शैलेंद्र को श्रद्धांजलि

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  June 26, 2009  |  बड़ी ख़बर, हक़ की आवाज़   |   Comments Off

पत्रकार शैलेंद्र को दिल्ली के प्रेस क्लब में श्रद्धांजलि दी गई। बड़ी संख्या में पत्रकारों ने साथी शैलेंद्र के लिए दो मिनट का मौन रखा और उन्हें याद किया। इस मौके पर वक्ताओं ने शैलेंद्र की शख़्सियत के उन पहलुओं की ओर ध्यान खींचा जिनके बारे में सिर्फ़ वही जानते हैं जो उनके बेहद क़रीब थे। उन्होंने बताया कि कैसे शैलेंद्र पत्रकारों की इस भीड़ का हिस्सा होते हुए भी तमाम लोगों से अलग थे।

इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने कहा कि शैलेंद्र को सिर्फ़ पत्रकार के नज़रिये से नहीं देखना चाहिये। वो साहित्यकार भी थे। वो बेहद संवेदनशील इंसान थे। यही वजह है कि दूसरों का दुख देख, उसे बांटने की कोशिश करते थे। दिलीप ने टेलीविजन न्यूज़ इंडस्ट्री के एक कड़वे सच की ओर भी लोगों का ध्यान खींचा। वो सच है न्यूज़रूम में मौजूद तनाव का।

वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू ने भी तनाव के मुद्दे को उठाया। वो तनाव जो न्यूज़रूम में इस कदर पसर गया है कि पत्रकारों की उम्र लगातार घट रही है। उन्होंने सभी से माहौल बेहतर बनाने की अपील की, ताकि सब ज़िंदगी को खुल कर जी सकें। पत्रकारिता दमघोंटू वातावरण में नहीं उन्मुक्त और साफ-सुथरे माहौल में हो।

न्यूज़ 24 के मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम ने शैलेंद्र के व्यक्तित्व के कई अनछुए पहलू बयां किये। उन्होंने बताया कि किस तरह शैलेंद्र देर रात उन्हें फोन करके अपनी ग़ज़लें सुनाया करते थे। कई बार तो झुंझलाहट होती थी और उस झुंझलाहट को भांप कर शैलेंद्र कहते थे, “आप तो मैनेजर हो गए हैं। ऐसा करिये कि आप फोन गीता जी (वरिष्ठ पत्रकार एवं अजीत की पत्नी) को दीजिये मैं उनको अपनी ग़ज़ल सुनाऊंगा।” ये आत्मीय संबंध आसानी से नहीं बनते। उन्होंने ये भी कहा कि शैलेंद्र को अगर कोई बात नहीं पसंद आती तो वो बेझिझक उसे बोल दिया करते थे, चाहे किसी को उनका अंदाज अच्छा लगे या बुरा। अजीत अंजुम ने दिलीप मंडल के उस प्रस्ताव को भी आगे बढ़ाया कि शैलेंद्र के परिवार की मदद के लिए सभी को साझा प्रयास करना चाहिए।

हालांकि इस मौके पर कुछ लोगों की जुबां फिसली भी। शायद भावनाओं के उबाल में वो समझ नहीं सके कि क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं? जैसे सभा का संचालन करने वाले ने कहा कि शैलेंद्र ने नशे में ही ज़्यादातर ग़ज़लों की रचना की। ये कहने की क्या ज़रूरत थी ये समझना मुश्किल है। ठीक उसी तरह एक वरिष्ठ साथी ने कहा कि शैलेंद्र ने जिस तरह ज़िंदगी जी उसी तरह वो चले भी गए। एक ख़ौफनाक हादसे में मारे गए एक व्यक्ति के लिए इस्तेमाल किये गए इन शब्दों का मतलब या तो वही बता सकते हैं या फिर खुदा। इनके अलावा एक और माननीय सज्जन ने खटकने वाली बात कही। उन्होंने कहा कि शैलेंद्र अतिरेक में जीते थे और इसी अतिरेक ने उन्हें हमसे छीन लिया। अब आप ही बताइये कि ज़िंदगी को कोई खुल कर जीना चाहता है तो वो अतिरेक कैसे? अगर घुटन भरे माहौल से कुछ पल सुकून के चुराना चाहता है तो फिर वो अतिरेक कैसे? शायद वो ये कहना चाहते थे कि व्यावहारिक लहजे से जीने के लिए शैलेंद्र को जितने समझौते करने चाहिए थे… खुद पर जितनी पाबंदियां लगानी चाहिए थीं… जिस हद तक घुटनों को मोड़ना चाहिये था और जिस हद तक सिर झुकाना चाहिए था… उन्होंने वैसा कुछ भी नहीं किया था।

सबसे आखिर में आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष ने शैलेंद्र से जुड़ी भावनाओं को सामने रखा। साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि टीवी-18 ग्रुप शैलेंद्र के परिवार को संभालने की पूरी कोशिश कर रहा है। ऐसी योजना बनाई जा रही है ताकि उन्हें किसी और की मदद नहीं लेनी पड़े। हालांकि आशुतोष उस गंभीर मुद्दे पर ख़ामोश रह गए जिसका जिक्र कई दूसरे वक़्ताओं ने किया था। वो मुद्दा है टेलीविजन का तनाव। वो तनाव जो कई जुझारू और वरिष्ठ पत्रकारों को असमय लील चुका है और न जाने कितने लोग उसकी जद में हैं।

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