। जाहिर है, बीमारी गंभीर है। Read more
छह से सात रुपये में बिकेंगे अख़बार!
लेखक: जनतंत्र डेस्क | August 29, 2009 | पहरेदार, मुद्दा | Comments Off
अगले दो से तीन साल के भीतर अख़बारों की कीमत छह से सात रुपये हो सकती है। दिल्ली में दो दिन पहले साउथ एशिया न्यूज़ पेपर कॉन्फ्रेंस हुई। जिसमें न्यूज़पेपर इंडस्ट्री के दिग्गजों ने हिस्सा लिया इस कॉन्फ्रेंस में द हिंदू के प्रबंध निदेशक एन मुरली ने कहा कि अख़बारों की लागत को कम करने के लिए दाम बढ़ाने की ज़रूरत है। उनके मुताबिक अब तक प्रिंट मीडिया का विज्ञापन रेवेन्यू बीस फीसदी प्रति वर्ष की रफ़्तार से बढ़ रहा था। लेकिन अब बढ़ोतरी की रफ़्तार दस फीसदी से कम रहने का अनुमान है। ऐसे में अख़बारों की लागत को कम करने के उपायों पर गौर करना होगा। Read more




