“हम पत्रकारों का सिर शर्म से झुका जा रहा है”
लेखक: जनतंत्र डेस्क | July 31, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | 5 Comments
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दफ़्तर में पत्रकारों के बीच मारपीट से वहां का मीडिया जगत हैरान है। सब इसे बहुत दुखद और शर्मनाक बता रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकारों के मुताबिक इससे पत्रकारिता का दामन दाग़दार हुआ है और इसकी हर किसी को खुल कर निंदा करनी चाहिए। ये इसलिए भी जरूरी है ताकि आगे से ऐसी कोई हरकत नहीं हो। जनतंत्र ने इस बारे में बिहार के कई प्रतिष्ठित पत्रकारों से बात की।
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गंगा प्रसाद, बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं और लंबे समय से जनसत्ता से जुड़े हैं।
ये बहुत ही दुखद घटना है। दुखद इसलिए है क्योंकि हम पढ़े लिखे हैं। बहुत सारी चीजों को समझते हैं। अगर हम ही किसी बात पर उत्तेजित हो जाएंगे… वो भी इतना कि दूसरों पर हाथ उठा दें। अपशब्दों का इस्तेमाल करने लगें। फिर हममें और दूसरों में फर्क क्या रह जाएगा। हमें बुद्धिजीवी कहा जाता है। हमारा सम्मान होता है। लोग समझते हैं कि हम सोच के स्तर पर बेहतर हैं। व्यवहार के स्तर पर मानवीय हैं। संवेदनाओं से भरे हुए हैं। लेकिन मारपीट करना, गालीगलौज करना … ये सब अमानवीय बर्ताव है। इन्हें किसी भी स्तर पर सही नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए दुख होता है। लगता है कि समाज हमें मान-सम्मान क्यों दे?
ये सही है कि घटना दो लोगों के बीच की है। कौन सही है कौन ग़लत ये बताना हमारा मकसद नहीं। हम किसी की तरफ भी अंगुली उठाएंगे तो असल में वो अंगुली हमारी तरफ ही उठेगी। पत्रकार बिरादरी की तरफ उठेगी। ये बात बंद कमरे में हुई होती या फिर प्रेस क्लब में तो किसी को उतना नहीं अखरता। घर की बात घर में रह जाती। लेकिन चौहारे पर पत्रकारों के बीच मारपीट हो… विधानसभा में मारपीट हो और मुख्यमंत्री के कमरे में मारपीट हो … ये तो बहुत ही शर्मनाक है। हम सबका सिर शर्म से झुका जा रहा है। वहां सारे लोग मौजूद थे। विधायक भी… वहां के कर्मचारी भी… उन सबकी नज़र में हम पत्रकारों की क्या इज्जत रह गई?
नलिन वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार (टेलीग्राफ)
मुख्यमंत्री के दफ़्तर में कोई किसी पत्रकार पर शारीरिक हमला करता है इसे किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। इस घटना की जितनी निंदा की जाए उतनी कम है। जिस शख़्स का कलम और कागज से वास्ता हो … वो किसी पर पत्थर, ग्लास या किसी दूसरी चीज से हमला करे तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी चाहिए। ये अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना है। जमाना हो गया इस पेशे में लेकिन अभी तक ऐसा नहीं सुना था कि कोई पत्रकार किसी पर मुख्यमंत्री चेंबर में हमला कर दे।
इस घटना का बहुत बुरा असर पड़ेगा। पत्रकारिता की साख पर बट्टा लग गया है। ये आसानी से नहीं धुलेगा। नए-नए लड़के आ रहे हैं। टीवी में। प्रिंट में। सबका मन इसी तरह बहकेगा तो कल को हिंसा हो सकती है। इट कैन लीड टू व्यालेंस है। इस हम सबको इस घटना की घोर निंदा करनी चाहिए ताकि आगे किसी और शख़्स का मन नहीं बढ़े। कोई और ऐसी शर्मनाक घटना नहीं हो।
अरुण अशेष, ब्यूरो चीफ, हिंदुस्तान
ये अपने आप में बहुत दुखद घटना है। इससे अधिक क्या प्रतिक्रिया दी जाए। दोनों अपनी ही बिरादरी के हैं। इस घटना पर हम सबको दुख है। बस यही उम्मीद कर सकते हैं कि आगे कभी ऐसी कोई घटना नहीं हो।
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Bhai Patrakar Log Ab Apas Mein To Ladna Jhagarna Band Kijiye. Principle Ki Ladai Ho To Koi bat Bhi Ho.
पत्रकार भी आखिर इंसान हैं …रिपोर्टिंग के समय जो कुछ देखते हैं ..विशेषकर संसद अथवा विधानसभाओं आदि में ..उसका असर तो होगा ही ..!!
वाणी जी,
आपके तर्क से ऐसा लगता है कि आपने चंदन के पेड़ के बारे में नहीं जाना है अभी.. चंदन के पेड़ से विषैले सांप लिपटे रहते हैं.. फिर तो चंदन को भी विषैला हो जाना चाहिए.. जिसे माथे पर लगाया जाता है.. और कई बार इलाज के दौरान पीसकर उसे खाया भी जाता है… आपके तर्क को साधुवाद
जिस तरीके से पत्रकारों की नैतिकता और व्यवहार पर सवाल उठ रहे हैं.. उसपर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है, कंपनी पत्रकारों से विज्ञापन कराएगी तो पत्रकारिता के लिए जगह कहां बचती है.. उसपर बिहार जैसे मज़बूत सियासत की ज़मीन वाले सूबे में नेताओं की मौजूदगी में इस तरह का व्यवहार करने वालों को तो कम से कम इस पेशे में रहने का कोई हक़ नहीं.. क्या तनिक भी लज्जा नहीं आती उन्हें ख़ुद पर.. ज़माने भर को सिखाने-पढ़ाने वाले अब इस दर्जे का व्यवहार कर रहे हैं.. तो ख़ुद पर भी अब चिंता होती है कि क्या इस पेशे को चुनना कहीं एक ग़लत फ़ैसला तो नहीं था। भाई लोगों कुछ भी करो..सुर्खियां बनने की कवायद छोड़ दो.. बात समझ नहीं आती तो पेशा ही छोड़कर कुछ और अच्छा काम कर लो.. बिहार-झारखंड का नाम बदनाम मत करो.. सैकड़ों लोगों की नौकरी पर सवाल खड़े हो जाते हैं.. आप जैसे बड़े पत्रकारों के ऐसे व्यवहार पर दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में।
Reality is that journalists come from this society only, they are not from mars or moon . The point is they are as good or as bad as society. Moreover journalism is not driven by passion any more , it is a profession which is driven by profitability , thus it requires immense rivalry and competition . This means we are harbouring more prejudices against each other rather than pride.