“एसपी को खरीदने की हैसियत किसी में नहीं थी”
लेखक: जनतंत्र डेस्क | June 28, 2009 | देश-दुनिया, बड़ी ख़बर | Comments Off
दिल्ली के प्रेस क्लब में एसपी सिंह को याद किया गया। इस मौके पर बड़ी संख्या में पत्रकार जुटे। कुछ उनके दोस्त। कुछ उनके साथ काम कर चुके पत्रकार जो आज अहम ओहदों पर हैं। कुछ युवा पत्रकार जो इस पेशे में चंद कदम ही चले हैं। कुछ ऐसे भी जिन्हें अभी पहला कदम रखना है। सबने एसपी सिंह के बहाने पत्रकारिता के मौजूदा माहौल पर चर्चा की।
आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष ने कहा कि एसपी ने हिंदी पत्रकारिता को एक कुंठा से बाहर निकाला और उसे पेशेवर बनाया। उन्होंने बताया कि एसपी के दौर से पहले हिंदी का पत्रकार कुंठा में जी रहा था। वो अंग्रेजी के पत्रकारों को अपने से ऊपर मानता था। शायद इसलिए क्योंकि सत्ता के गलियारे में उनकी सुनी जाती थी। हिंदी के पत्रकारों की नहीं। लेकिन एसपी ने अपने तरीके से हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारों के बीच खिंची दीवार गिरा दी। “आज तक” के जरिए साबित किया कि हिंदी के पत्रकार किसी से कम नहीं हैं और उनकी आवाज़ को कोई अनसुनी नहीं कर सकता। आशुतोष ने ये भी कहा कि एसपी ने हिंदी पत्रकारिता को प्रोफेशनल बनाया। झोला छाप पत्रकारिता से निकाल कर एक नई पत्रकारिता को जन्म दिया। साथ ही पत्रकारिता में नस्लभेद (जातीय) को भी ख़त्म कर दिया।
“एसपी का व्यक्तित्व काफी बड़ा था। यही वजह है कि मार्क्सवादी विचारधारा में यकीन रखने वाले एसपी के दोस्त सभी पार्टियों में थे। उन्होंने कहा कि एसपी को समझने वाले जानते हैं कि अगर वो जिंदा होते तो आज के हालात में भी सच्चाई के हक में सड़क पर उतरने से नहीं डरते। वो हालात के सामने घुटने टेकने की जगह लड़ने में यकीन रखते थे। राम बहादुर राय ने कहा कि लालगढ़ में आज जो कुछ हो रहा है उसके प्रति मीडिया का रवैया बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। लालगढ़ में लड़ने वाले कोई आतंकवादी नहीं हैं, वो लोग अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं। ये सही है कि उन्होंने हथियार उठाए हैं और हिंसा को सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन एसपी होते तो उन नौजवानों को आतंकवादी साबित करने की जगह उनके समर्थन में खड़े होते। समझौते की राह निकालने की कोशिश करते।” – राम बहादुर राय
न्यूज़ 24 के न्यूज़ डायरेक्टर सुप्रिय प्रसाद ने कहा कि एसपी ख़बरों के लिए जीते थे। उन्होंने बताया कि कैसे बड़ी ख़बर आने पर एसपी नए उत्साह से भर जाते थे। वो ख़बर लिखने से लेकर उसे ऑनएयर करने तक हर प्रक्रिया में शामिल रहते थे। उन्होंने बताया कि कई बार ऐसा हुआ कि एसपी देर रात तक उनके साथ थे और अगली सुबह उनसे पहले दफ़्तर पहुंच गए। ख़बरों को लेकर उनकी प्रतिबद्धता बेमिसाल थी।
आज तक के डिप्टी एडिटर सुमित अवस्थी ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि एसपी से उनकी मुलाकात चंद पलों की है। लेकिन आज वो पत्रकार बने हैं तो इसके लिए दो ही शख़्स प्रेरणास्रोत रहे हैं। एक उनके पिता जो खुद भी पत्रकार रहे हैं और दूसरे एसपी सिंह। उन्होंने कहा कि हम लोग छोटी छोटी बात पर लड़ते हैं झगड़ते हैं। ये बंद होना चाहिये। हम सबको मिल कर एक दूसरे का साथ देना चाहिए। एक दूसरे की मदद करनी चाहिए। ताकि जरुरत पड़ने पर हमें किसी और की मदद न लेनी पड़े।
वरिष्ठ पत्रकार उमेश जोशी कुछ ज़्यादा ही भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि आज जो पत्रकारिता हो रही है उस पर सबको चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। उमेश जोशी ने कहा कि आज पत्रकारिता नहीं हो रही शुद्ध रूप से दलाली चल रही है।
इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार पुष्य प्रसून वाजपेयी ने भी बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि ये सही है कि एसपी सिंह ने पत्रकारिता को प्रोफेशनल बनाया। लेकिन वो अपने साथियों को बदलते हालात से लड़ना नहीं सिखा सके। यही वजह है कि आज सब मैनेजर बन गए हैं। मालिक के ख़िलाफ़ जाने से कतराते हैं। उनके सरोकार ख़त्म हो गए हैं। जबकि खुद एसपी ने पूरी ज़िंदगी सरोकारों की पत्रकारिता की।
वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने एसपी के होने का मतलब बताया। उन्होंने कहा कि अगर कोई कहता है कि एसपी निष्पक्ष पत्रकारिता करते थे तो ऐसा नहीं था। वो हर मुद्दे पर अपना एक स्टैंड लेते थे। सवर्ण और पिछड़ों में पिछड़ों का पक्ष। सवर्ण और दलितों में दलितों का पक्ष। अमीर और गरीबों में गरीबों का पक्ष। वो कहते थे कि पत्रकारों की ताकत कमजोरों के साथ खड़े होने पर बढ़ती है। लेकिन वो हमेशा इतना सतर्क रहते थे कि उनके समर्थन का कोई ग़लत फायदा नहीं उठा ले। इसी से जुड़ा उन्होंने एक वाकया सुनाया। कहा कि जब बीएसपी के मुखिया काशी राम ने आशुतोष पर हमला कर दिया था तो उन्होंने इस हमले के ख़िलाफ़ मोर्चा निकाला और जब उस मोर्चे में दलित विरोधी नारे लगने लगे तो वो वहां से ये कहते हुए हट गए कि बात दूसरी दिशा में जा रही है।
एसपी सिंह के करीबी रहे नेता के सी त्यागी ने खुल कर अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि एक बात कबूल करने से सभी पत्रकार डरते हैं वो है बाज़ार का सच। आज बाज़ार ने सबको बदल दिया है। आज न सियासत पहले जैसी है और ना ही पत्रकारिता। आज राजनीतिक कार्यकर्ता दलाल बन गया है और चौथा स्तंभ भी बिक चुका है। आज किसी को गरीबों की कोई चिंता नहीं। कभी-कभार गरीबों का फोटो अख़बार छाप देते हैं लेकिन उनके समर्थन में आवाज़ बुलंद करने के लिए नहीं बल्कि उनका मजाक उड़ाने के लिए। लेकिन एसपी ऐसे नहीं थे। वो सरोकारों के लिए जीते थे। आज एसपी जिंदा होते तो वो पत्रकारिता के मूल्यों को बचाने के लिए लड़ रहे होते या फिर पत्रकारिता छोड़ चुके होते। इस देश में किसी कारोबारी और किसी नेता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वो एसपी को खरीद सकता।
एसपी के साथी और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने भी अपने विचार व्यक्त किये। उन्होंने बताया कि एसपी का व्यक्तित्व काफी बड़ा था। यही वजह है कि मार्क्सवादी विचारधारा में यकीन रखने वाले एसपी के दोस्त सभी पार्टियों में थे। उन्होंने कहा कि एसपी को समझने वाले जानते हैं कि अगर वो जिंदा होते तो आज के हालात में भी सच्चाई के हक में सड़क पर उतरने से नहीं डरते। वो हालात के सामने घुटने टेकने की जगह लड़ने में यकीन रखते थे। राम बहादुर राय ने कहा कि लालगढ़ में आज जो कुछ हो रहा है उसके प्रति मीडिया का रवैया बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। लालगढ़ में लड़ने वाले कोई आतंकवादी नहीं हैं, वो लोग अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं। ये सही है कि उन्होंने हथियार उठाए हैं और हिंसा को सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन एसपी होते तो उन नौजवानों को आतंकवादी साबित करने की जगह उनके समर्थन में खड़े होते। समझौते की राह निकालने की कोशिश करते। आज उनके जैसे लोग नहीं हैं। उनकी कमी खलती है। राम बहादुर राय ने कहा कि पत्रकारों को ये तय करना होगा कि आखिर वो किसके पक्ष में खड़े होंगे? जुल्म ढाने वालों के पक्ष में या फिर जुल्म सहने वालों के समर्थन में।
सभा का समापन संतोष भारतीय ने किया। उन्होंने कहा कि उन्हें अपने दोनों दोस्त एसपी सिंह और उदयन शर्मा की कमी बहुत खलती है। एसपी की याद में इस सभा का आयोजन उनके बेटे चंदन प्रताप सिंह ने किया था। इसमें दिलीप मंडल और पुष्कर पुष्प की सक्रिय भागेदारी रही। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने भी अपना सहयोग दिया। सभा के दौरान ही मीडिया मंत्र के विशेषांक का विमोचन हुआ। इस बार का अंक एसपी पर ही केंद्रित है। पुष्कर पुष्प इस पत्रिका के संपादक हैं।
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