मेरा चैनल, तेरे चैनल से बेहतर

लेखक: जनतंत्र डेस्क  |  May 22, 2009  |  पहरेदार   |   2 Comments

न्यूज़ चैनल खुद को बड़ा साबित करने के लिए हर हथकंडे अपना रहे हैं। हर हफ़्ते जारी होने वाली टीआरपी ही एकमात्र पैमाना नहीं है। बल्कि अब सबके पास अपनी “टीआरपी” है। इससे पहले हर कोई टैम की तरफ से जारी होने वाली रेटिंग के किसी खास पहलू को पकड़ कर खुद को नंबर वन साबित करने की कोशिश करता था। लेकिन अब तो सर्वे के जरिये भी दावा किया जा रहा है कि जनता उन्हें दूसरों से ज्यादा पसंद करती है। इस दौड़ में हिंदी और अंग्रेजी, सभी न्यूज़ चैनलों की हालत एक सी है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में एक विज्ञापन छपा है। विज्ञापन में दावा किया गया है कि चुनाव में और मतगणना के दिन टाइम्स नाउ चैनल सबसे आगे रहा। दावे के मुताबिक पांच दौर के मतदान में चैनल को 38 फीसदी लोगों ने देखा जबकि सीएनएन आईबीएन को 25 और एनडीटीवी 24×7 को 23 फीसदी लोगों ने देखा। मतगणना वाले दिन टाइम्स को 32, सीएनएन-आईबीएन को 31 और एनडीटीवी 24×7 को 28 फीसदी लोगों ने देखा।

उधर, सीएनएन-आईबीएन ने अपनी तरफ से विज्ञापन छपवाया। सीएनएन-आईबीएन के दावे के मुताबिक चुनाव के दौरान सबसे अधिक 38 फ़ीसदी दर्शकों ने उसे पसंद किया और वो नंबर वन रहा। जबकि टाइम्स नाउ दूसरे और एनडीटीवी 24×7 तीसरे नंबर पर रहा। ये दोनों चैनल 30 के आंकड़े को भी पार नहीं कर सके।

हिंदी चैनल तो इनसे भी आगे निकल गए। देश के “सबसे तेज” न्यूज़ चैनल आज तक ने टैम की रेटिंग के हवाले से कहा कि वो नंबर वन है। आज तक के इस दावे को टक्कर देने के लिए स्टार न्यूज़ ने नया तरीका खोजा। उसने चीख-चीख कर कहा कि एमसीसीएस नेटवर्क (स्टार न्यूज़ उसी नेटवर्क का हिस्सा है) देश का नंबर वन नेटवर्क है।

मजेदार तो ये रहा कि टीआरपी में छठे नंबर पर मौजूद एनडीटीवी इंडिया भी खुद को बेहतर साबित करने लगा। एनडीटीवी इंडिया ने एक ख़बर चला कर बताया कि जनता ने उसका चुनाव कवरेज बहुत पसंद किया। इसके लिए उसने जीएफके मोड के सर्वे का सहारा लिया। इस सर्वे के मुताबिक 22 फ़ीसदी लोगों को एनडीटीवी इंडिया का चुनावी कवरेज अच्छा लगा।

ये तमाशा कुछ वैसा ही है जैसे राजनीतिक पार्टियां हार और जीत का मूल्यांकन करती हैं। इस तमाशे से इतर सच तो यही है कि चैनल अपनी सहूलियत के हिसाब से आंकड़े जुटा कर भले ही दूसरों की आंख में धूल झोंक दें, लेकिन वो अपनी असलियत तो जानते ही हैं। खुद को धोखा कैसे देंगे?

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Comments

2 Responses to “मेरा चैनल, तेरे चैनल से बेहतर”
  1. आशीष कुमार says:

    इस पूरे मामले में आज तक और स्टार न्यूज का स्टैंड तो समझ में आता है। वो आंकड़ों का रुख अपनी ओर मोड़कर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। लेकिन इस ‘चुनाव मतलब’ एनडीटीवी इंडिया का क्या किया जा सकता है। इन्होंने तो अपना ही सर्वे कराकर अपनी पीठ ठोंक ली। इसके कर्ताधर्ताओं के दीवालियेपन की हद देखो कि बाकी ने तो खुद को नंबर-वन साबित करने के लिए आंकड़ों से छेड़छाड़ की, लेकिन एनडीटीवी तो खुद को नंबर-दो साबित करने में जुटा है।

  2. अरे भाई क्यों आप बोल रहे हों इन चेनलों के खिलाफ, अजी छोडिये भी, भला आज तक (आज-तक चैनल नहीं) कभी कोई सुधार है जो आज हमारे समाचार चैनल सुधर जायेंगे उनके बारे में लिखने से| आगे बढ़ने की होड़ तो आज से नहीं बल्कि पैदईशी है| अब देखी आज तक हर साल अपने आप को खुद ही समानित करता है भारत का सबसे तेज और सबसे आगे रहने वाला चैनल बता कर| मैं तो कहता हूँ क्यों हर साल पैसा खर्च करते हो इस सम्मान समारोह के आयोजन में, भी एक ही बार अगले १०-१५ सालों के लिए पुरस्कार दे डालो| जब पता है की खुद को हे देना है तो फिर इसमें शरमाना कैसा|

    स्टार न्यूज़ का तो बस हाल मत पूछो, उन्हें तो बीबीसी और कण से आगे निकालने की होड़ लगी है| भारतीय चैनल तो उनके मुकाबले के ही नहीं है| उनका तो समाचार सुनाने का अंदाज़ ही बदल गया है| सब चैनल वाले आराम से स्टूडियो में बैठ कर समाचार सुनते हैं और कहाँ स्टार न्यूज़ वाले पुरे कार्यालय में घूम-घूम कर बेचारे और लोगों को भी पकाते रहते हैं| कोई उन्गे समझे की “समाचार का मतलब लोगों तक जानकारी पहुँचाना होता है न की जानकारी परोसना”|

    न्द्त्व के जहाँ तक बात है, कुछ समाया पहले तक यहाँ भी लगभग सब ठीक ठाक ही था| न्द्त्व देखते हुए लगता था की हाँ कोई समाचार चैनल है| परन्तु अब यहाँ भी बदलाव ही नज़र आता है| दुसरे चैनलों की तरह ऊँची आवाज़ और तेज़ तर्रार तसवीरें या यूँ कहें की स्क्रीन पर तस्वीरों की वजाए शब्दों का खेल|

    अब तो बस यही दुआ रहा गयी है की कभी न कभी तो कोई न कोई चैनल ऐसा आयेगा जो एक अच्छे तरीके से समाचार लोगों तक पहुँचायेगा|

    धन्यावाद

    आपका प्रिय
    मित्रवर