एक-दूसरे की हत्या करा रही है सरकार
लेखक: Samrendra | June 16, 2009 | बड़ी ख़बर, स्पेशल रिपोर्ट | 1 Comment
अरुंधति रॉय से जनतंत्र की ख़ास बातचीत के पहले हिस्से में आपने मीडिया पर उनकी बेबाक राय पढ़ी। अब दूसरी और आखिरी किश्त … जिसमें मीडिया के साथ कुछ और बड़े मुद्दों पर चर्चा। इस बातचीत में अरुंधति ने कश्मीर के हालात पर… छत्तीसगढ़ में चल रहे नरसंहार पर… नंदीग्राम और सिंगूर की हिंसा पर… और भारत में चल रहे ब्रितानिया हुकूमत के औपनिवेशिक मॉडल पर खुल कर बात की। आप भी अरुंधति से हुए इस सवाल-जवाब को पढ़िये और अपनी राय रखिए।
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जितेंद्र – अक्सर कहा जाता है कि मीडिया फोर्थ स्टेट (चौथा स्तंभ) है … क्या सच में ये फोर्थ स्टेट है?
अरुंधति – मुझे लगता है कि शायद ये फर्स्ट स्टेट है।
वैसे तो मीडिया के लार्जर स्किम में लेफ्ट फिट नहीं बैठता है। लेकिन यहां विरोधाभाष तो लेफ्ट के भीतर भी था। वो सेंटर में कुछ कहता था और पश्चिम बंगाल में कुछ और। तो वही विरोधाभाष मीडिया में रिफलेक्ट हुआ।इनका जो रोल है वो बहुत बढ़ गया है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के तौर पर नहीं बल्कि स्टेटस्को (यथास्थितिवाद) बनाए रखने में बहुत बढ़ गया है। अभी आप देखो कि ये टीवी पर जो यंग पीपुल हैं, वही माहौल बना रहे हैं। कॉरपोरेट के खिलाड़ी हों, या डिफेंस के अफ़सर हों, नेता हों या फिर कोई और …. वो सबको बीच में रोक कर पूछते हैं कि सर क्या भारत को पाकिस्तान से रिश्ते तोड़ लेने चाहिये? क्या भारत को पाकिस्तान पर हमला बोल देना चाहिये? … ये आखिर क्या है? ये बहुत डरावना है।
समरेंद्र – मतलब वो जनमत तैयार कर रहे हैं और नीतियों पर असर डाल रहे हैं?
अरुंधति – पता नहीं कितना ओपिनियन बिल्ड कर रहे हैं। मुझे ये भी लगता है कि अब धीरे धीरे लोग समझने लगे हैं कि ये लोग (मीडिया के लोग) एक अलग ही दुनिया में रहते हैं। क्योंकि कुछ साल से वो एक ही इलेक्शन का रिजल्ट प्रेडिक्ट नहीं कर पाया। ये भी एक सच है ना। इससे पता चलता है कि जमीनी हक़ीक़त से मीडिया का रिश्ता तेजी से टूट रहा है। एक पूरा क्लास को हिप्नोटाइज करके रखा है। बिना बात के इस शोर में।
समरेंद्र – आपने कहा कि ये फर्स्ट स्टेट है। हम लोग समझ रहे हैं कि ये एक टूल है और स्टेट के लिए काम कर रहा है। अगर फर्स्ट स्टेट है तो ये इस्तेमाल हो नहीं रहा बल्कि इस्तेमाल कर रहा है। इन दोनों में अंतर है।
अरुंधति – नहीं… इतना अंतर भी नहीं है।
अरे ज्यूडिसरी का तो आप पढ़ सकते हैं। उनका जजमेंट। इवेंचुअली द जजमेंट ऑन अफ़जल सेज दैट … इवेन दोउ वी हैव नो एविडेंस दैट ही (अफ़जल) विलॉन्ग्स टू ए टेरोरिस्ट ग्रुप, वी नो व्हाट ही (अफ़जल) हैज डन हैज सेकेन द कंट्री, इन ऑर्डर टू सटिस्फाइ द कलेक्टिव कॉन्सियसनेस ऑफ द सोसाइटी वी सेंटेंस हिम टू डेथ …स्टेट का मतलब क्या है? दिज आर द एलिमेंट्स ऑफ स्टेट। जैसा की पहले मैंने कहा था कि लोकतंत्र में अलग-अलग इंस्टीट्यूशन्स हैं जो एक दूसरे पर नज़र रखते हैं। अब वो एक दूसरे को कवर देते हैं। एक बार फिर मैं पार्लियामेंट अटैक के मुद्दे पर लौटना चाहूंगी। आपने देखा कि मीडिया किस तरह से न्यायपालिका को कवर दे रही है। न्यायपालिका पुलिस को कवर दे रही है। नेता हर किसी को कवर दे रहे थे। इस पूरे खेल से जिन लोगों ने पर्दा उठाया वो पत्रकार नहीं थे। वो वकील थे, वो प्राध्यापक थे… वो सामाजिक कार्यकर्ता थे। उन्होंने बताया कि किस तरह तमाम संस्थाएं एक दूसरे को संरक्षण दे रही हैं।
समरेंद्र – न्यायपालिका भी?
अरुंधति – अरे ज्यूडिसरी का तो आप पढ़ सकते हैं। उनका जजमेंट।
ये बहुत ख़तनाक़ हालात हैं। सरकार से, मीडिया से और बाकी संस्थाओं से लोगों में जो उम्मीद की लौ थी वो बुझ रही है। इसलिए छत्तीसगढ़ में गृहयुद्ध चल रहा है। नंदीग्राम और सिंगूर में हिंसा हुई।इवेंचुअली द जजमेंट ऑन अफ़जल सेज दैट … इवेन दोउ वी हैव नो एविडेंस दैट ही (अफ़जल) विलॉन्ग्स टू ए टेरोरिस्ट ग्रुप, वी नो व्हाट ही (अफ़जल) हैज डन हैज सेकेन द कंट्री, इन ऑर्डर टू सटिस्फाइ द कलेक्टिव कॉन्सियसनेस ऑफ द सोसाइटी वी सेंटेंस हिम टू डेथ … ((हालांकि हमारे पास ऐसा कोई सबूत नहीं है कि वो (अफ़जल) किसी आतंकवादी संगठन से ताल्लुक रखता है, हम जानते हैं कि उसने (अफ़जल) ने जो किया है उससे पूरा देश हिल गया है। समाज की सामूहिक चेतना को तुष्ट करने के लिए हम उसे मौत की सज़ा देते हैं।))
समरेंद्र – फिर स्पेस क्या बचता है?
अरुंधति –
एनआरईजीए (नरेगा) क्या है? एक परिवार के एक सदस्य को यही कोई आठ हज़ार रुपये साल में मिलेंगे। एक साल में मिलेंगे। इतने रुपये तो यहां लोग डिनर पर खर्च कर देते हैं। वो जब पास करना था संसद में तो कॉरपोरेट क्लास के जितने बंदे थे … चिदंबरम वगैरह … वो सब इसके ख़िलाफ़ थे। लेफ़्ट इसके समर्थन में था। अब एनआरईजीए के आधार पर प्रचार करके चुनाव जीत गए हैं तो कह रहे हैं कि वोट आर्थिक सुधार के लिए दिया गया है।स्पेस तो बचता नहीं है .. बनाना होता है न? अभी इस देश में स्पेस लोग अपने लिये बना रहे हैं। लड़-लड़ कर। ख़ून बहा बहा कर। जैसे नंदीग्राम में, सिंगूर में और लालगढ़ में। वहां लोग लड़ लड़ कर बना रहे हैं अपना स्पेस। वो लड़ रहे हैं अपनी लड़ाई। ये भी एक चीज है न कि लेफ़्ट फ्रंट सिंगूर और नंदीग्राम की वजह से हार गया और ये मीडिया बोलता है कि वो हारे क्योंकि वो विकास के ख़िलाफ़ हैं।
समरेंद्र – मतलब इसी तरह से लोग अपना स्पेस क्रिएट करेंगे। लड़ कर।
अरुंधति – ये बहुत ख़तनाक़ हालात हैं। सरकार से, मीडिया से और बाकी संस्थाओं से लोगों में जो उम्मीद की लौ थी वो बुझ रही है। इसलिए छत्तीसगढ़ में गृहयुद्ध चल रहा है। नंदीग्राम और सिंगूर में हिंसा हुई।
जितेंद्र – सिंगूर और नंदीग्राम में जो कुछ हुआ … वहां पर मीडिया ने जनता को सपोर्ट किया। लेकिन छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर जनता सरकार के ख़िलाफ़ है उससे लड़ रही है लेकिन मीडिया उसको सपोर्ट नहीं कर रहा। इस विरोधाभाष को आप कैसे देखती हैं?
अरुंधति – वैसे तो मीडिया की लार्जर स्किम में लेफ्ट फिट नहीं बैठता है। लेकिन यहां विरोधाभाष तो लेफ्ट के भीतर भी था। वो सेंटर में कुछ कहता था और पश्चिम बंगाल में कुछ और। तो वही विरोधाभाष मीडिया में रिफलेक्ट हुआ।
समरेंद्र – आपने कहा कि लोग लड़-लड़ कर स्पेस तैयार करेंगे और ये बहुत ख़तरनाक स्थिति है .. तो फिर सभी क्यों कहते हैं कि हमारा लोकतंत्र परिपक्व हो रहा है।
अरुंधति – ये कौन कहता है? ये भी तो मीडिया ही कहता है। क्योंकि उसे कुछ कहना है।
समरेंद्र – नहीं। सिर्फ मीडिया ही नहीं… बहुत सारे बुद्धिजीवी भी कहते हैं… लिखते रहते हैं। आखिर उनकी क्या मजबूरी है।
अरुंधति – मुझे लगता है कि कुछ लोग तो समझ ही नहीं पाते हैं। वो लोकतंत्र और चुनाव को जोड़ कर देखते हैं। उनके मुताबिक लोकतंत्र का मतलब चुनाव है। दूसरी वजह है कि ये बुद्धिजीवी एक सुविधाजनक समाज से आते हैं। हो सकता है कि वो भविष्य के ख़तरे का अंदाजा नहीं लगा पा रहे हों।
समरेंद्र – अगर चुनाव का मतलब लोकतंत्र नहीं है तो लोकतंत्र क्या है?
अरुंधति – चुनाव तो बस एक हिस्सा है, पूरा लोकतंत्र नहीं। जैसे एनआरईजीए को लीजिये। एनआरईजीए क्या है? एक परिवार के एक सदस्य को यही कोई आठ हज़ार रुपये साल में मिलेंगे। एक साल में मिलेंगे।
तीन लाख लोगों को कह दिया गया है कि जो सलवा जुडुम के साथ नहीं है वो माओवादी है। मतलब उनको मारा जा सकता है .. ख़त्म किया जा सकता है। और आप बोल नहीं सकते। आप बोलेंगे तो बिनायक सेन की तरह जेल में होंगे… या फिर हिमांशु की तरह आपका घर तोड़ दिया जाएगा। अभी उन तीन लाख लोगों को ये उम्मीद नहीं है कि मीडिया उनकी बात उठाएगा। तो उनके पास रास्ता क्या बचता है? या तो मरो .. या तो लड़ कर मरो।इतने रुपये तो यहां लोग डिनर पर खर्च कर देते हैं। वो जब पास करना था संसद में तो कॉरपोरेट क्लास के जितने बंदे थे … चिदंबरम वगैरह … वो सब इसके ख़िलाफ़ थे। लेफ़्ट इसके समर्थन में था। अब एनआरईजीए के आधार पर प्रचार करके चुनाव जीत गए हैं तो कह रहे हैं कि वोट आर्थिक सुधार के लिए दिया गया है। सच तो ये है कि एनआरईजीए उन आर्थिक सुधारों के नकारात्मक असर को काटने के लिए लागू किया गया था। एनआरईजीए और आर्थिक सुधार – दोनों एक दूसरे के विपरीत हैं। और आखिर ये एनआरईजीए क्या है? भीखमंगों की ओर फेंका गया टुकड़ा और इस पर भी उन्हें (कॉरपोरेट और चिदंबरम जैसे लोगों को) प्रॉब्लम है। अब आप इस चिदंबरम को देखिये। एनरॉन के लिए वकालत करने से लेकर वेदांता जैसी कंपनी का बोर्ड ऑफ डायरेक्टर… और फिर देश का वित्त मंत्री और अब गृह मंत्री। वो कहता है कि उसका सपना है कि देश की 85 फ़ीसदी आबादी शहरों में रहे। मतलब 50 करोड़ की आबादी गांवों से शहरों की ओर पलायन कर जाए। तो वो सारा जमीन जो बचेगा वो कॉरपोरेट्स के हवाले हो जाएगा। वहां पर खनन होगा या फिर वो जो कुछ भी करना चाहते हैं। और इतने लोग पलायन कैसे करेंगे … जब पुलिस एक्शन होगा। तो वित्त मंत्री से गृह मंत्री बनना भी इसी का हिस्सा है ना। ये सारा कनेक्शन लोग समझते नहीं है… ये जो डेमोक्रेसी है .. ये इसी की व्यूह रचना है।
जितेंद्र – लोकतंत्र के नाम पर जो मन में आए करिये?
अरुंधति – टू मच रिप्रजेंटेशन एंड टू लिटिल डेमोक्रेसी। आप कुछ और कह कर चुनाव लड़ सकते हैं और जीतने के बाद कुछ और कर सकते हैं। …. अभी आप देखो पूरा अहिंसात्मक आंदोलन को सरकार ने ख़त्म कर दिया। अब रहा हिंसक संघर्ष, तो उन्हें उग्रवादी कह कर मारेंगे।
मेरा जो नया किताब निकल रहा है वो उन लोगों पर जिन्होंने उम्मीद को तर्क से अलग करने का तरीका सीख लिया है। ये जो हम लोग बैठ कर एक एक वजहों पर चर्चा कर रहे हैं उम्मीद ऐसी किसी भी वजह, तर्क से ऊपर है। इन एनी सिचुएशन होप इन नॉट रिजनेबल।मेरे और आपके पास च्वायस (विकल्प) है, तो हम देखते रह सकते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में देखो तो 640 गांवों को खाली कर दिया। तीन लाख से ज़्यादा लोग जंगल में घूम रहे हैं। 50 हज़ार से ज़्यादा लोग सलवा जुडुम से जुड़ गया। जो जंगल में घूम रहे हैं उनके पास कुछ नहीं है… मतलब वो गांव नहीं जा सकते… उनका खेत जल गया.. उनका घर जल गया … उनके खाना जल गया… सब जला दिया… आर्मी पुलिस को ट्रेनिंग दे रही है। लोगों को ट्रेनिंग दिया जा रहा है। उन तीन लाख लोगों को कह दिया गया है कि जो सलवा जुडुम के साथ नहीं है वो माओवादी है। मतलब उनको मारा जा सकता है .. ख़त्म किया जा सकता है। और आप बोल नहीं सकते। आप बोलेंगे तो बिनायक सेन की तरह जेल में होंगे… या फिर हिमांशु की तरह आपका घर तोड़ दिया जाएगा। अभी उन तीन लाख लोगों को ये उम्मीद नहीं है कि मीडिया उनकी बात उठाएगा। तो उनके पास रास्ता क्या बचता है? या तो मरो .. या तो लड़ कर मरो।
समरेंद्र – ये भी बड़ी हैरानी की बात है छत्तीसगढ़ में सरकार बीजेपी की है और केंद्र में है कांग्रेस। दोनों मिल कर …
अरुंधति – नहीं …वो दूर की बात है। छत्तीसगढ़ में सरकार है बीजेपी और सलवा जुडुम चलाती है कांग्रेस। दोनों एक मंच पर … एक साथ सबसे गरीब लोगों को मारने का बात करते हैं।
समरेंद्र – तो भविष्य को कैसे देखती हैं?
अरुंधति – देखो मेरा जो नया किताब निकल रहा है वो उन लोगों पर जिन्होंने उम्मीद को तर्क से अलग करने का तरीका सीख लिया है।
विकास और जेनोसाइड (नरसंहार)। जेनोसाइड का मतलब सिर्फ़ यही नहीं कि आप सबको कन्सनट्रेशन कैंप में डाल कर मार दो। जैसे यूरोप में जब लोकतंत्र की अवधारणा मजबूत हो रही थी और वहां लोगों को अधिकार दिये जा रहे थे। ठीक उसी समय उन लोगों ने कांगों में, हरारे में, पश्चिमी अफ्रीका में लाखों लोगों को मार दिया।ये जो हम लोग बैठ कर एक एक वजहों पर चर्चा कर रहे हैं उम्मीद ऐसी किसी भी वजह, तर्क से ऊपर है। इन एनी सिचुएशन होप इन नॉट रिजनेबल। अगर आप अपार्थाइड दक्षिण अफ्रीका को देखें तो ये किसी को अंदाजा नहीं था कि एक दिन वो ख़त्म होगा। हालांकि आज भी वो पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ है …वो अगल रूप में अब में अब भी चल रहा है, लेकिन हम कह रहे हैं। उम्मीद है… किसी तरह… किसी मोड़ पर… सबकुछ ऐसे ही नहीं चलता रहेगा। दुनिया के बड़े हिस्से में लोग समझ रहे हैं, लेकिन हम नहीं। जैसे इन्हें पता है कि बड़ा बांध बनाना ख़तरनाक है। इकॉलोजिकली ख़तरनाक है। फिर भी हिमालय में सौ-सौ बांध बना रहे हैं। फिर भी उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में जंगल काट रहे हैं। किस लिए? वो बॉक्साइट को निकालने में आप पूरा इकोसिस्टम ख़त्म कर रहे हैं। फिर भी निकाल रहे हैं। वेदांता को इनवॉयरमेंटल अवार्ड दिया जा रहा है।
समरेंद्र – क्योंकि वो सोचते हैं कि वो सही कर रहे हैं।
अरुंधति – नहीं। उनको पता है कि वो सही नहीं कर रहे हैं। फिर भी कर रहे हैं। इनर्शिया ऑफ मूवमेंट की तरह। मशीन की तरह। यही तो प्रॉब्लम है।
जितेंद्र – अच्छा, चिदंबरम वेदांता की गवर्निंग बॉडी से इस्तीफा देकर अगले ही दिन भारत का वित्त मंत्री बन जाता है। एक कंपनी की गर्वनिंग बॉडी से देश का वित्त मंत्री। ऐसी चीजों को रोकने का कोई उपाय नहीं है?
अरुंधति – कौन रोकेगा?
नहीं… मैं कश्मीर के फ्रीडम मूवमेंट के समर्थन में हूं ऐसा नहीं है। मुझे लगता है कि वहां एक मिलिटरी ऑकुपेशन (सैन्य कब्जा) हैं। कश्मीर में आजादी का आंदोलन बहुत पेचीदा है। अगर मैं कहूं कि मैं उसके समर्थन में हूं तो मुझसे पूछा जाएगा कि किस मूवमेंट के। ये उन पर निर्भर करता है। एज ए पर्सन हू लिव्स इन दिस कंट्री आई कैन नॉट सपोर्ट द सेपेरेशन ऑफ पीपुल इन दिस मिलिट्री ऑकुपेशनकानून भी तो वही बनाते हैं। अगर आप इस पूरे मामले को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखें। 1989 में जब अफगानिस्तान के पठार में सोवियत साम्यवाद के ख़िलाफ़ पूंजीवाद का जेहाद जीत गया उस दौरान भारत में क्या हुआ? यहां पर बाज़ार खोला गया … 1986 में बाबरी का ताला तोड़ा गया था और 1989 में रामजन्मभूमि प्रकरण शुरू हुआ। ये सबकुछ साथ-साथ चल रहा है। इस्लामिक टेरोरिज्म और माओवादी टेरोरिज्म के ख़िलाफ़ मुहिम और विकास की बयानबाजी। इस बारे में मैंने काफी कुछ लिखा है। विकास और जेनोसाइड (नरसंहार)। जेनोसाइड का मतलब सिर्फ़ यही नहीं कि आप सबको कन्सनट्रेशन कैंप में डाल कर मार दो। जैसे यूरोप में जब लोकतंत्र की अवधारणा मजबूत हो रही थी और वहां लोगों को अधिकार दिये जा रहे थे। ठीक उसी समय उन लोगों ने कांगों में, हरारे में, पश्चिमी अफ्रीका में लाखों लोगों को मार दिया। आप देखें तो ये दोनों चीजें हमेशा साथ-साथ चलती हैं। इसको किसी स्लोगन से नहीं समझा जा सकता। ये जो राष्ट्रवाद है … इसके नाम पर क्या नहीं हुआ है।
समरेंद्र – दोनों बातें हैं। कश्मीर में आप फ्रीडम मूवमेंट के समर्थन में हैं।
अरुंधति (बीच में रोकते हुए) – नहीं… मैं कश्मीर के फ्रीडम मूवमेंट के समर्थन में हूं ऐसा नहीं है। मुझे लगता है कि वहां एक मिलिटरी ऑकुपेशन (सैन्य कब्जा) हैं। कश्मीर में आजादी का आंदोलन बहुत पेचीदा है। अगर मैं कहूं कि मैं उसके समर्थन में हूं तो मुझसे पूछा जाएगा कि किस मूवमेंट के। ये उन पर निर्भर करता है। एज ए पर्सन हू लिव्स इन दिस कंट्री आई कैन नॉट सपोर्ट द सेपेरेशन ऑफ पीपुल इन दिस मिलिट्री ऑकुपेशन।
समरेंद्र – लेकिन इस तरह की महात्वाकांक्षाओं का भी तो कोई अंत नहीं है। मान लीजिये कि आज जम्मू-कश्मीर को आज़ाद कर दिया जाए। फिर जम्मू का सवाल उठेगा। उसके बाद लद्दाख का सवाल उठेगा। आप उत्तर प्रदेश को देखिए… उत्तराखंड अलग बनाया गया। अब बुंदेलखंड… पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल की मांग उठ रही है। मतलब अलग होने की महात्वाकांक्षा का भी तो कोई अंत नहीं है।
अरुंधति – ये दोनों अलग है। छत्तीसगढ़ का मध्य प्रदेश से अलग होना अलग है।
यहां एक बात साफ है कि इस देश में पूरा औपनिवेशिक मॉडल काम कर रहा है। जब मैं दंतेवाड़ा जा रही थी वो वहां पर बीएसएफ की कई बटालियन जा रही थीं। उनमें कई कश्मीरी जवान थे। कश्मीरियों को छत्तीसगढ़ में … छत्तीसगढ़ के लोगों को कश्मीर में… नगालैंड के लोगों को इधर के लोगों को मारने के लिए तैनात कर दो।ये एक राष्ट्र का भीतरी मसला है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के अभिजात्य वर्ग ने मध्य प्रदेश से अलग होने की मांग कर दी। लेकिन जम्मू कश्मीर का मसला अलग है। ये औकात की बात है। हम यहां बैठ कर ये नहीं कह सकते कि तुम्हें अलग होने की मांग करने का कोई हक़ नहीं है। हम तुम्हें सेना के जरिये नियंत्रित करेंगे। ऐसे कई सवाल हैं। यही वजह है कि मैंने आपसे कहा कि मैं उनके सवालों का जवाब नहीं दे सकती। उन्हें खुद ही अपने सवालों का जवाब ढूंढना होगा। मैं सिर्फ़ यही कह सकती हूं कि मैं सैन्य कब्ज़े के ख़िलाफ़ हूं।
जितेंद्र – आप लोकतांत्रिक आंदोलनों का भविष्य कैसे देखती हैं। अहिंसक आंदोलनों पर कोई सुनवाई नहीं होती है। नंदीग्राम में लोग हिंसक हुए तो सरकार झुक गई। दूसरा छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसक हैं तो सरकार उन्हें ख़त्म करने पर लगी हुई है। लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए क्या स्पेस है?
अरुंधति – ये बहुत बड़ा सवाल है जीतू। मैं क्या बोल सकती हूं। मैं सिर्फ यही कह सकती हूं कि .. जब तक सरकार अहिंसक आंदोलनो को हिंसक जरिये से बंद करती रहेगी, ये होगा। बहुत से लोगों ने देखा है कि नंदीग्राम में लोगों ने जीत लिया। जन आंदोलन को उग्रवाद से जोड़ कर। पर ये भी एक समस्या है कि जैसे आप देखो .. कोई एसईजेड की लड़ाई होता है… तो चलो लोग एक साथ लग कर सड़क खोद देते हैं। लोगों को वहां आने से रोक देते हैं। वहां वो हिंसक नहीं है सरकार हिंसक है और उन्होंने उसे उसी तरीके से जवाब दिया। लेकिन आप बांध के सवाल को देखिये। वो कहां … किस सड़क पर गड्ढा खोदेंगे। वहां तो पानी आ रहा उनके गांव में। गांव डूब रहा है। तो अलग-अलग तरह के आंदोलनों में अलग-अलग तरीके से संघर्ष होता है। ये भी उतना ही सही है कि हर बार हिंसक आंदोलन कामयाब नहीं होगा। मतलब दोनों तरफ से लोग फंसेंगे। यहां एक बात साफ है कि इस देश में पूरा औपनिवेशिक मॉडल काम कर रहा है। जब मैं दंतेवाड़ा जा रही थी वो वहां पर बीएसएफ की कई बटालियन जा रही थीं। उनमें कई कश्मीरी जवान थे। कश्मीरियों को छत्तीसगढ़ में … छत्तीसगढ़ के लोगों को कश्मीर में… नगालैंड के लोगों को इधर के लोगों को मारने के लिए तैनात कर दो।
समरेंद्र – ताकी लोगों पर गोली चलाते वक़्त उनकी संवेदना ना जुड़े।
अरुंधति – हां। वही तो है। और क्या है।
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