खजुराहो क्या हमारे पर्यटन उद्योग का अश्लील पैकेज है?
लेखक: जनतंत्र डेस्क | July 24, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | 11 Comments
जनतंत्र पर साथी कबीर ने दो दिन पहले एक लेख लिखा। नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर की वेबसाइट पर ख़बरों के रूप में अश्लील साहित्य परोसने का आरोप लगाते हुए कबीर ने सविता भाभी की तरह उन पर प्रतिबंध लगाने का मांग की। आज वरिष्ठ पत्रकार अविनाश ने कबीर के लेख का जवाब दिया है। उन्होंने कहा है कि ये मांग बेतुकी है। साइबर स्पेस में हर किसी का अपना कोना है। दूसरे का कोना छेकने का हक़ किसी को नहीं होना चाहिए। कानून को भी नहीं। आप उनका लेख पढ़िए और उतनी ही बेबाकी से अपनी राय रखिए जितनी बेबाकी से अविनाश ने लिखा है।
मुझे मालूम नहीं कि अश्लीलता के संदर्भ में विचारधारा का सवाल कितना पारिभाषित है – लेकिन इतना मालूम है कि ऐसे किसी भी व्यवहार पर कानूनी पाबंदी है। इसके बावजूद धड़ल्ले से अश्लील साहित्य प्रकाशित होते हैं और बड़े पैमाने पर बिकते हैं। पचास-साठ के दशक में राजकमल चौधरी ने मैथिली में एक नॉविल लिखा था, पाथर फूल। दरभंगा के एक प्रेस से छप रहा था। किसी कर्मचारी ने प्रशासन को सूचना दी कि पाथर-फूल नाम का एक अश्लील साहित्य छापा जा रहा है। जब तक छापे के लिए प्रशासनिक अधिकारी प्रेस पहुंचते, उससे पहले ही प्रकाशक ने छपी हुई सारी किताबें पांडुलिपि सहित आग के हवाले कर दी। उस नॉविल की तीन छपी हुई प्रतियां बची रह गयीं, जो तीन सज्जन प्रेस से पहले ही उठा कर ले गये थे। लेकिन विडंबना ये है कि राजकमल चौधरी का वो नॉविल अब तक अप्रकाशित है। जाहिर है, अब तक ये भी पता नहीं है कि उस नॉविल में राजकमल ने किस मसले को डिस्कस किया था।
इस्मत की कहानी लिहाफ समलैंगिक रिश्तों पर एक मार्मिक कहानी है, लेकिन शुचितावादियों के निशाने पर रही। एक नॉविल अभी अभी मेरे हाथ लगा है, नोबल पुरस्कार विजेता एल्फ्रीडे येलिनेक का - LUST - हिंदी में इसका अनुवाद मज़ा नाम से प्रकाशन संस्थान ने छापा है। मूल जर्मनी से इसका अनुवाद अमृत मेहता ने किया है। खैर, ये बाज़ार में पाठकों के लिए उपलब्ध नहीं है। क्योंकि छप जाने के बाद किसी कर्मचारी ने प्रकाशन संस्थान के मालिक से कहा कि ये वल्गर साहित्य है – लगभग पोर्नोग्राफी। प्रकाशक ने इसे डंप कर दिया। बाज़ार में वितरित ही नहीं होने दिया। विदेशी आलोचकों ने लुस्ट नाम की इस किताब को पोर्नोग्राफिक पैरोडी की संज्ञा दी है। सच ये है कि इस किताब में ज़रूर वल्गर विवरण हैं, लेकिन वो जुगुप्सा से ज़्यादा वितृष्णा पैदा करते हैं।
लॉलिता को हम किस श्रेणी में देखना चाहेंगे? खजुराहो क्या हमारे पर्यटन उद्योग का अश्लील पैकेज है?
कहने का कुल जमा सार ये है कि अश्लीलता से हमारा अभिप्राय क्या है? अश्लीलता से जुड़ी सामाजिक दुर्घटना के कितने उदाहरण हैं? क्या रेपिस्ट अश्लील साहित्य पढ़ कर उत्तेजित होता है या रिश्तों के बीच संभव होने वाले यौन अपराध के पीछे अश्लीलता की सार्वजनिक छवियां ज़िम्मेदार हैं? ऐसे में अश्लील साहित्य और अश्लीलता की सार्वजनिक छवियों को लेकर हमारी उत्तेजना मैं समझ नहीं पाता हूं।
जनतंत्र में जब आपने सविता भाभी पर सरकारी डंडा बरसाने की तरह ही कुछ वेबसाइटों पर भी ऐसी ही कार्रवाई करने की मांग उठायी, तो मेरे मन में कुछ और सवाल उभरे। वर्चुअल दुनिया में हर आदमी अपनी अपनी तरह से बर्ताव करने को स्वतंत्र है। हम उसके बर्ताव को सामाजिक नैतिकता के दायरे में क्यों लाना चाहते हैं? आपने जिन वेबसाइटों के उदाहरण दिये हैं, उन्होंने देख लिया कि ख़बरों की औक़ात क्या है और लोगों की दिलचस्पी दरअसल किस चीज़ में सबसे ज़्यादा है। ठीक उसी तरह, जैसे टीवी में भूत-प्रेत-धर्म-अध्यात्म-सिनेमा-क्रिकेट की वकालत करने वाले दलील देते हैं कि पूरे देश की असल तस्वीर देखने में नागरिकों की रुचि नहीं रही। ठीक उसी तरह, जैसे अख़बारों में खेती बाड़ी, समाज संस्कृति, विचार विवेचना के पन्नों की जगह ग्लैमर और गॉशिप ने ले ली। मसला ये है कि मानव सभ्यता की यौन गली ही अब तक इतनी रहस्यमयी क्यों बनी हुई है कि हर आदमी रात के अंधेरे में अपना अपना दीया जला कर उसे सुलझाने और समझने की कोशिश करता है।
एक युवती अपना कौमार्य बेचती है और एक वेबसाइट उसकी ख़बर लगाता है और सबसे अधिक लोग उसे पढ़ते हैं, तो उसमें वेबसाइट का क्या दोष है? मैंने आपके दिये हुए तमाम लिंक्स देखे और उन तमाम लिंक्स के होमपेज भी देखे। इन ख़बरों का एक कोना है या ऐसी ख़बरें जहां-तहां बिखरी पड़ी हैं। मुख्य रूप से समाचार और उनके दूसरे स्तंभ ही होमपेज पर नज़र आते हैं। हां सर्वाधिक पॉपुलर या सर्वाधिक पढ़ी गयी लिस्ट में कथित अश्लील ख़बरों की संख्या ज़्यादा है। इसमें विजिटर, व्यूअर का दोष है या वेबसाइट का – मुझे पहले ये स्पष्ट कीजिए।
आपकी इसी बहस को अगर सबसे अधिक लोग देखने लगें, तो क्या आपकी साइट पर छपने वाली दूसरी चीज़ों का संदर्भ और उसकी चर्चा और गंभीरता गौण मान ली जाएगी? समाज की अपनी दिक्कत को सुलझाने के लिए कृपया कानून का रास्ता न दिखाएं। सविता भाभी और ऐसी तमाम साइट को नेट पर बने रहने दें और उनके घनघोर अश्लील क्रियाकलापों के बरक्स इन्हीं विषयों की सृजनात्मक व्याख्या करके उनको पाठकों के लिए अप्रासंगिक बना दें।
आप कहेंगे कि यह कैसी डिमांड है? फिर तो समाज में राजनीतिक विचारों की विरोधी धाराओं के खिलाफ़ भी इसी तर्ज पर बर्ताव करना होगा और सांप्रदायिक और जातिवादी ताक़तों को अपना काम करने देना होगा और प्रगतिशील सोच के साथ हमें अपना काम करते रहना होगा? तब मेरा जवाब वही होगा, जो मैं अपने इस बयान की पहली पंक्ति में संकेत कर चुका हूं, अश्लीलता कोई राजनीतिक या सामाजिक (या यहां तक कि निजी) विचारधारा नहीं है – यह हमारी सभ्यता की वो सरहद है, जहां कब दीवार खड़ी कर दी गयी, हमें पता ही नहीं चला। ग़नीमत है कि दीवार पुरानी पड़ चुकी हैं और दरारें नज़र आने लगी हैं। उन दरारों से हमारी सदी अगर झांक रही है, तो उसे झांकने दीजिए।
अविनाश मोहल्लाLIVE डॉट कॉम के संपादक हैं।
इन्हें भी पढ़ें:
- एक्सप्रेस समूह और द हिंदू के संपादक एन राम में दो-दो हाथ - March 27th, 2010
- चोरों ने की थी सत्येंद्र दुबे की हत्या, तीन दोषी करार - March 22nd, 2010
- प्रेस क्लब में पुष्पेंद्र-परवेज पर तानाशाही का आरोप - February 27th, 2010
- सचिन के रंग में रंगे सभी अख़बार - February 25th, 2010
- सचिन के नाम पर न्यूज़ चैनलों के इस जश्न में शामिल हों - February 24th, 2010





बिल्कुल ठीक कहा अविनाश आपने.
अमेरिका या पश्चिमी सिनेमा में बनने वाली फिल्मों को काफी गालियां हमारे देश में खानी पड़ती है. लोग कहते हैं नंगापन, अकेले या दोस्तों के साथ ठीक है पर परिवार के साथ नहीं देख सकते.
ख़ैर इन बातों के माध्यम से मैं यही कहना चाहता हूं कि इन देशों में बलात्कार की घटनाओं के आकड़े देखिए और फिर अपने अंदर झांकिए. हर दिन बलात्कार, शर्म भी नहीं आती हमें और बात करते है अश्लीलता पर. जिन लड़कियों के साथ उनके देश में कुछ आपत्तिजनक नहीं होता, उनके साथ हमारे देश में बहुत कुछ हो जाता है साहब. अश्लीलता शब्द बार बार दोहराने वालों के इसी देश में बलात्कारियों की तादाद सबसे ज़्यादा है. यकीन न आए तो गृहमंत्रालय के आंकड़े उठा कर देख लीजिए. आप जिसे अश्लीलता कहते हैं उसमें शायद आपको कहीं न कहीं इंसानी जिज्ञासा दिख जाएं लेकिन बलात्कारियों में क्या दिखिएगा. रात को लड़कियां घर से अकेले बाहर नहीं निकल सकती. जिस देश में अश्लीलता पर इतना कड़ा पहरा हो वहां की सड़क पर फब्तियां सहते हुए हमारी माताएं, बहनें बड़ी हो चुकी है. आने वाली पीढ़ी भी आदी हो ही जाएगी. क्यों साहब.
ऊपर जो तस्वीर लगी है. उस में और उस प्रतिमा में कोई अश्लीलता नजर आती है? नहीं न। लेकिन यही सब एक मानव जोड़ा सरे आम करने लगे तो वह अश्लीलता हो जाएगा। इसी फर्क को देखते रहना चाहिए। फिर यह सब परिस्थितियाँ निश्चित करती हैं कि क्या अश्लील है और क्या नहीं?
अश्लीलता के बारे में काफ़ी कुछ लिखा। अच्छा ।
अश्लीलता कोई राजनीतिक या सामाजिक (या यहां तक कि निजी) विचारधारा नहीं है – यह हमारी सभ्यता की वो सरहद है, जहां कब दीवार खड़ी कर दी गयी, हमें पता ही नहीं चला। एकदम सही बात।.
कल शाम सच का सामना पर बात करते हुए एक अंग्रेजी अखबार के पत्रकार ने इस मामले में मुझसे राय जाननी चाही। मैंने अपनी तरफ से जो कुछ भी बताया उसके बाद सवाल अश्लीलता पर आकर अटक गया। मैंने एक ही बात कही,आमतौर पर टेलीविजन या फिर दूसरे माध्यमों पर अश्लीलता का तोहमत गढ़नेवाले आलोचक पता नहीं ऑडिएंस को इतना मासूम क्यों समझते हैं? जब देखनेवाले लोग इनोसेंट नहीं रह गए हैं तो फिर आपका टेलीविजन कैसे रह जाएगा। इस बात को लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं। अविनाश का ये सवाल मुझे भी लगातार परेशान करता रहा है कि-मानव सभ्यता की यौन गली ही अब तक इतनी रहस्यमयी क्यों बनी हुई है कि हर आदमी रात के अंधेरे में अपना अपना दीया जला कर उसे सुलझाने और समझने की कोशिश करता है।
दिनभर जिस डेस्कटॉप पर पांच-पांच सौ रुपये लेकर लोगों की कुंडलियां बनायी जाती है,अंधेरा होते ही उसी डेस्कटॉप की सीडी ड्राइव हॉस्टल गर्ल,नखरीली नौकरानी जैसी सीडी को क्यों भकोसने लग जाती है। ऐसा क्या है कि काम करने वाला बंदा तब रेडीमेड फार्मेट पर भी कुंडलियों का डाटा तक फीड नहीं कर पाता। जिन कार्यालयों में दिनभर राष्ट्रचिंता के पत्रक बनते हैं,रात में वहीं रामायण की लेबल लगी सीडी व्यक्तिगत स्तर पर चरम औऱ परम सुख की गारंटी में स्थान पाती है। क्या ये ओवरटाइम के तौर पर उसी मानव सभ्यता की यौन गलियों के रहस्य को समझने का काम करते हैं। क्या देश का हर वयस्क के लिए ये ओवरटाइम पहले से मुकर्रर है। तो फिर इसके माध्यमों पर आने के बाद बबेला क्यो। सच्चाई ये है कि अपनी संस्कृति की महानता औऱ उसकी दुहाई देनेवाले लोग सामाजिक संरचना,बदलते परिवेश औऱ मानसिकता को समझ ही नहीं पा रहे औऱ अगर समझ भी रहे हैं तो उस पर विमर्श करना नहीं चाहते।
बचपन में किसी बच्चे के हाथ में अगर किसी ने राम या बलराम खुदवा दिया है तो उसके जीवन भर तक मर्यादापुरुषोत्तम और हलधर बने रहने की गारंटी करार हो जाती है,इस तरह की मान्यता का कोई मतलब नहीं है। इसलिए इन मसलों पर विचार करने के क्रम में इतिहास में जाकर दरवाजे खटखटाने से बेहतर है कि आप मौजूदा स्थिति में देखिए कि प्रैक्टिस के स्तर पर क्या सब चल रहा है। हमें पाठकों,दर्शकों को मासूम औऱ दूध का धुला मानने की जिद छोड़कर आलोचना करने के क्रम में जबरदस्त तरीके से होमवर्क करने की जरुरत है। इतिहास में,खजुराहो में अगर अश्लीलता है(ये अलग बात है व्यक्तिगत तौर पर मैं अश्लीलता की परिभाषा इस रुप में नहीं करता) तो उस पर आध्यात्म औऱ धर्म का लेप चढ़ाने औऱ अगर वेबसाइट और टेलीविजन पर है तो कोड़े मारकर लहुलूहान करने से बाज आने चाहिए।
अविनाश जी के तर्क अपनी जगह सही हैं. हालांकि इस मामले के किसी एक पहलू को पकड़कर आप किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते हैं. इसके सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक कोण भी हैं और जब आप उनके साथ इस मुद्दे को देखेंगे तो बहुत सारी व्याख्याएं इकहरी लगने लगेंगी.
खजुराहो क्या हमारे पर्यटन उद्योग का अश्लील पैकेज है?
बिलकुल है जी. अविनाश जी नहीं तो लोग इतने सालों से. क्यों जाते वहां? आपको यही सब खोजने में मजा आता है, देश में आधी आबादी से ज्यादा लोग रोज भूखे सो जाते हैं. वहीँ कई लोग रातो-रात अम्बानी जैसे लोग भी पनप आते हैं. कभी इसपर भी दृष्टिपात करने का मौका तलाशिये अविनाश जी. आपके पास तो अपनों के लिए भी समय नहीं है, तो आखिर किसके लिए रत्ज्ग्ग्गा करते हैं?
दरअसल, सेंसरशिप के नाम पर कुछ लोग अपनी मानसिकता दूसरों पर थोपने की सोचने लगे हैं। मेरा मानना है कि जो साइट्स और चैनल वगैरह आपकी पसंद की चीज़ नहीं दिखा रहे हैं, उन्हें आप ओवरलुक करें। किसे क्या पसंद है और क्या नहीं, ये तय करनेवाले हमलोग कौन होते हैं। और अश्लीलता का दायरा इतना व्यापक और दूसरी ही घड़ी इतना सीमित हो जाता है कि हम कभी यह फैसला नहीं कर सकते कि जिसे हम अश्लील कह रहे हैं, क्या वास्तव में वह अश्लील है या फिर इसके निहितार्थ कुछ और हैं। हां, अगर कोई चीज़ अश्लील है, तो उसके खिलाफ कॉन्सेंसस बनाइये। लोगों को अपनी क़लमी (उ)धार का कर्जदार बना दीजिए। तब आये मजा। वैसे मेरा यह भी मानना है कि कंटेंट के चुनाव का चूंकि सर्वाधिकार संपादक के पास सुरक्षित रहता है, इसलिए संपादकों को ही इस मसले पर सोचना चाहिए कि क्या उनकी सृजनशीलता अश्लीलता के दायरे को पार तो नहीं कर रही है। चूंकि संपादकगण खुद ही विद्वान होते हैं, इसलिए उन्हें किसी अन्य माध्यम से ज्ञान बंचवाने की जरूरत नहीं है, ऐसा लगता है।
avinash ne theek likha hai. Darasal ashleelta hamare dimag men hi hoti hai.
अश्लीलता और भारतीय समाज ….इस विषय पर काफी पहले से बहुत कुछ पढता आ रहा हूँ..और इसमें कोई संदेह नहीं रहा की ये ..ठीक उसी तरह परिभाषित की जाती रही है जैसा बौद्धिक स्तर लेखक का रहा है …यानी की निश्चित रूप से आम जन से बहुत ही ऊपर …मगर मुश्किल ये है की अक्सर ये उन्हें भी प्रभावित करता है ..जिनका मानसिक स्तर सिर्फ ..मानसिक समझ तक सिमित है..अब वो समय नहीं है की जब आप जबरन किसी पर भी अपनी सोच ..अपने निर्णय थोप सकें..यदि कुछ गलत है ..तो ये जान लीजिये की सिर्फ आपकी नजर में है..यदि सही है तो भी आपकी नजर में है..और ऐसा ही सबके साथ है …हाँ खजुराहो और ऐसी ही कलाकृतियों ..के बारे में कम से कम मैं कोई अवधारणा नहीं बना सकता..कारण स्पष्ट है ..वो इसलिए की ये सब जब बनाए गए थे ..वो समय ही कुछ और था…और इस समय का जो इतिहास लिखा गया है ..इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते मैं उससे संतुष्ट नहीं हूँ…जहां तक आज कल जिस अश्लीलता का शोर मच रहा है या मचाया जा रहा है…उसका परिणाम चाहे जो भी हो…मगर इतना तो तय है ..उससे कोई भी उद्देश्य हासिल नहीं होने जा रहा है…मैं अविनाश जी की सोच से सकारात्मक इत्तेफाक रखता हूँ..
putulji ke vichar se sahmat.bahut hi baarik farq hai kala aur aslilita aur shalilta mein.